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कथायात्रा के टेढ़े मेढ़े रास्ते और समकालीन कहानी की परिधि में रमेश शर्मा की उपस्थिति - वरिष्ठ कथाकार उर्मिला आचार्य का आलेख


 

कथायात्रा के टेढ़े मेढ़े रास्ते और समकालीन कहानी की परिधि में रमेश शर्मा की उपस्थिति

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                               - उर्मिला आचार्य

कथा कहानी के इर्द गिर्द रचनाकार की उपस्थिति किस रूप में , किस तरह और कहाँ कहाँ हो सकती है, इसका आकलन करना दिलचस्प होते हुए भी एक दुरूह कार्य है । आकलन न कहते हुए अगर इसे शोध या कोई खोज पूर्ण कार्य कहा जाए तब भी हम इसे सामान्यीकृत नहीं कर रहे होते हैं । कथा लेखन करने के लिए लेखक जिस दुनिया में उतरता है , जिन रास्तों से होकर आगे बढ़ता है , उस दुनिया तक पहुँचने के लिए उन रास्तों से होकर गुजरे बिना हम लेखक का पीछा नहीं कर सकते । यहाँ पीछा करने के अपने निहितार्थ हैं जहाँ से हम लेखक को जानने समझने के लिए उन्हीं रास्तों से होकर गुजरते हैं जहाँ से लेखक अपनी कथायात्रा के साथ आगे बढ़ता है।

इस यात्रा के भी अनेक पड़ाव हैं जिन्हें जानना उतना ही जरुरी है जितना कि लेखक की कथा कहानियों को जानना समझना । लेखक के जीवन अनुभवों के दायरे का भूगोल कितना फैला हुआ है ? लेखक के जीवन अनुभवों के अपने सामाजिक सरोकार समाज की कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं ? लेखक की कहानियाँ वैचारिक रूप से जन को कितना प्रभावित कर पाती हैं ?लेखक की कहानियों में सामाजिक यथार्थ किस रूप में विद्यमान है ? अगर लेखक अपनी कहानियों में किसी कोलाज/कल्पना के सहारे प्रस्तुत हो रहा है तो सामाजिक संदर्भों में उसकी अर्थवत्ता पाठक की नज़र में कहाँ तक है ? लेखक किन किन रचना प्रक्रियाओं से होकर गुजरता है ? मोटे तौर पर ये कुछ ऐसे बिंदु हैं जिनके माध्यम से लेखक की कथा यात्रा और उनकी कहानियों को हम ठीक ढंग से समझ पाने के करीब पहुँच सकते हैं ।

'इस खोजपूर्ण और श्रमसाध्य कार्य को आखिर क्यों किया जाना चाहिए ?' ऐसा कुछ करते हुए ऐसे सवाल भी मेरे जेहन में आ रहे हैं, ऐसे में मुझे लग रहा है कि ऐसा करते हुए हम स्वयं की रचनात्मक दुनिया का भी एक तरह से आकलन करते हैं । कई बार इस तरह का शोधपूर्ण आकलन रचनात्मक दुनिया के नए रास्तों से भी हमारा परिचय कराता है । अगर हम स्वयं कथा लेखन की दुनिया से जुड़े हैं और किसी कथा लेखक की दुनिया को टटोल रहे हैं, तब भी हमारी रचनात्मक परिपक्वता थोड़ी और समृद्ध होती है ।

इस खोज पूर्ण यात्रा में, मैं जिस सुपरिचित कथा लेखक पर चर्चा को आगे बढ़ाने जा रही हूँ  फ़िलहाल वे छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य रायगढ़ जिले से आते हैं और उनका नाम रमेश शर्मा है ।  सेवानिवृति के पूर्व चूँकि मैं स्वयं छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग में बतौर अध्यापिका और प्राचार्य के रूप में लम्बे समय तक काम कर चुकी हूँ और कथा लेखक रमेश शर्मा भी इसी अध्यापन की दुनिया का एक हिस्सा रहे हैं और अभी भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं , ऐसे में अनुभव की समानता के स्तर पर उनकी कथायात्रा को जानना समझना मेरे लिए कुछ हद तक आसान होगा, ऐसा मैं समझती हूँ । अपने स्वयं की कथा लेखन की दुनिया में झांकते हुए मुझे ऐसा लगता है कि कोई लेखक अगर अध्यापन के पेशे से संलग्न है तो उसे समाज में अनेक स्तरों पर जाकर भिन्न भिन्न लोगों और भिन्न भिन्न घटनाओं के संपर्क में आने के अनेक अवसर मिलते हैं। ये सभी संपर्क अध्यापक के अनुभवों को विस्तार देते हैं । ये संपर्क हमें उकसाते हैं कि हमारे अनुभव कहानी के माध्यम से लोगों तक किसी तरह पहुंचें । ये संपर्क कई बार हमें ऐसे अनुभवों के करीब भी ले जाते हैं जब हम बहुत अधिक विचलित होकर अवसाद की स्थिति तक पहुँचने की स्थिति में होते हैं । इन अनुभवों में कहीं विद्यार्थियों के, उनके पालकों के अपने त्रासदपूर्ण दुःख दर्द होते हैं तो कहीं सामाजिक या प्रशासकीय त्रासदियाँ शामिल होती हैं। रमेश शर्मा की कथा यात्रा से गुजरते हुए मैं अपने स्वयं के अनुभवों को जब वहां प्रक्षेपित होता हुआ पाती हूँ तब मुझे लगता है कि कोई भी संवेदनशील लेखक की दुनिया अनेक उतार चढ़ावों से होकर ही अपने मुकाम की ओर धीरे धीरे आगे बढ़ती है।

 

रमेश शर्मा के अब तक तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उसके उपरांत भी उनकी कुछेक कहानियाँ पत्र पत्रिकाओं में मुझे पढ़ने को मिलती रही हैं । जहाँ तक मेरी जानकारी में है , कथा लेखक रमेश शर्मा की कथा यात्रा बीसवीं सदी के अंतिम दशक में शुरू हुई थी । बीसवीं सदी के अंतिम दशक में दुनिया में जो एक बड़ी घटना घटित हुई , वह घटना आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के रूप में इतिहास में दर्ज है । इस घटना का व्यापक असर लोगों के जीवन में तब से ही देखा जाने लगा है । 1992 के बाद पूंजीवादी व्यवस्था और नवउदारवाद के एक नए युग का आरम्भ दुनिया के साथ साथ भारत में भी हुआ । इसका असर यह हुआ कि गाँव कम होते गए और शहरीकरण उसी अनुपात में बढ़ता गया । तीव्र और अंधाधुंध औद्योगीकरण के कारण जल, जंगल और जमीनों पर पूंजी पतियों का कब्जा होने लगा। चूँकि रमेश शर्मा के कहानी लेखन की शुरूवात बीसवीं सदी के अंतिम दशक में हुई , तब यहाँ यह देखना लाजिमी होगा कि उनकी कहानियों में आर्थिक उदारीकरण और नवउदारवाद के प्रभाव की घटनाएं दर्ज हुई हैं या नहीं , अगर दर्ज हुई हैं तो वे किस रूप में पाठकों तक पहुंची हैं । उनके सम्प्रेषण का दायरा कहाँ तक है।

इस घटना के संदर्भ में, मैं यहाँ उनके शुरूवाती दौर की  दो तीन कहानियों का जिक्र करूंगी । उनकी एक कहानी है 'मुआवजा' । इस कहानी पर बात करने के पूर्व लेखक के आसपास की भौगोलिक दुनिया को भी जान लेना मुझे आवश्यक जान पड़ता है। लेखक जिस क्षेत्र से आते हैं वह क्षेत्र पिछले दो तीन दशकों से स्पंज आयरन उद्योग की बहुलता वाला क्षेत्र है। उद्योग पतियों द्वारा किसानों की जमीनों की छीना झपटी , धूल-धुंआ, प्रदूषण ये समस्याएं तो वहां हैं ही , पर स्पंज आयरन उद्योग की वजह से रायगढ़ जैसे शहर और उसके चारों तरफ सड़क दुर्घटनाओं में बेतहाशा बृद्धि की वजह से हजारों लोगों की जानें वहां जाती रही हैं । ऐसे क्षेत्रों में मनुष्य के जान की कीमत किस तरह सस्ती हुई है ये मसला किसी से अब छुपा नहीं है । पूंजीवादी व्यवस्था में आम मनुष्य की जान की कीमत के बदले मुआवजा नामक अस्वीकृत शब्द को भी सत्ता तंत्र द्वारा किस तरह धीरे से षड्यंत्र पूर्वक सामाजिक स्वीकृति दिला दी गयी है यह कहानी उसी की पड़ताल करती है । यह कहानी गाँव पर केन्द्रित है । कहानी में दमयंती और रामेश्वर की प्रेम यात्रा है । इस कहानी में उनका अपनी जमीनों, पेड़ पौधों और प्रकृति के प्रति प्रेम का मानवीकरण हमारा ध्यान खींचता है। लेखक जब तक अनुभव और संवेदना के स्तर पर ऎसी घटनाओं से अपने को अंतर्संबंधित न करे तब तक कहानी का प्रभाव और सम्प्रेषण पूर्ण रूप से पाठक तक नहीं पहुँच पाता । रमेश शर्मा ग्रामीण समाज से सघन रूप से जुड़े रहे हैं , उनके जीवन का बड़ा हिस्सा गाँव में व्यतीत हुआ है, अंधाधुंध औद्योगीकरण की त्रासदियों को अपनी आँखों से उन्होंने देखा है , भोगा है, इसलिए उनके पास अनुभव से उपजी संवेदना का एक छोटा-मोटा संसार भी है । मुआवजा कहानी में उनके अनुभव से उपजी संवेदना को महसूस किया जा सकता है । जमीनों को छीनने , पेड़ पौधों को नष्ट करने , डम्फर-ट्रक जैसी बड़ी-बड़ी जानलेवा गाड़ियों की अंधाधुंध आवाजाही से दुर्घटना के कारण होने वाली जनहानियोँ के बदले मुआवजा का चलन आज जो शुरू हुआ है वह पूंजीवादी व्यवस्था का एक भयावह षड़यंत्र है । सड़क दुर्घटना में पति रामेश्वर की मृत्यु के उपरांत दमयंती द्वारा इस प्रवृति का तीव्र विरोध इस कहानी को प्रभावी बनाता है। कहानी में ग्रामीण समाज को भ्रमित करने के लिए पूंजीवादी ताकतों द्वारा जमीनों को हड़पने के उद्देश्य से जिस तरह के षड़यंत्र किये जाते हैं उन षड्यंत्रों पर भी कहानी मार्मिक संवाद करती है । कुल मिलाकर रमेश शर्मा का अनुभव संसार और उनकी संवेदना इस कहानी से सघन रूप से जुड़े होने का प्रमाण हमें देती है । प्रेमचंद पथ नामक पत्रिका में प्रकाशित यह कहानी प्रोफ़ेसर वेलायुधन द्वारा मलयालम भाषा में अनूदित होकर केरल से निकलने वाली प्रसिद्द साप्ताहिक पत्रिका मातृभूमि के 26 जनवरी 2022 गणतंत्र दिवस अंक में भी प्रकाशित हुई थी ।

 

अध्यापन का पेशा जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है , उसका अनुभव किसी लेखक को किस हद तक कहानी के करीब ले जाता है , मेरी समझ से उसकी पड़ताल करना भी यहाँ एक जरूरी बिषय है । इस सन्दर्भ में उदाहरण के तौर पर रमेश शर्मा की कहानी 'खाली जगह' को लेकर बातचीत को मैं आगे बढ़ाना चाहूंगी ।

आर्थिक उदारीकरण के बाद पूंजी का दुष्प्रभाव समाज में इस तरह हुआ कि पूंजी के सामने जन की कीमत लगभग नगण्य होती चली गयी । डाक्टरी पेशे में इसके दुष्प्रभाव का दंश आज हर गरीब आदमी झेल रहा है । रामदीन गुरुजी के स्कूल की छोटी सी बच्ची फूलमती के बीमार हो जाने के बाद की घटनाओं के दृश्य इस कहानी में आते हैं। दृश्य जितने मार्मिक हैं उतने ही भयावह भी हैं । अर्थाभाव से घिरे बीमार बच्ची के गरीब पिता की मजबूरियों को मास्टर रामदीन की नज़रों से जिस तरह देखा गया है , वह कहानी को स्वाभाविक बनाता है । चिकित्सा के पेशे में गिरावट यह आई है कि कई जगहों में अधिक फीस चुका कर पेशेंट अपनी बारी आने से पहले ही डॉक्टर से कंसल्ट कर लेने की सुविधा प्राप्त कर लेता है । गरीब आदमी अपनी बारी आने के इन्तजार में बड़ी अमानवीय परिस्थितियों से गुजरता है । शिक्षक के कहने पर इलाज के लिए बुखार से पीड़ित फूलमती को उसका गरीब पिता साइकिल पर बिठाकर गाँव से शहर लाता है । शहर आकर नर्सिंग होम में चिकित्सा करवाने के लिए जिस प्रोसेस से वह गुजरता है , उसके लिए सारे अनुभव बहुत त्रासद पूर्ण हैं । मरीजों की भीड़ की वजह से पंजीयन के बाद भी उस दिन डॉक्टर से संपर्क कर पाने में वह विफल होता है और बीमार बच्ची को उसी हालत में गाँव लेकर लौट जाता है । अपनी साईकिल में बीमार बच्ची को बिठाकर दूसरे दिन फिर उसी नर्सिंग होम में वह आता है । तब तक बच्ची की हालत थोड़ी और बिगड़ चुकी होती है जिसके मार्मिक दृश्य कहानी में आते हैं । बहुत प्रतीक्षा के बाद आखिर में किसी तरह डॉक्टर से उसका संपर्क होता जरूर है पर डॉक्टर द्वारा जब यह सवाल किया जाता है कि कितने पैसे रखे हो ? इस सवाल के सामने आते ही गरीब पिता की झिझक , उसकी बैचैनी और उस पर डॉक्टर की तल्खी हमें बेचैन करती हैं । डॉक्टर चल्ताऊ किस्म का ट्रीटमेंट देकर उसे जिस बेरूखी के साथ विदा करता है , उस सच्चाई को लेखक ने कहानी में पूरी मार्मिकता के साथ रखा है । इलाज उपरान्त लौटते समय गाँव के मुहाने पर बच्ची की हालत इतनी बिगड़ जाती है कि एक असहाय पिता साईकिल से उतर कर बच्ची को अपनी बांहों में लिए घर की तरफ दौड़ लगाता है । यह खबर फैलती है और रामदीन गुरूजी भी वहां पहुँच आते हैं । उसी रात फूलमती इस दुनिया को अलविदा कह देती है । रामदीन गुरूजी को पछतावा होता है कि काश वह थोड़ी और आर्थिक सहायता कर दिए होते तो संभव है फूलमती की जान बच जाती । एक होनहार बच्ची के असमय इस तरह चले जाने का दुःख गुरूजी को सालने लगता है । फूलमती की मृत्यु उपरान्त मास्टर जी जब स्कूल के क्लास रूम में बच्चों के साथ बैठे रहते हैं, तब उन्हें अचानक एहसास होता है कि क्लास रूम में एक जगह ऎसी भी है जो खाली है, जो अब कभी भरी नहीं जा सकती । पूंजीवादी व्यवस्था की त्रासदियों के साथ-साथ बच्चों के संग एक शिक्षक के अटेचमेंट को यह कहानी ठीक ढंग से परिभाषित करती है । मैं सोचती हूँ कि अगर रमेश शर्मा अध्यापन के पेशे से न जुड़े होते तो क्या एक बच्ची और उसके असहाय पिता पर केन्द्रित 'खाली जगह' जैसी कोई कहानी लिख पाते ? इसका उत्तर हाँ भी हो सकता है और नहीं भी । कथा लेखक सामने घटे जीवन अनुभवों से भी कई चीजें हासिल करता है । जब उसका उपयोग वह किसी कहानी में करता है तो कहानी अंतर्वस्तु के स्तर पर बहुत स्वाभाविक लगने लगती है । मुझे लगता है कि बतौर अध्यापक अपने हासिल अनुभवों का उपयोग करते हुए रमेश शर्मा ने इस कहानी को लिखा है।

 

आर्थिक उदारीकरण की त्रासदियों को बयाँ करती उनकी एक और कहानी है 'तस्वीर पर बैठी उदास चिड़िया' । इस कहानी के माध्यम से भी मैं रमेश शर्मा की कथा यात्रा को परखने का प्रयास करूंगी।

यह सच है कि जब कोई बड़ा उद्योग कहीं स्थापित होता है तो सैकड़ों एकड़ जमीनें चाहिए होती हैं । उन सैकड़ों एकड़ जमीनों की जद में जब कोई बसा बसाया गाँव आता है तब बेरहमी से उस समूचे गाँव को उजाड़ दिया जाता है । वर्षों से उस गाँव में बसे किसी संवेदनशील व्यक्ति की नज़र से इस परिस्थिति पर चिंतन कीजिए तो एक बेचैनी से आप भर उठेंगे । रायगढ़ शहर के बहुत निकट पतरापाली, गोरखा और भगवानपुर नामक गाँव आज से लगभग तीस साल पहले कभी लोगों की बसाहट से गुलज़ार हुआ करते थे, पर आज जाकर देखिये तो वहां गाँव के कोई निशान तक मौजूद नहीं हैं। उनके स्थान पर सैकड़ों चिमनियों से निरंतर काला धुंआ फेंकता एक दैत्याकार उद्योग समूह बस गया है। किसी समय उस जगह पर बसे गाँव के लोग , गाँव छोड़कर कहाँ चले गए ? वे किन स्थितियों में अब जीवन गुजार रहे होंगे? इसकी जानकारी हासिल कर पाना एक दुर्लभ बिषय है । लेखक की कहानी 'तस्वीर पर बैठी उदास चिड़िया' इन्हीं घटनाओं को लेकर बुनी गयी लगती है । कहानी का सूत्रधार जिसका बचपन कभी उस गाँव में अपनी बुआ के साथ गुजरा था जो वहां स्कूल की शिक्षिका थी । वर्षों अंतराल के बाद अपने बचपन की यादों के साथ उस गाँव में जब वह जाता है और अपने बचपन की मित्र चांदनी को ढूँढने की कोशिश करता है तो उसके नामों निशान वहां नहीं मिलते । वहां बाहर के लोग आकर बस गए होते हैं । गाँव की ऎसी कोई पहचान वहां उसे नहीं मिलती जिसके सहारे उसे कोई सूत्र हाथ लगे । उस वक्त उस गाँव में कभी स्कूल शिक्षिका रही उसकी बुआ की सुनायी हुई कहानी उसे याद आने लगती है जिसमें एक लम्बी उड़ान के बाद एक चिड़िया के अपने घोसले की तरफ लौटने के बाद उसका घोसला मौसम की मार की वजह से तहस नहस हो चुका होता है । उस जगह से मायूस होकर लौटते हुए बस में बैठे-बैठे जब वह चांदनी के बचपन की तस्वीर को अपनी जेब से निकालता है तब उसे अचानक एहसास होता है जैसे कि बुआ की कहानी की वह उदास चिड़िया चांदनी की तस्वीर पर आकर बैठ गयी है ।

पूंजीवादी व्यवस्था और आर्थिक उदारीकरण की त्रासदियों पर बुनी गयी ये तीनों ही कहानियाँ जिनका कि मैंने जिक्र किया है , भले ही कहानी की महीन बुनावट और सुगढ़ शिल्प की कसौटी पर पूरी तरह खरी न उतरती हों पर कहानी में समाहित अंतर्वस्तु ,लेखक का अनुभव संसार, उनका सामाजिक और वैचारिक सरोकार हमें जरूर प्रभावित करता है। शुरुवाती दौर की कहानियों में निहित अंतर्वस्तु भी कई बार लेखक को कहानी की मुख्यधारा में बने रहने के लिए सहारा देने का काम कर जाती है । शुरूवाती दौर में लिखी गयीं रमेश शर्मा की इन कहानियों को लेकर यह बात कही जा सकती है।

 

रमेश शर्मा के पहले कहानी संग्रह का शीर्षक 'मुक्ति' कहानी के नाम पर है । ऊपर जिन तीन कहानियों पर मैंने चर्चा की है उनमें से दो इसी संग्रह से हैं । मुझे याद आ रहा है कि आज से ग्यारह-बारह वर्ष पूर्व जब परिकथा पत्रिका की ओर से युवा यात्रा के नाम से नौ अंक निकले थे, उनमें तीन अंक युवा कहानी के नाम से प्रकाशित हुए थे । परिकथा के युवा कहानी-3 (अंक अप्रेल मई 2011) में रमेश शर्मा की यही कहानी 'मुक्ति' प्रकाशित हुई थी तब उन्हें पाठकों के बीच पहचान मिलने की शुरूवात हुई थी। रमेश शर्मा के पहले कहानी संग्रह 'मुक्ति' की कहानियों की समीक्षा करते हुए कथाकार एवं समीक्षक स्वर्गीय प्रेमचंद सहजवाला जी ने इसी मुक्ति कहानी पर टिप्पणी करते हुए लिखा था -

"शीर्षक कहानी मुक्तिप्रैक्टीकल होने, प्रिकाउसंस लेने और प्रेम करने का एक अनूठा समीकरण प्रस्तुत करती है। बाजारवाद मानवीय रिश्तों पर प्रायः एक गाज की तरह गिरता है । प्रेम की परंपरागत उत्सर्गवादी ज़मीन को छोड़ इस कहानी की नायिका अपने बीमारशुदा प्रेमी से अंतिम बार मिलने आती है तो सोचती है – ‘आखिर क्या मिलना है इस रिश्ते को आगे बढ़ा कर.... एक ऐसे आदमी के साथ जिसकी नौकरी छूटने को है। जो ब्लड प्रेशर और शुगर का मरीज़ हो चला है। जो यह शहर छोड़ कर एक छोटे शहर में बसने वला है। माना कि वह हुनरमंद है पर उसका शरीर अब साथ नहीं दे रहा। अपने इस रिश्ते को लेकर वह हमेशा इनसिक्योर फील करती रही है...’(पृ. 31)। प्रेम के संवेदनात्मक/ मानवीय पक्ष को तिलांजलि देने के बावजूद वह अंतिम मिलन की रात प्रेम को शुद्ध भौतिक आकार दे कर सुबह अपनी और उसकी साझी तस्वीर में से अपने हिस्से की तस्वीर काटकर अपने पास रख लेती है और उससे विदा लेते हुए हमेशा के लिए उसके जीवन से बाहर चली जाती है ।"

समीक्षा में स्व. प्रेमचंद सहजवाला जी ने यह भी लिखा था कि रमेश शर्मा अपने इस संग्रह द्वारा केवल सही ज़मीन चुन कर एक संभावनाशील कथाकार के आगमन का आभास देते हैं और स्तर की कसौटी पर अभी उन्हें और सशक्त प्रमाण देने हैं। ( परिकथा जुलाई अगस्त 2014)

 

मेरी समझ से यह एक जरूरी तथ्य है कि किसी कथाकार द्वारा अपनी रचना यात्रा में सही जमीन का चयन करना भी एक आश्वस्त करने वाली बात होती है। इस आश्वस्ति में आगे चलकर कथाकार के संभावनाशील होने की उम्मीद भी जीवित बची रहती है।

तक़रीबन आज से नौ-दस वर्ष पूर्व रमेश शर्मा के सम्बन्ध में कथा लेखक एवं समीक्षक स्व.प्रेमचंद सहजवाला की लिखी हुई इन बातों को, जिसमें उन्होंने रमेश शर्मा को एक संभावनाशील कथा लेखक हो पाने की उम्मीद जताई थी, उस उम्मीद को लेखक ने कितना जीवित रखा है , आज के संदर्भ में यह भी एक आकलन का बिषय हो सकता है।

पहले कहानी संग्रह के प्रकाशन उपरान्त अमूमन कथा लेखक की सक्रियता थोड़ी धीमी पड़ जाती है , पर संतोष करने वाली बात यह है कि रमेश शर्मा के कथा लेखन की यात्रा निरंतर चलती रही है । उन्होंने पाठकों एवं समीक्षकों द्वारा अपने प्रति संभावनाशील होने की धारणा को सच के रूप में बदलने की विनम्र कोशिश को जीवित रखा है । इस दरमियान उनकी कहानियां विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होती रही हैं । सुबह का इन्तजार , राजा की बारात (परिकथा), वे खुश होना चाहते हैं (समावर्तन), रूतबे की दीवार (समहुत),एक मरती हुई आवाज़ (गंभीर समाचार), कठपुतली( कथा समवेत), स्मृतियाँ ,पूर्वाग्रह ( अक्षर पर्व ) इत्यादि कहानियाँ उनके दूसरे कहानी संग्रह में शामिल हैं जिसका प्रकाशन जनवरी 2019 में हुआ था ।

इस चर्चा में समाहित अपनी बातों की विश्वसनीयता के संदर्भ में सर्वनाम के सम्पादक , कवि आलोचक रजतकृष्ण की लिखी उन पंक्तियों का उल्लेख करना भी मैं यहाँ जरूरी समझती हूँ जो रमेश शर्मा के दूसरे कहानी संग्रह 'एक मरती हुई आवाज़' में भूमिका अंश के रूप में दर्ज हैं । भूमिका अंश में वे लिखते हैं-

"कथाकार रमेश शर्मा का यह दूसरा कथा संग्रह है। उनकी कहानियाँ समकालीन जीवन स्थितियों ,व्यवस्था की क्रूरता और विसंगतियों के साथ ही रोजमर्रा के कठिन संघर्षों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति के नाते महत्वपूर्ण होती हैं ।

रमेश शर्मा अपनी कहानियों में समकालीन यथार्थ को आरोपित नहीं करते ,बल्कि संबंधित यथार्थ की तह तक जाते हुए समाज और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को भी समानांतर रूप से कथा परिधि के भीतर सटीक रूप से उजागर करते हैं । वे एक ऐसे जनपक्षधर कथाकार हैं जो हाशिए के चरित्रों और उनके जीवन में सुरक्षित सहेजे-धरे गए उन भावात्मक सरोकारों और जीवन मूल्यों को तलाशते हैं जिनका होना मनुष्यता के लिए जरूरी और जीवन के लिए उपयोगी है । ऐसे समय में जब समाज, सत्ता, राजनीति, व्यवस्था ,पारिवारिक जीवन से लेकर कार्यालयीन परिसरों तक में व्यक्ति को एक उपकरण व उपभोग की वस्तु मात्र बना दिया जा रहा है तब रमेश शर्मा अपनी कहानियों में व्यक्ति को उसके पूरे व्यक्तित्व और स्वत्व के साथ देखते-परखते हैं । इस अर्थ में वे मनुष्य की निजता की रक्षा के प्रति एक सचेत व सजग कथाकार प्रतीत होते हैं । यहाँ 'राजा की बारात ' कहानी इसका अच्छा उदाहरण है , जिसे पढ़ते हुए पाठक इस बात को महसूस करेंगे । 'राजा की बारात' कहानी भावनात्मक प्रेम और उदात्त मानवीय सरोकार की कहानी है जिसमें कथाकार यह रेखांकित करते हैं कि कैसे हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में "वी. आई.पी. कल्चर " लगातार बढ़ता जा रहा है और दूसरी ओर वह "जन" ही हाशिए का चरित्र बनकर जीने को अभिशप्त है जिसके बूते नेता चुने और पदासीन किए जाते हैं ।

एक सच्चा और सजग रचनाकार सिर्फ अपने समय को नहीं देखता ,बल्कि वह अपने समय की जमीन पर खड़ा होकर दूर तक पीछे देखता है और फिर आगे की ओर दृष्टि केंद्रित करता है । रमेश शर्मा की कहानियाँ इस अवलोकन प्रक्रिया के नाते सदैव जमीन से जुड़ी हुई नजर आती   हैं जिससे पाठक को कथा चरित्रों के गढ़न , उनके संवाद व सरोकार , उनकी भाषा ,बोली-बानी , उनकी कमजोरियों और खासियतों के साथ अस्तित्व में आए हुए प्रतीत होते हैं यह एक कथाकार के लिए महत्वपूर्ण है । रमेश शर्मा की इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को महसूस होने लगेगा मानों कथाकार अपनी कहानियों में अपने समय की डायरी लिख रहे हैं जिसमें आज के राजनीतिक रोजनामचे की तरह तथ्यों की गहरी पड़ताल है , वहीं टी. वी. सीरियलों के कृत्रिम पारिवारिक इकाई तथा पूंजी पोषित सामाजिक स्खलन, नैतिक पतनशीलता , वैचारिक मूल्यहीनता का एक-एक प्रामाणिक दस्तावेजीकरण भी ।

सरकारी सुविधाओं में जीने और अपने मातहत कर्मचारियों को घरेलू नौकर-सा समझने वाली सामन्ती प्रवृत्तियाँ "रुतबे की दीवार ढह गई " कहानी में बड़ी गहराई पूर्वक अभिव्यक्त हुई हैं । कार्यालयीन क्षेत्रों में दैहिक शोषण जैसी विकृति को भी वे बड़ी शिद्दत से इस कहानी में उजागर करते हैं।

'रुतबे की दीवार' जैसी कहानी लिखते हुए कथाकार रमेश शर्मा प्रतिरोधी चेतना और वर्गीय पक्षधरता के समर्थ कथाकार की अपनी छवि को स्थापित करते हुए दीखते हैं जो हमें आश्वस्त करता है । अपने अधीनस्थ महिला कर्मचारियों के प्रति बुरी नजर रखने वाले और उन्हें झूठे केस में फँसाकर अपना प्रभुत्व जमाने वाले अपने बॉस को कटघरे में खड़ा करने वाला मंगलू, प्रतिरोधी चेतना का जीवन्त प्रतीक है ,जो हमें विभिन्न रूपों में अपने यहाँ भी मिलते हैं ,ऐसे पक्षधर लोगों की पहचान जरूरी है और यह जरूरी काम रमेश शर्मा ने अपने इसी कहानी के माध्यम से किया है । इस संग्रह की शेष कहानियों पर मैं यहाँ कोई टिप्पणी नहीं कर रहा पर उन शेष कहानियों के माध्यम से भी मेरी इस आश्वस्ति को बल मिलेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।

जाहिर है रमेश शर्मा एक जनपक्षधर और समय सजग कथाकार हैं । इस कथा संग्रह के माध्यम से उनकी यह सजग उपस्थिति पाठकों के लिए आश्वस्तकारी होगी ।"

 

रजत कृष्ण यहाँ लिखते हैं कि रमेश शर्मा एक जनपक्षधर और समय सजग कथाकार हैं ।उनकी जनपक्षधरता और उनकी समय सजगता किन रूपों में कहानियों के माध्यम से सामने आती है , इसका भी जिक्र संक्षिप्त में उन्होंने अपनी बातों में किया है ।

कहानियों में वैचारिक स्तर पर उनकी जनपक्षधरता और उनकी समय सजगता तथा जीवन के ठोस धरातल पर उनकी जनपक्षधरता और उनकी समय सजगता के बीच कहीं कोई फांक तो नहीं है ? इस तरह के सवालों और उनके जवाबों का आकलन करना भी मेरे लिए यहाँ एक जरूरी बिषय है ।

किसी लेखक को कई बार उसकी लिखी कहानियों की दुनिया के बाहर भी हम जानने समझने की कोशिश करते हैं । सोशल मिडिया और संचार क्रांति के इस युग में उसके वास्तविक जीवन को जानना समझना अब कोई बहुत कठिन कार्य नहीं रह गया है । सोशल प्लेटफोर्म पर लेखक की निजी गतिविधियों और स्वतन्त्र रूप से व्यक्त विचारों के माध्यम से उसकी भीतरी दुनिया को कुछ हद तक जाना समझा जा सकता है । इन माध्यमों से जहाँ तक मैंने उन्हें जाना समझा है , वे सच के लिए अभिव्यक्ति के खतरे भी कई बार उठाते हुए नज़र आते हैं। उनकी निजी गतिविधियों से भी यह आभास होता है कि उनकी प्रगतिशीलता उन्हें सामाजिक जन सरोकारों के करीब ले जाती है । समय समय पर जन के पक्ष में ज्वलंत मुद्दों पर व्यक्त होने वाले उनके स्वतंत्र विचारों से भी ऐसा लगता है कि चेतनता के स्तर पर समय के सापेक्ष वे पूरी तरह सजग हैं । मेरे स्वयं के अनुभवों के आधार पर इतना तो मैं कह सकती हूँ कि कहानियों में वैचारिक स्तर पर उनकी जनपक्षधरता और उनकी समय सजगता तथा जीवन के ठोस धरातल पर उनकी जनपक्षधरता और उनकी समय सजगता के बीच कहीं कोई फांक नहीं है । दोनों ही दुनिया के भीतर वे मुझे एक जैसे लगते हैं ।

 

रमेश शर्मा की कथा यात्रा को लेकर मुझे जो एक बात कहनी है वह ये कि कहानी की अंतर्वस्तु के स्तर पर कथ्य की गंभीरता उनके शुरूवाती लेखन से ही उनकी कहानियों में मुझे नज़र आती है । इस संदर्भ में देशबंधु एवं अक्षर पर्व साहित्यिक पत्रिका के तत्कालीन प्रधान सम्पादक स्व. ललित सुरजन की टिप्पणी को भी मैं यहाँ उद्धृत करना चाहूंगी ।

रमेश शर्मा के पहले कहानी संग्रह मुक्ति की चर्चा करते हुए आर्थिक उदारीकरण और नवउदारवाद की त्रासदियों पर केन्द्रित उनकी कुछ कहानियों पर ललित सुरजन जी ने अक्षर पर्व फरवरी 2014 ( अंक 173 )के अपने सम्पादकीय में लिखा था -

"रमेश शर्मा का संभवत: यह पहला कहानी संग्रह है। ''मुक्ति'' में चौदह कहानियां हैं। इनको भी दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। कुछ कथाएं ऐसी हैं जो एकाकीपन और निजी अवसाद की कहानियां हैं। दूसरी श्रेणी में वे हैं जो सामाजिक जीवन की कठोर वास्तविकता से साक्षात्कार करवाती हैं। पहली कहानी- ''डर'' को ही लें। इसमें एक उम्रदराज अकेले पुरुष और अकेले स्त्री के बीच प्रेम की संभावना को लेकर कहानी रची गई है। चूंकि कई बार सत्य कल्पना से अधिक विचित्र होता है इसलिए संभव है कि यह कथा किसी वास्तविक प्रसंग पर आधारित हो, किन्तु सामान्य पाठक को यह रचना अविश्वसनीय ही लगेगी। 'शायद तुम उसे चाहने लगे थे', 'खाली जगह', 'तस्वीर पर बैठी उदास चिड़िया'.. आदि इस तरह की कहानियां हैं जिनमें लेखक की सामाजिक चिंताएं उभरकर सामने आती हैं। 'शायद तुम उसे चाहने लगे थे' कहानी तो एकबारगी मुझे 'कनफेशन ऑफ एन इकानॉमिक हिटमेन' की याद दिलाती है कि नवउदारवाद कैसे-कैसे षडयंत्र रचता है।"

 

इस आकलन में मैं महसूस कर रही हूँ कि जहाँ आर्थिक उदारीकरण और नवउदारवाद की त्रासदियाँ रमेश शर्मा की कहानियों के अंतर्वस्तु का एक हिस्सा हैं, वहीं उनकी कहानियों में दलित,शोषित और पीड़ित स्त्री को भी उतनी ही जगह मिली हुई है जितनी जगह साम्प्रदायिकता के खतरों को दी गयी है । आज की कहानी की अंतर्वस्तु से गायब होते ग्रामीण समाज को लेकर भी वे उतने ही संवेदनशील नज़र आते हैं जितनी संवेदनशीलता अन्य बिषयों को लेकर उनके भीतर है । राजनीतिक षड्यंत्रों से उपजी त्रासदियों के कारण पीड़ित जन के दुःख दर्द को लेकर भी उनकी कहानियाँ मुखर होकर संवाद करती हैं।

जहाँ तक भाषागत शिल्प का प्रश्न है ये कहा जा सकता है कि अपने शुरुवाती लेखन में उसके प्रति भले ही वे थोड़ा लापरवाह रहे हों पर धीरे धीरे उसको भी आगे की कहानियों में उन्होंने साधने का भरपूर प्रयास किया है और इसमें वे सफल भी हुए हैं । उनके तीसरे संग्रह 'उस घर की आँखों से' और उसके बाद लिखी गयी कहानियों में हम उसे महसूस भी कर सकते हैं । लेखन एक सतत प्रक्रिया है जिसमें समय के साथ निखार भी आता है , इसके लिए आवश्यक शर्त यह है कि लेखक अपनी रचनाओं के प्रति कितना प्रतिबद्ध है। रमेश शर्मा में मुझे वह प्रतिबद्धता सघन रूप में नज़र आती है ।

 

साम्प्रदायिकता सामाजिक विघटन का एक प्रमुख कारण है। धर्म के नाम पर जिस तरह के संघर्ष, जिस तरह के दंगे और जिस तरह की हिंसा आज हमें देखने को मिल रही है वह समाज एवं देश के लिए घातक है । कोई भी संवेदनशील व्यक्ति कभी नहीं चाहेगा कि समाज साम्प्रदायिकता जैसी बुराई की जद में आकर अपने को बर्बादी के रास्ते पर ले जाए । लेखक के भीतर भी अगर सजगता है तो उसकी संवेदना साम्प्रदायिकता जैसी  बुराईयों के बिरूद्ध लिखने के लिए उसे मजबूर करती है । रमेश शर्मा की इसी सजगता और संवेदनशीलता का परिचय  'कठपुतली' (कथा समवेत अंक जून 2017) और 'वह उस्मान को जानता है' (विभोम स्वर अंक अक्टूबर दिसम्बर 2020) जैसी कहानियों के माध्यम से हमें मिलता है। ये दोनों कहानियां साम्प्रदायिकता के विरोध में खड़ी नज़र आती हैं। सांप्रदायिक राजनीति हिन्दू और मुस्लिम कौम के मध्य वैमनष्यता फैलाने के लिए जिस तरह युवाओं का ब्रेन वाश करके उन्हें अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करती है , उन्हें कठपुतलियों की तरह अपने इशारे पर नचाती है, 'कठपुतली' कहानी में उसका बखूबी चित्रण है। मजबूत अंतर्वस्तु, कहानी की रोचक बुनावट, आकर्षक किस्सागोई और बेहतर भाषा शिल्प के चलते कहानी अपना प्रभाव स्थापित करती है। यह कहानी युवाओं और पाठकों को यह सन्देश देने में कारगर भूमिका निभाती हुई नज़र आती है कि अगर राजनीति के षड़यंत्र में आकर साम्प्रदायिकता जैसी बुराइयों को अपनाया गया तो समाज का विघटन होगा और उसका विकास भी अवरुद्ध हो जाएगा। साथ ही साथ प्रेम और भाईचारे के लिए भी लोगों के दिलों में कोई जगह नहीं बचेगी ।

'वह उस्मान को जानता है' कहानी एक ऎसी कहानी है जो कई स्तरों पर जाकर संवाद करती है।

कहानी के मूल में मनुष्य की क्षरित होती संवेदना है । आजीविका की जद्दोजहद में यंत्रवत होता जा रहा मनुष्य महानगरों में अपने पड़ोसी तक की खबर अब नहीं रखता। कहानी के मूल पात्र राघव को अपने पड़ोसी उस्मान की याद तब आती है जब अचानक वह अपने घर की छत से उस्मान के जले हुए घर की ठूँठ को देखता है। घर जो अब सांप्रदायिक दंगे की भेंट चढ़ चुका है। पर उसे इस बात की खबर तक नहीं । उसे तो इस बात की भी खबर नहीं कि उस्मान अब इस दुनिया में नहीं है ,वह भी दंगे की भेंट चढ़ चुका है ।  वही उस्मान जो एक बच्ची के बलात्कारियों को जेल के सीखचों तक ले जाते हुए कभी अपनी संवेदनशील पत्रकारिता का परिचय राघव के सामने दे चुका होता है , दुर्भाग्य कि एक ही कालोनी में आसपास रहते हुए राघव को उसके परिवार के बारे में जानकारी तक नहीं है । वह मेहजबीन तक को नहीं जानता जो दंगे में मारे गए उसी उस्मान की पत्नी है। उसे खबर तब होती है जब उसकी पत्नी ताने देकर उससे कहती है -'आपको यह सब कब पता होगा ?क्या तब जब हमारा खुद का बेटा किसी दिन दंगों की भेंट चढ़ जाएगा ?'

कहानी में गनीराम नामक एक पात्र ऐसा है जो जीवन संघर्षों के इस भीषण दौर में भी मनुष्यता के पक्ष में खड़ा है । गनीराम में वे सारे बुनियादी जीवन मूल्य हैं जो तमाम बिषमताओं के बाद भी एक संवेदनशील मनुष्य में होने चाहिए । लेखक ने राघव और गनीराम जैसे पात्रों की भीतरी दुनिया को आमने सामने रखकर जिस तरह कहानी को बुना है वह पाठक को न केवल द्रवित करता है , बल्कि उसे मनुष्य होने के लिए उकसाता है । बेहतर मनुष्य होने और जीवन मूल्यों की ओर ले जाने वाली यह कहानी भाषा शिल्प की सुन्दर बुनावट के लिए भी याद रह जाती है। कहानी लेखन की यात्रा में रचनात्मक हुनर का जो एक क्रमिक विकास है, लेखक के भीतर क्रमिक रूप से विकसित हो रहे उसी रचनात्मक हुनर का प्रमाण यह कहानी हमें देती है ।

 

इतिहास में सन 2020 और 2021 का वह दौर आया जब समूची मानव जाति कोरोना वायरस के प्रकोप से उपजे एक भीषण संकट के दौर से गुजरा । रूह कंपा देने वाले उस दौर को हम सबने भोगा है। उस दौर से कोई भी संवेदनशील रचनाकार अपने आप को रचनात्मक स्तर पर अलग नहीं कर सका । उस दौर की त्रासदियों का दस्तावेजीकरण अपने-अपने लेखकीय सामर्थ्य के अनुसार बहुतों ने किया है । संक्रमण काल के उसी दौर के अनुभवों और भीतर उपजे कोलाज़ के माध्यम से रमेश शर्मा ने 'रिजवान तुम अपना नोटबुक लेने कब आओगे'       (परिकथा अंक सितम्बर-अक्टूबर 2020  ) जैसी कहानी लिखी है । इस कहानी को एक श्रेष्ठ कहानी के रूप में चयनित करते हुए प्रसिद्द कथाकार एवं आलोचक हरियश राय जी ने परिकथा के अपने कालम 'हाल फिलहाल की कहानियाँ' (परिकथा अंक नवम्बर दिसम्बर 2020) में जगह देकर उस पर विस्तृत चर्चा की है। लेखक की कथा यात्रा को समझने के लिए मेरे ख्याल से हरियश राय जी की उस विस्तृत टिप्पणी को यहाँ दिया जाना समीचीन होगा।  

इस कहानी को लेकर हरियश राय जी लिखते हैं -

"परिकथा के सितम्बर-अक्टूबर 2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे' कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर, टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है, जिसमें लिखा है कि समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे। अखबार पढ़कर उसे लगता है कि जो दुःख अखबार के पन्ने में दर्ज है, वही दुःख उसके भीतर उमड़ रहा है। तब उसे लॉकडाउन के दौरान अपनी ही लिखी स्टोरी याद हो आई जिसमें उसने तपती धूप में सैकड़ों मील पैदल चलते लोगों के दुःख की कथा कही थी। तभी उसे दस ग्यारह साल की एक छोटी-सी लड़की उस झोंपड़ी में दिखाई देती है जो जूठे बर्तनों को साफ कर रही थी। वह बूढ़ा उसे बताता है कि इस लड़की को उसने कुछ दिन के लिए काम पर रख लिया है। उस लड़की की एक नोट बुक उसके हाथ लगती है। उस नोट बुक को पढ़ने पर उसे पता चलता है कि उसका नाम सुमि है और वह कक्षा पांच में सदर प्राथमिक स्कूल, कटारा में पढ़ती है और लॉक डाउन के दौरान उसके पापा को उसके मालिक ने मारकर भगा दिया। अपने गाँव जाने के लिए उसे कोई गाड़ी, बस नहीं मिली, पुलिस ने उसके पापा की डंडों से पिटाई की और उसके पैसे छीन लिए, चार दिन तक वह पैदल चलती रही, चलते-चलते उसकी माँ गश खाकर गिर गई और मर गई। पुलिस उसकी माँ की लाश को उठाकर ले गई। रास्ते में एक शहर के पास एक स्कूल में उन्हें क्वारंटाइन कर दिया गया, जहाँ गंदगी ही गंदगी थी। वहीं पर उसके पापा को साँप ने काट लिया और पुलिस उसके पापा की लाश को लेकर चली गई और वह अकेली रह गई। अपने माँ बाप की मौत पर वह ग्यारह साल की लड़की अपनी नोट बुक में लिखती है कि कोरोना क्या मारती, उन्हें तो इन सरकारों ने मिलकर मार दिया। सब सरकारें एक जैसी क्यों होती हैं, हत्यारी सरकारें, छिः...उसी नोट बुक से उसे यह भी पता चलता है कि उसका एक सहपाठी था रिजवान नाम का। वह भी पता नहीं कहाँ चला गया। वह उसका इंतजार करती हुई नोट बुक में लिखती है कि रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ? कहानी की वह लड़की उस सरकार को धिक्कारती है जो दिया जलाने और थाली बजाने जैसे उपायों से महामारी का अंत करना चाहती है। इसी दौरान वह टी.वी. पर चल रही बहस का उल्लेख करती है जिसमें श्रमिकों से बसों की दूरी का उल्लेख है और उस राजनीति का उल्लेख, जिसके सरोकार में हाईवे पर पैदल चलते मजदूर नहीं हैं, जिसके सरोकार विदेशों से भारतीयों को सुरक्षित लाना है और इसी राजनीति की सोच की वजह से इनके दुख दुगुने-तिगुने हो गए। पिछले दिनों समय के इतिहास में ऐसे मंजर दर्ज हुए हैं जो सदी की एक त्रासदी के रूप में याद किए जाएंगे । अफसोस इस बात का है यह त्रासदियाँ मनुष्य विरोधी  राजनीति द्वारा क्रूरता पूर्वक रची गयीं। कोरोना के समय में दिहाड़ी मजदूरों की हालत बद से बदतर हो गई। जिस तरह से देश में देश बंदी का एलान किया गया, उसने तबाही के खौफनाक मंजर खड़े किए। बहुत बड़े स्तर पर मजदूरों का,  विकास के हाइवे पर पैदल चलकर जाना किसी यंत्रणा से कम नहीं था और यह यंत्रणा देने वाली राजनीति मूक दर्शक बनकर अपने ही द्वारा रची तबाही को देख रही थी। कोरोना महामारी ने हर तरफ क्रूरता को ही फैलाया जब कि जरूरत करुणा, मानवीयता और मित्रता की थी। हमारे देश में इस कोरोना महामारी ने राजनीति, क्रूरता, अमानवीयता, निर्ममता और असंवेदनशीलता के ऐसे-ऐसे मंजर हमारे सामने खड़े किए जो इतिहास में स्याह हाशिए के रूप में दर्ज होकर सदियों तक मनुष्यता को कुरेदते रहेंगे। इन्हीं स्याह हाशिओं की कहानी रमेश शर्मा ने रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगेमें कही है। कहानी की मूल संवेदना उन मजदूर परिवारों पर केन्द्रित है जो परिवार का पालन करने के लिए, जीविका तलाश करने अपने गाँवों से बाहर निकले थे और लॉकडाउन में अपने गाँव पहुँचने के लिए हजार, पन्द्रह सौ किलोमीटर धूप और गर्मी में पैरों में छाले लेकर और दिलों में दर्द का समंदर लेकर अपने गाँव वापस पैदल चले थे। शासन व्यवस्था के प्रति नफरत का भाव लिए ये लोग चले जा रहे थे। सुमि की नोट बुक इन खौफनाक मंजरों को बयां करती है। कहानी की खूबी यह है कि कहानी इंसानी रिश्तों के निर्माण पर जोर देती है। इसीलिए बूढ़ा सुमि को काम पर रख लेता है। यह जानते हुए कि इसके माँ बाप की मौत रास्ते में ही हो गई है । इन दोनों का रिश्ता पाठकों को बाजारी मनोवृत्ति से उभारता है। इस मजबूत भावानात्मक रिश्ते से कोरोना के विषाणुओं का असर दूर तो नहीं होता, लेकिन उससे उपजे दुःख को कुछ हद तक कम जरूर किया जा सकता है। कहानी में कहा कम गया है और अनकहा बहुत कुछ कह दिया गया है। इसी अनकहे में कहानी कई सवाल पाठकों के सामने रखती है कि छोटे, असुरक्षित श्रमिक, कारीगर, दुकानदार, निर्माण मजदूर इन सबके सामने आजीविका का संकट क्यों और कैसे आ गया? देश के उद्योगों और व्यवसाय को क्यों इतना ज्यादा नुकसान हुआ? कॉर्पोरेट क्षेत्र में बौद्धिक श्रमिकों की छंटनी क्यों की गई? क्यों सर्वोच्च न्यायालय को लॉकडाउन का वेतन देने के लिए सरकार को कहना पड़ा? कहानी इन सारे सवालों को पर्दे के पीछे रखकर कोरोना काल में व्यापक रूप से हुए पलायन के कारण उपजे दुःख को केन्द्र में रखती है और कोरोना काल से उपजे उन भयावह सामाजिक संदर्भों के बीच लाकर पाठकों को खड़ा कर देती है जो सरकार की संवेदनशीलता और निर्ममता की वजह से पैदा हुए। कहानी में रमेश शर्मा ने घटना- स्थितियों के संयोजन से कहानी का रूप गढ़ा है। नोट बुक में लिखी जाने वाली शैली से कहानी के कथ्य को आगे बढ़ाया है। कहानी को ज्यादा प्रभावशील बनाने के लिए टी.वी. की बहस का भी सहारा लिया गया है जो कहानी के फार्म के अनुरूप भी है और जिसका कहानी में औचित्य भी है। कहानी ग्यारह साल की सुमि के माध्यम से यह बात पाठकों के जेहन में रचनात्मक स्तर पर बिठा देती है कि इन खौफनाक मंजरों के मूल में वर्तमान व्यवस्था की निर्ममता, क्रूरता और असंवेदनशीलता ही है, भले ही लोग शासन व्यवस्था की कितनी भी तारीफ क्यों न करें।

हबीब जालिब ने ठीक ही कहा है

चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ !, तुम नहीं चारागर,

कोई माने मगर, मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।

 

हमारे समय के महत्वपूर्ण कथाकार , आलोचक हरियश राय जी की उपरोक्त टिप्पणी केवल लेखक की कहानी को ही नहीं बल्कि संक्रमण काल के उस समूचे दौर की परतों को हमारे सामने रखती है। उनकी इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के माध्यम से ये तथ्य भी सामने खुलते हैं कि लेखक ने अपने उस दौर के अनुभवों की बारीकियों को किस तरह पकड़ा है और उसे कहानी में अभिव्यक्त किया है।

 

इसी क्रम में देखें तो हाल ही में मधुमती पत्रिका के अगस्त 2023 अंक में प्रकाशित रमेश शर्मा की कहानी 'कोई बताए क्या यह संभव है' भी कोरोना काल के उस भयावह दौर की बारीकियों को रेखांकित करती है। इसमें अपने माता पिता और बच्चे को खो चुकी एक तलाकशुदा स्त्री घर में अकेली होकर रह जाने को अभिशप्त है। मृत सदस्यों के इलाज में सारी पूंजी गँवा देने के बाद उसके सामने आजीविका का भीषण संकट है । जहाँ वह काम करती है वहां भावुक हुए बिना हर समय सज-धज कर खुश दिखना निहायत जरूरी है । जीवन के इन्हीं भीषण संकटों के मध्य कहानी में घर के कुछ ऐसे दृश्य और उससे जुड़े संवाद शामिल हैं कि मानवीय स्वभाव अनुसार हम समूचे दृश्य में जीवन जीने के उद्देश्यों को खोजते हुए अपने आप को वहां  प्रक्षेपित करने की कोशिश करने भी लग जाते हैं । तमाम निराशाओं के मध्य कहानी यह सन्देश देने की कोशिश में कामयाब होती है कि निरूद्देश्य जीवन  जीकर भी संभव है कि कोई कभी किसी के काम आ सके। कहानी की बुनावट और भाषा-शिल्प दोनों ही घटनाओं को पूरी मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करते हैं ।

आज यह एक बहस और चिंता का बिषय है कि समकालीन कहानी के परिदृश्य से गाँव के दृश्य लगभग गायब होते जा रहे हैं । अधिकांश लेखक शहरी जीवन में रचे पगे अपने अनुभवों को अपनी अपनी कहानियों में विस्तार देने में लगे हैं । संतोष की बात यह है कि रमेश शर्मा अपनी कथायात्रा में ऎसी धारणाओं को तोड़ते हुए नज़र आते हैं । हाल ही में परिकथा के मई-अगस्त 2023 अंक में प्रकाशित उनकी कहानी 'अपने अपने हिस्से का गाँव' , गाँव और वहां रह रहे ग्रामीणों के प्रति जिस तरह की संवेदना जगाने का प्रयास करती है , उसका उल्लेख करना मैं यहाँ जरूरी समझती हूँ ।

आज का नौकरी पेशा समाज , जिनमें प्रताप मिश्र जैसे ब्यूरोक्रेट्स भी शामिल हैं और जो कभी उसी गाँव में पले बढ़े , उनके भीतर गाँव को औपनिवेशक स्त्रोत मान लेने की एक सोच घर कर चुकी है । उनका परिवार गाँव की ओर जाने से ही बिदकता है । प्रताप मिश्र जैसे रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स कभी कभार गाँव की ओर इसलिए रूख करने को विवश हैं क्योंकि वहां आय के बड़े स्त्रोत के रूप में उनकी जमीनें हैं और उनके फॉर्म हाउस हैं । उनकी देख रेख करने वाला उनका नौकर यूक्रेन युद्ध के उपरांत बनने वाली परिस्थितियों के सदमे से जब गुजर जाता है तब उन्हें गाँव की यात्रा करनी पड़ती है । वहां उन्हें अपने मृत नौकर का बेटा मिलता है जो यूक्रेन युद्ध के बाद अपनी मेडिकल की अधूरी पढ़ाई छोड़कर किसी तरह जान बचाकर घर आया हुआ होता है । डॉलर के मुकाबले रूपये की गिरती कीमत के चलते पिता पर आर्थिक दबाव , उसके ऊपर यूक्रेन का थोपा गया युद्ध, ये कहानी के कुछ ऐसे बिंदु हैं जो वर्तमान हालातों की ओर भी हमारा ध्यान खींचते हैं । किंचित दया के नज़रिए से प्रताप मिश्र द्वारा अपने बेटे के नर्सिंग होम में काम करने का ऑफर दिए जाने पर भी जब वह लड़का गाँव छोड़कर शहर जाना नहीं चाहता बल्कि उनके उसी फॉर्म हाउस की देख-रेख करने को प्राथमिकता देता है तब लगता है कि कहानी गाँव से जुड़ी सुरक्षा और मानवीयता की भावना के पुनर्स्थापन के पक्ष में खड़ी है । कहानी में गाँव से जुड़े कुछ ऐसे दृश्य (डॉक्टर के क्लिनिक इत्यादि) भी आते हैं जिनमें  गाँव की वर्तमान स्थितियों का  बखूबी चित्रण मिलता है।

 

रमेश शर्मा के तीसरे कहानी संग्रह 'उस घर की आँखों से' की समीक्षा करते हुए युवा लेखक बसंत राघव एक जगह लिखते हैं - " कथा लेखन के क्षेत्र में किसी कथाकार के जीवन से जुड़ी उसकी खुद की पृष्ठभूमि का भी एक अहम् रोल होता है जहां तक मैं जानता हूँ , अपनी घुमक्कड़ प्रवृत्ति के कारण रमेश शर्मा को गांव, शहर और महानगरों से जुड़ी जीवन शैली का पर्याप्त अनुभव है। गांव में जन्म लेकर युवावस्था तक वहां जीवन गुजारना और फिर शहर आकर नौकरी करना उनके अनुभव को विस्तार देते हैं यह विस्तार उनके भीतर के कथाकार को समृद्ध करता है इस अनुभविक विस्तार के कारण उनकी कहानियों में भिन्न भिन्न लोगों के बीच  रिश्तों का जो भूगोल है, उसकी व्यापकता को एक बड़ा स्पेस मिलता है ।" (परिकथा अंक जनवरी-अप्रेल 2023)

 

कहानी के साथ-साथ ये सारी बातें लेखक के गाँव से गहरे जुड़े होने के प्रमाण कहे जा सकते हैं।

 

जीवन महज उत्सवधर्मी हो जाने का नाम नहीं है , बल्कि मनुष्य में जीवन को समझ पाने का एक बुनियादी दर्शन भी होना चाहिए । लेखक के तीसरे कहानी संग्रह  का शीर्षक " उस घर की आँखों से" पाठकों के मन में एक कौतूहल पैदा करता है । सुख में जो चीजें अच्छी लगती हैं , जीवन में दुःख का समावेश होने पर कई बार वही चीजें तकलीफ पहुंचाने लगती हैं यह कहानी जीवन में व्याप्त सुख और दुःख के बीच घटित चीजों को देख पाने के बुनियादी दर्शन को परिभाषित करती है सुखनाथ के घर से समुद्र को देखने का जो सुख है वही सुख सुखनाथ के समुद्र में डूब जाने पर उसकी पत्नी के लिए दुःख में परिवर्तित हो जाता है पुरी के महंगे होटलों के मध्य स्थित सुखनाथ के उस घर को महंगे दामों में खरीदने के लिए पूंजीपति लालायित रहते हैं फिर भी सुखनाथ की पत्नी द्वारा अपने पति की इच्छा का सम्मान रखने के लिए घर को किसी पर्यटक के हाथों   बेचे जाने की इच्छा व्यक्त करना मनुष्य जीवन में जीवन मूल्यों (एथिक्स) को बचाए रखने की तरह है     

 

मेरी नज़र में अच्छा कथा लेखक होने के लिए लेखक को अच्छी कहानियों का एक अच्छा पाठक होना भी निहायत जरूरी है । क्या रमेश शर्मा के भीतर एक अच्छे पाठक की मौजूदगी है ? इस सवाल के जवाब में मैं कहूंगी - हाँ, वे कहानियों के एक सुधी पाठक हैं । अच्छी कहानियों की उन्हें बेहतर समझ है । सोशल मीडिया पर मैंने उन्हें बड़ी उदारता पूर्वक दूसरों की लिखी लगभग पचास साठ चुनिन्दा अच्छी कहानियों पर लम्बी लम्बी टिप्पणियाँ लिखते हुए भी पाया है । कहानियों पर लिखी उनकी इन टिप्पणियों को पढ़ने के उपरांत मैं ऐसा महसूस करती हूँ कि उनकी कथा यात्रा में उनके अच्छे पाठक होने का भी एक महत्वपूर्ण योगदान है ।

 

मैंने अपनी इस चर्चा में कथा लेखक रमेश शर्मा की कथायात्रा के महत्वपूर्ण पक्षों को उनकी चुनिन्दा कहानियों के समानांतर रखते हुए अपनी खोज पूर्ण बातों के साथ अन्य स्त्रोतों से प्राप्त टिप्पणियों के माध्यम से आपके सामने रखा है लेखक की अब तक की कथायात्रा और उनकी कहानियाँ हम सबका ध्यान आकृष्ट करती रही हैं , इस नाते उन्हें समकालीन कहानी लेखन और लेखकों की परिधि के भीतर रखते हुए उनका उल्लेख किया जाना आवश्यक है समकालीन कहानी की मुख्य धारा में बने रहने के लिए कथायात्रा में उन्हें अपनी परिपक्वता का प्रमाण आगे भी इसी तरह देते रहना होगा मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं

 

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 उर्मिला आचार्य महत्वपूर्ण कथा लेखिका हैं 

 

उनका निवास -

पांच चौक , सुभाष वार्ड , जगदलपुर बस्तर - 494001

(छत्तीसगढ़) मो.9575665624   

 

 

 

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स्व.रघुनंदन त्रिवेदी मेरे प्रिय कथाकाराें में से एक रहे हैं ! आज 17 जनवरी उनका जन्म दिवस है।  आम जन जीवन की व्यथा और मन की बारिकियाें काे अपनी कहानियाें में मौलिक ढंग से व्यक्त करने में वे सिद्धहस्त थे। कम उम्र में उनका जाना हिंदी के पाठकों को अखरता है। बहुत पहले कथादेश में उनकी काेई कहानी पढी थी जिसकी धुंधली सी याद मन में है ! आदमी काे अपनी चीजाें से ज्यादा दूसराें की चीजें  अधिक पसंद आती हैं और आदमी का मन खिन्न हाेते रहता है ! आदमी घर बनाता है पर उसे दूसराें के घर अधिक पसंद आते हैं और अपने घर में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! आदमी शादी करता है पर किसी खूबसूरत औरत काे देखकर अपनी पत्नी में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! इस तरह की अनेक मानवीय मन की कमजाेरियाें काे बेहद संजीदा ढंग से कहानीकार पाठकाें के सामने प्रस्तुत करते हैं ! मनुष्य अपने आप से कभी संतुष्ट नहीं रहता, उसे हमेशा लगता है कि दुनियां थाेडी इधर से उधर हाेती ताे कितना अच्छा हाेता !आए दिन लाेग ऐसी मन: स्थितियाें से गुजर रहे हैं , कहानियां भी लाेगाें काे राह दिखाने का काम करती हैं अगर ठीक ढंग से उन पर हम अपना ध्यान केन्...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सो...

गंगाधर मेहेर : ओड़िया के लीजेंड कवि gangadhar meher : odiya ke legend kavi

हम हिन्दी में पढ़ने लिखने वाले ज्यादातर लोग हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के कवियों, रचनाकारों को बहुत कम जानते हैं या यह कहूँ कि बिलकुल नहीं जानते तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।  इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ओड़िसा राज्य के संबलपुर शहर में स्थित गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर वक्ता वहां जाकर बोलने का अवसर मिला ।  2 और 3  मार्च 2019 को आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जिस शख्श के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण हुआ है वे ओड़िसा राज्य के ओड़िया भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं और उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से  ओड़िसा राज्य को देश के नक़्शे में थोड़ा और उभारा है। वहां जाते ही इस कवि को जानने समझने की आतुरता मेरे भीतर बहुत सघन होने लगी।वहां जाकर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों से , वहां के विद्यार्थियों से गंगाधर मेहेर जैसे बड़े कवि की कविताओं और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी जुटाना मेरे लिए बहुत जिज्ञासा और दिलचस्पी का बिषय रहा है। आज ओड़िया भाषा के इस लीजेंड कवि पर अपनी बात रखते हुए मुझे जो खु...

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था ...

30 अक्टूबर पुण्यतिथि पर डॉ राजू पांडे को याद कर रहे हैं बसंत राघव "सत्यान्वेषी राजू पांडेय के नहीं होने का मतलब"

डॉक्टर राजू पांडेय शेम शेम मीडिया, बिकाऊ मीडिया, नचनिया मीडिया,छी मीडिया, गोदी मीडिया  इत्यादि इत्यादि विशेषणों से संबोधित होने वाली मीडिया को लेकर चारों तरफ एक शोर है , लेकिन यह वाकया पूरी तरह सच है ऐसा कहना भी उचित नहीं लगता ।  मुकेश भारद्वाज जनसत्ता, राजीव रंजन श्रीवास्तव देशबन्धु , सुनील कुमार दैनिक छत्तीसगढ़ ,सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स जैसे नामी गिरामी संपादक भी आज मौजूद हैं जो राजू पांंडेय को प्रमुखता से बतौर कॉलमिस्ट अपने अखबारों में जगह देते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता जन सरोकारिता और निष्पक्षता से परिपूर्ण रही है।  आज धर्म  अफीम की तरह बाँटी जा रही है। मेन मुद्दों से आम जनता का ध्यान हटाकर, उसे मशीनीकृत किया जा रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के क्षेत्र में गिरावट महसूस की जा रही है। राजू पांंडेय का मानना था कि " आज तंत्र डेमोक्रेसी  इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है ,जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है।" स्थिति इतनी भयावह हो गई ...

डॉक्टर परिधि शर्मा की कहानी - ख़त

  शिवना नवलेखन पुरस्कार 2024 अंतर्गत डॉक्टर परिधि शर्मा के कहानी संग्रह 'प्रेम के देश में' की पाण्डुलिपि अनुसंशित हुई है। इस किताब का विमोचन फरवरी 2025 के नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में शिवना प्रकाशन के स्टाल पर  किया जाएगा । यहाँ प्रस्तुत है उनकी कहानी  'ख़त' कहानी:    ख़त डॉ . परिधि शर्मा _______________ रात की सिहरन के बाद की उदासी ठंडे फर्श पर बूंद बनकर ढुलक रही थी। रात के ख़त के बाद अब कोई बात नहीं बची थी। खुद को संभालने का साहस भी मात्र थोड़ा-सा बच गया था। ख़त जिसमें मन की सारी बातें लिखी गईं थीं। सारा आक्रोश , सारे जज़्बात , सारी भड़ास , सारी की सारी बातें जो कही जानी थीं , पूरे दम से आवेग के साथ उड़ेल दी गईं थीं। ख़त जिसे किसी को भी भेजा नहीं जाना था। ख़त जिसे किसी को भेजने के लिए लिखा गया था। कुछ ख़त कभी किसी को भेजे नहीं जाते बस भेजे जाने के नाम पर लिखे जाते हैं। खिड़की के कांच के उस ओर खुली हवा थी। हवा के ऊपर आकाश। पेड़ पौधे सबकुछ। आजादी। प्रेम में विफल हो जाने के बाद की आजादी की तरह। खिड़की के पास बैठे हुए आकाश कांच के पार से उतना नंगा नहीं...

समकालीन कहानी : अनिल प्रभा कुमार की दो कहानियाँ- परदेस के पड़ोसी, इंद्रधनुष का गुम रंग ,सर्वेश सिंह की कहानी रौशनियों के प्रेत आदित्य अभिनव की कहानी "छिमा माई छिमा"

■ अनिल प्रभा कुमार की दो कहानियाँ- परदेस के पड़ोसी, इंद्रधनुष का गुम रंग अनिलप्रभा कुमार की दो कहानियों को पढ़ने का अवसर मिला।परदेश के पड़ोसी (विभोम स्वर नवम्बर दिसम्बर 2020) और इन्द्र धनुष का गुम रंग ( हंस फरवरी 2021)।।दोनों ही कहानियाँ विदेशी पृष्ठ भूमि पर लिखी गयी कहानियाँ हैं पर दोनों में समानता यह है कि ये मानवीय संवेदनाओं के महीन रेशों से बुनी गयी ऎसी कहानियाँ हैं जिसे पढ़ते हुए भीतर से मन भींगने लगता है । हमारे मन में बहुत से पूर्वाग्रह इस तरह बसा दिए गए होते हैं कि हम कई बार मनुष्य के  रंग, जाति या धर्म को लेकर ऎसी धारणा बना लेते हैं जो मानवीय रिश्तों के स्थापन में बड़ी बाधा बन कर उभरती है । जब धारणाएं टूटती हैं तो मन में बसे पूर्वाग्रह भी टूटते हैं पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इन्द्र धनुष का गुम रंग एक ऎसी ही कहानी है जो अमेरिका जैसे विकसित देश में अश्वेतों को लेकर फैले दुष्प्रचार के भ्रम को तोडती है।अजय और अमिता जैसे भारतीय दंपत्ति जो नौकरी के सिलसिले में अमेरिका की अश्वेत बस्ती में रह रहे हैं, उनके जीवन अनुभवों के माध्यम से अश्वेतों के प्रति फैली गलत धारणाओं को यह कहान...