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अप्रैल, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुस्तक समीक्षा "छोटी आंखों की पुतलियों में" देवेश पथ सारिया की ताइवान डायरी

एक अलहदा अनुभव है छोटी आँखों की पुतलियों से दुनिया को देखना- रमेश शर्मा ताइवान डायरी 'छोटी आंखों की पुतलियों में' देवेश पथ सारिया युवा कवि देवेश पथ सरिया की कविताओं को पढ़ने के कई अवसर मेरे हाथ लगे हैं। भौतिक शास्त्र के पोस्ट डॉक्ट्रल फेलो होने के बावजूद हिन्दी साहित्य के प्रति गहरी रूचि और प्रतिबद्ध इमानदारी , मौलिक शैली और गंभीर अभिव्यक्ति के जरिये उन्होंने अपनी कविताओं के लिए एक समृद्ध पाठक वर्ग तैयार किया है। देवेश के भीतर मौजूद गद्यकार को जानने समझने के अवसर अब तक कम मिले, यद्यपि उनकी हाल फिलहाल प्रकाशित एक दो कहानियों के माध्यम से मैंने महसूस किया कि उनके भीतर का यह हुनर भी एक नए आकार में देर सवेर हमारे सामने आएगा और पाठकों को चकित करेगा। हाल ही में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित होकर आयी उनकी ताइवान डायरी की किताब 'छोटी आँखों की पुतलियों से' उनके भीतर मौजूद उसी गद्यकार को थोड़ा और विस्तार देती है । उनके भीतर मौजूद गद्य लेखन का यह हुनर हमें आश्वस्त करता है कि आगे चलकर इस युवा रचनाकार से हमें बहुत कुछ ऐसा पढ़ने को मिलेगा जो हमारी पाठकीय परिपक्वता को विस्तार देते हुए हमें सं

केलो नदी : गांधीवादी मॉडल की अनदेखी और विकास के दुष्चक्र में फंसी नदियाँ

केलो नदी की समस्या को लेकर अनुग्रह में एक आलेख प्रकाशित हुआ था "रायगढ़ की जीवन रेखा केलो का शोक गीत" । उस आलेख को लेकर हमें कुछ महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं। लेखक और विचारक डॉ हेमचंद्र पांडे और युवा कवि लेखक बसंत राघव की इन प्रतिक्रियाओं से सम्भव है इस बहस को आगे और जगह मिले । इन दोनों ही प्रतिक्रियाओं को अनुग्रह के पाठकों के लिए हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं - ◆१◆ अनुग्रह के 06/04/2023 के अंक में रमेश जी के द्वारा लिखित रायगढ़ की जीवन रेखा 'केलो' का शोक गीत हम रायगढ़ वासियों के द्वारा अनसुना ही रह गया । बसंत राघव के अलावा  किसी ने भी अत्यंत ज्वलंत समस्या पर केंद्रित इस जरूरी आलेख पर कोई टिप्पणी नहीं की। डॉ. हेमचन्द्र पांडेय  यह मौन और उदासीनता ही वे कारण हैं कि रायगढ़ मानों आत्मघात की दहलीज पर जा पहुंचा है। रमेश जी के इस आलेख का प्रत्यक्ष संदर्भ स्थानीय जरूर है पर, निहितार्थ सार्वभौमिक है। केलो के स्थान पर विश्व की किसी भी नदी का नाम रखा जा सकता है और रायगढ़ के स्थान पर किसी भी अन्य धुंधियाये औद्योगिक नगर या महानगर का नाम डाला जा सकता है ; तब भी आलेख का वर्

केलो नदी Kelo Nadi : रायगढ़ की जीवन रेखा ‘केलो’ का शोक गीत

रायगढ़ को कला , साहित्य , सांस्कृतिक सभ्यता और ओद्योगिक स्थापना इत्यादि किन्हीं भी क्षेत्रों में जिन भी प्रतीकों के माध्यम से अब तक हम जानते-समझते रहे हों , अगर उन प्रतीकों में रायगढ़ की जीवन रेखा कही जाने वाली केलो नदी हमसे कहीं छूट रही हो तो समझिये कि हमसे बहुत कुछ छूट सा रहा है ।   जबकि आदि काल से देश दुनियाँ में नामचीन जगहों की पहचान उन क्षेत्रों में बहने वाली नदियों से ही अक्सर हुआ करती रही है , ऐसे में रायगढ़ शहर अपने परिचय की इस सांस्कृतिक परम्परा से भला कैसे बाहर हो सकता है ? प्रयागराज का जिक्र होते ही जिस तरह गंगा नदी हमारी चेतना में बह उठती है,  बिलासपुर का नाम लेते ही अरपा नदी हमारी स्मृतियों को जिस तरह छूने लगती है , जिस तरह इन्द्रावती नदी का नाम आते ही समूचा बस्तर हमारी आँखों के सामने आ जाता है , ठीक उसी तरह रायगढ़ शहर भी केलो नदी के साथ नाभिनालबद्ध है। केलो नदी रायगढ़ छत्तीसगढ़  समय के साथ सांस्कृतिक सभ्यता की अपनी इस जीवन यात्रा में आज से तीस-चालीस साल पहले जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो जिन घटकों को अपने बचपन और किशोरावस्था के बहुत करीब पाता हूँ उन गिने-चुने घटकों में केलो न

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। यहां की सुंदरता और श

महामाया मंदिर रतनपुर की यात्रा

महामाया मंदिर   रतनपुर की यात्रा का संस्मरण आज मैं आपके लिए लेकर आया हूँ। इस मंदिर को लेकर लोगों के बीच काफी चर्चाएँ मैंने सुनी थीं सो यहाँ जाना हमने तय किया। महामाया मंदिर भारत के  छत्तीसगढ़   में बिलासपुर जिले के   रतनपुर में स्थित देवी दुर्गा और महालक्ष्मी को समर्पित एक मंदिर है जो कि भारत के 52 शक्ति पीठों में से एक मानी जाती है । रतनपुर एक छोटा सा शहर है जहाँ मंदिरों और तालाबों की अधिकता है । हम जब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से सड़क मार्ग से निकले तो हमने चेक किया कि इसकी दूरी बिलासपुर जिला मुख्यालय से लगभग 26 किमी है। बिलासपुर से वहां तक पहुँचने में हमें आधे घंटे का सफ़र तय करना पड़ा। बीच में रूककर कहीं चाय वगेरह भी लिया जा सकता है क्योंकि रास्ते भर आपको जगह जगह चाय ठेले दिख पड़ेंगे। महामाया मंदिर रतनपुर  जानकारी के मुताबिक देवी महामाया, देवी दुर्गा का एक रूप है जिसे कोसलेश्वरी देवी के रूप में भी जाना जाता है , जो पुराने दक्षिण कोसल क्षेत्र (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य) की अधिष्ठात्री देवी कही जाती हैं। इतिहास के मुताबिक़ यह मंदिर रतनपुर के कलचुरी शासन काल के दौरान   12वीं-13वीं शताब्दी में

SHIVRINARAYAN MANDIR KI YATRA : शिवरीनारायण मंदिर की यात्रा

शिवरीनारायण का नाम हमने बहुत सुना था। हमें जो जानकारी मिली थी उसके अनुसार शिवरीनारायण प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण नगर है जो "छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी" के नाम से भी लोक में विख्यात है। एक बार जब बिलासपुर गए तो संयोग से बाई रोड़ रायगढ़ लौटते समय शिवरीनारायण से होकर लौटना हुआ। समय था तो हम शिवरीनारायण मंदिर परिसर के सामने अपनी चारपहिया रोककर सोच में पड़ गए कि परिसर के भीतर जाएं कि नहीं जाएं। शिवरीनारायण मंदिर प्रवेश द्वार  परिधि , प्रतिमा सबकी इच्छा हुई कि आए हैं तो मंदिर दर्शन करके ही जाएं । इसकी दूरी का अगर मोटे तौर पर छत्तीसगढ़ के अलग अलग जगहों से आकलन करें तो यह बिलासपुर से 64 कि. मी. , राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार होते हुए 120 कि. मी. , जांजगीर   जिला मुख्यालय से 45 कि. मी. ,  कोरबा   जिला मुख्यालय से 110 कि. मी. और रायगढ़ जिला मुख्यालय से सारंगढ़ होते हुए   110 कि. मी. की दूरी पर स्थित है। मंदिर परिसर में परिधि और प्रतिमा  धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक स्कंद पुराण में इस पवित्र स्थल को  श्री पुरूषोत्तम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है। वहां के स्थानीय लोगों के माध्यम से हमे