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परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला वागर्थ के फरवरी 2024 अंक में है। कहानी विभिन्न स्तरों पर जाति धर्म सम्प्रदाय जैसे ज्वलन्त मुद्दों को लेकर सामने आती है।  पालतू कुत्ते झब्बू के बहाने एक नास्टेल्जिक आदमी के भीतर सामाजिक रूढ़ियों की जड़ता और दम्भ उफान पर होते हैं,उसका चित्रण जिस तरह कहानी में आता है वह ध्यान खींचता है। दरअसल मनुष्य के इसी दम्भ और अहंकार को उदघाटित करने की ओर यह कहानी गतिमान होती हुई प्रतीत होती है। पालतू पेट्स झब्बू और पुत्र सोनू के जीवन में घटित प्रेम और शारीरिक जरूरतों से जुड़ी घटनाओं की तुलना के बहाने कहानी एक बड़े सामाजिक विमर्श की ओर आगे बढ़ती है। पेट्स झब्बू के जीवन से जुड़ी घटनाओं के उपरांत जब अपने पुत्र सोनू के जीवन से जुड़े प्रेम प्रसंग की घटना उसकी आँखों के सामने घटित होते हैं तब उसके भीतर की सामाजिक जड़ता एवं दम्भ भरभरा कर बिखर जाते हैं।

जाति, समाज, धर्म जैसे मुद्दे आदमी को झूठे दम्भ से जकड़े रहते हैं। इनकी बंधी बंधाई दीवारों को जो लांघता है वह समाज की नज़र में दोगला होने लगता है।

जाति धर्म की रूढ़ियों में जकड़ा समाज मनुष्य को दम्भी और अहंकारी भी बनाता है। कहानी इन दीवारों को लांघने और एक स्वस्थ और खुशहाल समाज के निर्माण पर बल देती है।

कहानी का अंत रोचक है।दोगला होने की परिभाषाएं आदमी अपने हिसाब से किस तरह गढ़ लेता है ?यह सवाल कहानी के भीतर गूंजता है। कहानी की इन अंतिम पंक्तियों पर पाठक का ध्यान आकर्षित होता है-

"सोनू की गोद में बैठा झब्बू मेरी ओर ही देख रहा था। यद्यपि झब्बू की खुशी भी उसकी आंखों से साफ झलक रही थी, मगर मुझे तब भी लग रहा था जैसे उसकी आंखों में शिकायत हो कि बेटे से भिड़ना पड़ा तो शरणागत हो गए। अपनी बारी आते ही जाति और नस्ल के सवाल यूं हवा हो गए।"



अनुग्रह के पाठकों के लिए यह कहानी वागर्थ से साभार ली गयी है। 


■ दोगला 


 

झब्बू शरीर और बुद्धि दोनों ही दृष्टि से असाधारण निकला। बमुश्किल वह सात दिन का रहा होगा जब सोनू ने मुझसे आकर अधीर होते हुए कहा, ‘बाबू, पड़ोस की आंटी जी हमको एक दे देंगी।’


मैं अपने काम में उलझा हुआ था। सहसा कुछ समझ में नहीं आया कि सोनू किस चीज की बात कर रहा है। मुझे चुप देखकर उसने फिर कहा, ‘बाबू हम पालेंगे।’


‘क्या बेटा, क्या पालोगे?’ मैंने पूछा।


‘कुत्ता। आंटी जी दे रही हैं।’ सोनू ने कहा।


‘आंटी जी कुत्ता दे रही हैं?’ मैंने सोनू की बात को यूं ही मजाक में उड़ाते हुए आगे कहा, ‘क्या मुसीबत है यार, साफ कहो न।’ सोनू इस मजाक से रुआंसा हो गया। मगर उसकी मां ने बात की डोर संभालते हुए आगे बढ़कर जवाब दिया, ‘तुम्हें बस मजाक सूझता है। आंटी जी कुत्ता दे नहीं रही हैं, सोनू माँग रहा है। पड़ोस की मिसेज नायर के यहां नहीं है एक अलसेसियन, सफेद कुतिया! उसके तीन बच्चे हुए हैं। हमारा सोनू रोज तंग करता है कि हमें भी पालना है कुत्ता।’ मुझे मनाने की गरज से सोनू की मां ने समझाते हुए आगे और जोड़ दिया, ‘अकेला है बिचारा, न भाई न बहन! तुम चले जाते हो दफ्तर, और घर में भी रहते हो तो अपने में डूबे हुए। पाल लेने दो न, गुर्राये रहते हो हमेशा। कभी तो बात माना करो।’


‘मैं गुर्राये रहता हूँ तो फिर एक और गुर्राने वाले को पालने की जरूरत क्या है।’ मैंने मुस्कराते हुए कहा। सोनू का चेहरा भी इस मजाक से खिल गया। उसकी मां तो खैर खुश हुई ही। मगर इस मजाक के कारण ही मैं फंस गया। सोनू मेरे तने हुए चेहरे को देखकर अक्सर मन की बात भी व्यक्त नहीं करता। हमेशा डरा सहमा रहता है।


पेंसिल तक मंगानी हो तो मां के मार्फत बात मुझ तक आती है। मैं स्वयं प्रयत्न करता कि अपने इकलौते बेटे से इस तरह दूरियां बनाकर न चलूं, मगर कुछ तो संस्कार और कुछ लिखने पढ़ने की रुचि। दूरियां कुछ बन ही गईं। दूरियों का आलम कुछ ऐसा है कि कयामत से कयामत तक पिक्चर नई टाकीज में लगकर धूम मचा रही थी और सोनू उसकी खूब तारीफ अपने मित्रों से सुन सुनकर बेताब भी हो रहा था, मगर हमारे खौफ से कह नहीं पाता था। एक दिन इतवार की शाम फ्री होने के कारण मैं टीवी पर फिल्म देख रहा था परिवार के साथ ही। सोनू ने धीरे से कहा- ‘बाबू, सिनेमा हाल में देखने पर कोई फिल्म कितनी अच्छी लगती है न, बड़े परदे पर।’


मैं तत्काल समझ गया कि सोनू कहना क्या चाहता है। मुझे अपने आपपर गुस्सा भी आया। मैंने अपने अपराध बोध को दबाते हुए उत्साहपूर्वक कहा, ‘बेटे सोनू, तू है यार सत्रह साल का। मगर बातें करता है बच्चों की तरह। अगले बरस कालेज में चला जाएगा तू। अनुशासन का यह मतलब तो नहीं कि डरकर जियो। देख आया करो न पिक्चर भई हाल में।’


सोनू ने लजाते हुए कहा, ‘बाबू, मेरा यह मतलब नहीं था। फिर हम अभी तक शहर के नए सिनेमा हाल में भी तो नहीं गए। सुनते हैं कि बहुत अच्छा बना है। चार-पांच माह बने हो गए मगर हम गए नहीं।’


मैंने कहा, ‘बेटा जी, साफ कहो न कि फिल्म देखनी है। बनो मत। अच्छा चलेंगे कल छुट्टी लेकर।’ और वाकई मैं उस नए सिनेमा हाल में सोनू के कारण गया।


कुछ इस तरह सोनू से सांकेतिक भाषा में काम चलता गया था तब। अब सोनू को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता कि यह कल का वही सोनू है जो मेरे सामने दुबका सा रहता था और हर बात समय और मूड देखकर सहमते हुए कहता था। उस दिन मुझे प्रसन्न देखकर ही सोनू ने कुछ जोर डालते हुए कहा कि उसे हर हाल में एक कुत्ता पालना ही है।


उसके स्वर के सधाव और संकल्प को देखकर मैं अंततः मान गया। स्वर से ही मनुष्य के भीतरी संकल्प और आत्मज्ञान का प्रमाण मिलता है। इसीलिए स्वर व्यक्तित्व का विशिष्ट अंग माना जाता है। उस दिन सोनू ने कुछ इस ढंग से कहा कि हमेशा कुत्ता-विरोधी होकर भी मैं विरोध न कर सका। वरना कुत्ता पालने वालों तक से मैं बिदकता हूँ।


पता नहीं कैसे लोग दो–दो तीन–तीन और कई लोग तो दर्जनों कुत्ते पाल लेते हैं। मुझे हमेशा लगता कि मनुष्यों से मिली अस्वीकृति या आदमियों से बनी हुई दूरी के संत्रास से बचने के लिए ही कुत्ता प्रेमी हो जाते है। यद्यपि खोजने वालों को कुत्ते में गुण ही गुण नजर आते हैं। मगर मैं हमेशा थोड़ी–सी सुविधा या एक टुकड़ा प्राप्त करते ही कुकुवाने वाले उस जीव से नफरत करता रहा हूँ।


एक और कारण है। हमारे खानदान में बाबा जी के जमाने में एक कुत्ता था। उसे बाबा जी ने बहुत प्यार से पाला। कुत्ता था भी फरमाबरदार। मगर पता नहीं एक दिन कैसे उसका दिमाग फिरा कि वह लगा दौड़कर काटने। उससे हमारे गांव के चार पांच लोग आहत हो गए। उसके बाद उस कुत्ते को बांधकर मारा गया।


उस दिन घर में खाना नहीं बना। हम सब बच्चे मरे हुए कुत्ते को याद कर हफ्तों दुखी होते रहे।


तब से कुत्तों पर से मेरा विश्वास उठ गया। लगता यही था कि अच्छी परवरिश और देखभाल से कुत्ते का दिमाग फिर जाता है। मैं किसी दंभी और पाखंडी आदमी तक को देखकर यही दावा करता था कि कहीं न कहीं उसके भीतर कुत्तेगिरी का ऐब है कि सुविधा और संरक्षण  पाते ही काटने दौड़ने लगता है।


मगर जब सोनू ने मुझे इस तरह बहुत अजीजी से कहा कि बाबू, पालना ही है तो मैं मना न कर सका। और मेरे हाँ करते ही सोनू कुछ इस तरह प्रसन्न हुआ जैसे बोनस की घोषणा सुनकर कारखाने के श्रमिक प्रमुदित हो जाते हैं। और दूसरे दिन झब्बू हमारे घर का चौथा सदस्य बनकर आ धमका।


झब्बू तब मात्र एक सप्ताह का था। नामकरण उसका करीब छह माह बाद तब हुआ जब अच्छी खिलाई पिलाई से उसके कद के साथ बाल भी निकल आए। खूब बड़े-बड़े। उसके सारे शरीर में लंबे-लंबे बालों को देखकर ही सोनू ने बाद में उसका नाम झब्बू रखा।


पहले दिन तो वह दूध तक पीने में असमर्थ रहा। सोनू की मां ने चिंतित होकर कहा, ‘बेटा, नायर आंटी से महीने भर बाद मांग लाना, अभी नहीं संभलेगा।’ मगर सोनू को लगता था कि अगर इस अवसर पर वह चूक गया तो फिर जानें बाबू उसे अनुमति दें कि नहीं।


जिसके प्रति मन आश्वस्त नहीं रहता उसकी सहमति भी स्थायी नहीं लगती। सोनू को मैंने आश्वस्त भी किया, मगर वह माना नहीं। उसने गोद में झब्बू को बिठाकर निप्पल से दूध पिलाया। कुछ देर की ना-नुकुर के बाद झब्बू ने निप्पल से दूध पीना शुरू भी कर दिया। कुछ देर कां कूं करने के बाद पहले ही दिन वह सोनू के साथ निश्चिंत हो गया।


धीरे-धीरे झब्बू की आंखें खुलीं। वह संभलकर चलने लगा। सुबह क्वार्टर के बाहर सड़क पर भी टहलने लगा। सोनू उसे कंधे पर उठाकर बड़ी शान से घूमता, जैसे अपने छोटे भाई को गोद में लेकर चल रहा हो।


कुछ दिनों बाद झब्बू ने बहुत धीमी आवाज में भौंकना शुरू कर दिया। सोनू उसे निर्देश देता तो वह निर्देशित दिशा में भूं भूं कर दौड़ पड़ता। कुछ और बड़ा हुआ तो दो पांवों पर खड़े होकर नमस्ते करने का उसे अभ्यास हो गया। सोनू खेल-खेल में स्केल पेन लाने को कहता तो झब्बू बखूबी दौड़कर ले आता। मैं स्वयं धीरे-धीरे झब्बू की ओर आकर्षित होने लगा। एक दिन झब्बू के लिए सोलह रुपये खर्च कर विशेष स्नान के लिए पावडर का पैकेट ले गया। सोनू को उस दिन बहुत खुशी हुई।


समय पर हर तरह की दवा झब्बू को दी गई और वह दिन प्रतिदिन विकसित होने लगा। डी. ओमिंग के लिए इन्जेक्शन लगा। वाइमराल दवा झब्बू के बालों के लिए मैं ले आया।


धीरे-धीरे सोनू के साथ ही मैं भी झब्बू से जुड़ता चला गया। और ठीक उसी तरह झब्बू भी मेरे करीब पहुंचने लगा। मैं आफिस से घर पहुंचता तो सोनू भले ही अपने काम में मशगूल रहने के कारण घंटों नहीं मिल पाता, मगर झब्बू कुछ इस तरह बेताब होकर मिलता जैसे दिन भर मेरी ही प्रतीक्षा करता रहा हो।


सोनू तो झब्बू के बढ़ते प्रभाव को देखकर कभी अपनी मां से कहता भी कि मां, लाया तो मैं हूँ झब्बू को, मगर बाबू से ज्यादा जमती है उसकी। उसकी माँ हँसकर जवाब देती, ‘बेटा, बात को समझ। सोनू छोकरा है, तुझे शाम को घूमने जाना है, खेलना है। झब्बू के लिए तू समय नहीं दे पाता। मगर तुम्हारे बाबू दफ्तर से आने के बाद उसके साथ खेलते हैं खूब। जानवर भी विशेष स्नेह के आगे नतमस्तक हो जाता है। सुविधाएं नहीं, बल्कि हार्दिक प्रेम ही एक जीव को दूसरे से जोड़ता है।’ सोनू को मां की लंबी चौड़ी व्याख्या से बोरियत होती। मगर वह खुश जरूर होता कि कुत्ता विरोधी उसके पिता अंततः कुत्ते के होकर रह गए। मगर इसमें केवल मेरे स्नेह के कारण ही हमारे संबंधों में प्रगाढ़ता नहीं आई।


वस्तुतः झब्बू का अति उत्साह और प्रेम ही ऐसा था कि मैं उसकी ओर खिंचता चला गया। सोनू की मां मेरे बढ़ते स्नेह के ग्राफ को देखकर कुछ चितिंत जरूर हुई, मेरी आदत के कारण। वह जानती है कि मैं या तो किसी को जी भर स्नेह दूंगा और किसी भी सीमा तक बढ़ चलूंगा। मगर साथ ही हल्का–सा झटका मिला नहीं कि मैं विद्वेष से भर भी जाऊंगा। मेरा स्वभाव ही ऐसा है तो बिचारे झब्बू की क्या बिसात। वह कहती भी कि तुम्हारे अतिप्रेम से झब्बू के भविष्य को लेकर मुझे चिंता हो जाती है।


‘क्यों?’ मैं पूछता।


‘तुम्हारी आदत के कारण।’


‘कैसी आदत?’


‘अति वाली आदतें। या तो किसी को जी जान से चाहोगे। उसकी गुलामी तक कुबूल करने में सुख अनुभव करोगे, या फिर उसकी शकल ही देखना गवारा नहीं करोगे। थोड़ी-सी ठोकर लगी कि लगे बिलबिलाने।’


पत्नी की व्याख्या से मुझे हँसी आ जाती। व्यक्ति मर्यादा या विवशता के कारण जब अपने मन की व्यथा सीधे ढंग से नहीं रख पाता तो अन्य अवसरों का भरपूर लाभ लेकर हल्का होना चाहता है।


झब्बू के बहाने सोनू की मां अपने घावों को ही सहला रही थी। मैंने उसे आश्वस्त करते हुए कहा कि आदमी की और बात है। स्वार्थ, अवसरवादिता और महत्वाकांक्षा की बीमारी लेकर चलता है आदमी। कुत्ते को लेकर इस तरह की तुम्हारी चिंता बेमानी है।


लगता था कि वह भी हुज्जत करने के लिए कमर कसे बैठी थी। उसने जवाब देते हुए कहा, ‘आदमी और कुत्ते की बात नहीं है, बात है अपने मन की बनावट की। चोट खानेवाले तो कहीं भी चोट खा जाते हैं। और संभलनेवाले भी एक छोटा-सा आसरा पाकर संभल जाते हैं। कुत्ता भी गलती कर सकता है। तुम्हें नाराज होने के लिए तो छोटा सा कारण भी पर्याप्त से कहीं अधिक होता है।’ वाकई उस दिन मैं निरुत्तर हो गया। मगर झब्बू के प्रति मेरे प्रेम में सतत विकास होता चला गया। वह और हिल गया। धीरे-धीरे झब्बू की आदतें बदलने लगीं।


मैं सोच रहा था कि अलसेसियन मां-बाप की पैदाइश है झब्बू। मगर उसके झब्बूपने से जब मुझे संदेह हुआ, देहयष्टि और झबरीले बालों के कारण तब ज्ञात हुआ कि झब्बू क्रासबीड है। दोगला है। असलेसियन मां और सड़क छाप कुत्ते के मेल से जन्मा एक दोगला। मुझे यह जानकर दुख हुआ। पाला भी पड़ा तो दोगले से। मैंने लंबी सांस खींचते हुए सोनू की मां से कहा, मगर विवश था। तब तक मैं उस दोगले के प्रेम में डूब चुका था। इतने दिनों में ही झब्बू ने हम सबको इतना मोह लिया था कि वह अपने स्वभाव के कारण हमारी आंखों का तारा ही बना रहा। उसके गुण के कारण मैं भूल सा गया कि वह एक दोगली नस्ल का कुत्ता है।


नस्ल से गुण को जोड़ना बेमानी है, यह मैंने धीरे-धीरे समझा। झब्बू के सारे गुण प्रशंसनीय थे। आज्ञाकारी, समझदार, बुद्धिमान और विश्वसनीय था झब्बू।


कद के साथ उसके भीतरी गुणों में भी इजाफा हुआ। दहाड़ता था तो लगता था जैसे जंगल में शेर ललकार रहा हो। उसकी थूथन का रंग एकदम लाल था। काली और चमकती आंखें थीं। स्नेह और क्रोध को अभिव्यक्त करने के लिए किस तरह झब्बू अपनी आंखों का त्वरित और चमत्कारिक इस्तेमाल छुटपन में ही करता था, यह देखने की चीज थी। विरोध और समर्थन का जिस तरह अपनी आंगिक प्रतिक्रियाओं से वह प्रदर्शन करता था उसे देखकर मैं हतप्रभ रह जाता था।


हम झब्बू की चुस्ती, सक्रियता और हिम्मत से इतने आश्वस्त हो गए थे कि उसके भरोसे घर खुला छोड़कर चार छह घंटों के लिए कहीं भी चले जाते और आकर घर को हर तरह से जस का तस पाते। एक अवसर पर तो हम बारह घंटे बाहर रहे उसके कंधों पर घर का भार छोड़कर।


इधर सोनू इन तीन बरसों में पी.ई.टी. में सफलता प्राप्त कर रायपुर के इंजीनियरिंग कालेज में चला गया। वहीं हास्टल में रहने लगा। छुट्टियों में आता तो झब्बू से लिटलिटाता। वहां से पत्र भी लिखता कि झब्बू की बहुत याद आती है। मैं पत्र पाकर उसकी मां को कहता भी कि मां-बाप गए चूल्हे में, झब्बू की याद करने बैठ जाता है। उसकी मां कहती कि झब्बू को याद करता है, हम तो वैसे ही उसके मन प्राण में बसे हैं। मैंने कहा, ‘मन प्राण में हमारे वह बसा है, हम क्यों बसने लगे, बस यही तो ममता है, श्रीमती जी। जो तुम्हारे मन में है उसी को बेटे के मन में मान लेती हो। सोनू बेटा है, मां नहीं।’ उसकी मां तर्कों से परास्त होकर चुप हो जाती।


दूसरे वर्ष तक तो सब ठीक चला, मगर ज्यों ही सोनू ने तीसरे वर्ष में प्रवेश किया, उसकी अपनी निजी सक्रियता बढ़ने लगी। वह घर भी कम आने लगा। उसकी मां चिंतित होती तो मैं कह देता कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई है, समय नहीं मिलता। बीच-बीच में वह आता भी, मगर एक दिन रुक कर चला जाता। इस तरह वह पांचवें वर्ष में चला गया। पढ़ाई में तो तेज तर्रार था ही।


इधर झब्बू को बाकायदा समय–समय पर मैं हर तरह की गोलियां देता रहा। उसका ख्याल सोनू की तरह रखता था। पौरुष विरोध के लिए इंजेक्शन का प्रभाव जहां खत्म होता कि झब्बू मस्तियाने लगता। मैं हर हाल में झब्बू को सड़क छाप नहीं बनने देना चाहता था। मैंने हमेशा प्रयास किया कि झब्बू संभलकर रहे। इधर–उधर मुंह न मारे।


मैं बहुत सतर्क था। उस दिन घर में आकर बिगड़ा भी कि क्या हो रहा है झब्बू को। खा–पीकर मस्तिया रहा है। दवा–पानी के बावजूद कूद फांद रहा है।


शाम को मैं झब्बू को लेकर निकल ही रहा था कि सोनू पांच-छह साथियों के साथ आ गया। उस दल में दो लड़कियां भी थीं। उसी के कालेज के विद्यार्थी थे सब-सहपाठी। सोनू की मां ने सबको जलपान करवाया। मुझसे भी परिचय हुआ।


मैं झब्बू को लेकर निकल रहा था तो पीछे से एक लड़की ने सोनू के साथियों को फुसफुसाते हुए कहा- ‘यार, सोनू के डैडी तो बहुत स्मार्ट हैं, एकदम यंग।’ सोनू के दोस्त ने कहा- ‘तुम भी हद करती हो, अगर सोनू के डैडी यंग हैं तो फिर बिचारा सोनू तो अभी जवान ही नहीं हुआ।’


इस डायलाग पर सभी लोगों ने जी भर कर ठहाका लगाया। सोनू की हँसी को मैंने साफ सुना। मुझे अच्छा लगा कि सोनू निरंतर आगे बढ़ रहा है और बुरा भी लगा कि इस माहौल में विकसित हो रहा है। मगर इसके लिए सोनू कहां दोषी था। अपने दौर की भलाई-बुराई से तो उसे भी जुड़ना ही था। मैंने टिप्पणियों को और खुले कहकहों को स्वाभाविक रूप में ही लिया।


झब्बू के साथ मैं घंटे भर बाद वापस आया। तब तक वे मैत्रीबाग देखने के लिए चले गए। सोनू की मां ने बताया कि वहां से वे सीधे रायपुर चले जाएंगे। मैंने लंबी सांस खींचते हुए सोनू की मां से कहा- ‘अब लगने लगा कि मैं जवान नहीं रहा।’


‘क्यों? क्या बात हो गई। लड़के तो आपको स्मार्ट कह रहे थे । साथ ही आपकी येजदी चलाने की आदत पर भी उन्हें आपकी जवानी का प्रमाण मिल रहा था।’


‘ये तो है। येजदी मर्दों की गाड़ी। स्कूटर तो लड़कियां भी चलाती हैं। किंतु येजदी सिर्फ मर्द ही चलाते हैं।’


‘तो फिर बुढ़ापे का शौक क्यों?’


‘इसलिए कि सोनू अब जवान हो गया है।’


‘उसके जवान होने का कोई प्रमाण हाथ लग गया क्या?’


‘लगेगा क्या खाक । बेटा अपना है। अनुशासित और विशेष आज्ञाकारी नस्ल का।’


‘आप मगर आज्ञाकारी नहीं रहे कभी, फिर नस्ल की बात भी फालतू है।’


‘तुम नासमझ हो। तुम्हें ये ऊंची बातें समझ में आएंगी नहीं।’


‘मैं नासमझ जरूर हूँ, मगर नस्लवादी नहीं।’


‘यही तो नासमझी है।’


‘नासमझी भली, लेकिन नस्लवाद भला नहीं।’ उसने हँसते हुए कहा।


आगे बहस बढ़ती कि झब्बू आ गया लाड़ दिखाने। मैंने झब्बू को दुलारते हुए कहा- ‘तू तो यार दोगला है, फिर भी है शानदार। और रहना हमेशा शानदार।’ झब्बू जैसे बात को समझ भी रहा था। वह कूं-कूं करते हुए प्यार जताने लगा। तभी सामने गेट पर एक कुतिया दिखी। कुछ देर तक देखने के बाद मैंने बाहर खड़ी कुतिया को एक पत्थर से मारकर भगा दिया। झब्बू बहुत देर तक उधर ही ताकता रहा जिधर कुतिया भाग गई थी। मुझे चिंता हुई। इंजेक्शन के बावजूद झब्बू का इस तरह शृंगार रस में डूबना उतराना कुछ जमा नहीं।


मैंने यह चिंता सोते समय सोनू की मां के आगे यूं ही रख दी। मगर वह तो जैसे तैयार ही बैठी थी। उसने कहा, ‘प्रकृति के विरुद्ध कितना आप उसे तंग करेंगे।’


‘कितना का मतलब!’ मैंने गुस्से में कहा।


‘मतलब यही कि यह भी जीव है। कामनाएं उसकी भी हैं। आप उसे खिलौना बनाकर कब तक रखेंगे।’


‘इंजेक्शन के कारण तो उसकी सारी कामनाएं खत्म हो जाती हैं।’


‘खत्म हो जाती हैं तब फिर कुतिया को देखकर कुंकुंवाता क्यों है?’


‘यही तो मैं समझ नहीं पा रहा।’


‘किसी दिन जब अवसर पा जाएगा तो आपके सारे इंजेक्शनों पर पानी फेर देगा झब्बू।’


‘सो तो दिख ही रहा है।’ मैंने हथियार डालते हुए कहा और इसी चिंता में मैं सो गया। दूसरे दिन मैं दफ्तर चला गया।


शाम को आया तो पता चला कि दिन भर वह कुतिया घर के आगे मंडराती रही। जब झब्बू की बेताबी बढ़ गई तो उसे पिछवाड़े में ले जाकर बांध दिया गया। मगर वह वहां भी छटपटाता रहा।


मुझे बहुत चिंता हुई। मैंने डाक्टर से पूछा। उन्होंने आश्वस्त किया। मुझे सोनू पर गुस्सा भी आया कि बार-बार मना करने पर भी उसने जिद्द करके कुत्ते को पाल ही लिया और खुद तो मुक्त हो गया, हमें फंसा गया। लाता तो सही नस्ल का लाता, दोगले को उठा लाया, दोगला है तो कभी- न-कभी तो दगा करेगा ही।


सुबह झब्बू को मैं रोज जंजीर खोलकर घुमाने ले जाता। आज्ञाकारी झब्बू इशारों पर चलता था किसी प्रशिक्षित कुत्ते की तरह। मैं घर से उस दिन अभी चार कदम दूर ही गया था कि एक अस्पष्ट सीटी मिश्रित ध्वनि सुनाई पड़ी। मैं अभी सतर्क होता कि झब्बू सरपट ध्वनि की ओर दौड़ चला। मैं दुखी मन खाली हाथ घर लौटा।


‘शुद्ध अलसेसियन रहता तो कभी गुस्ताखी न करता।’ पत्नी ने कहा– ‘गुस्ताखी के लिए शुद्ध–अशुद्ध का प्रमाण पत्र कभी कारगर नहीं सिद्ध होता। प्रकृति का नियम छोटे–बड़े, दोगले–सच्चे सबके लिए समान ही है। आप गलतफहमी में हैं। पढ़े–लिखे होकर भी बेकार की बातों में विश्वास करते हैं।’


मैंने जोर देकर कहा, ‘तुम हो जाहिल! गुण का संबंध नस्ल से रहता है। इसलिए तो दुनिया आज तक टिकी हुई है। चार वर्ग हैं। गोरा-काला है, अमीर-गरीब है। देखती नहीं हो।’


‘देखती हूँ, इसीलिए जोर दे रही हूँ कि सब बेकार की बातें हैं। यह सब कृत्रिम और बनावटी विभाजन है। अपने अहं की तुष्टि के लिए।’


‘तुम तो क्रांतिकारी हो गई।’


‘मैं नहीं जानती क्रांति है क्या बला। मगर नस्ल से गुण का संबंध नहीं है यह जानती हूँ और एक हिसाब से झब्बू ने कोई दोगलेपन का काम किया भी नहीं।’


‘दोगलेपन का काम तो किया ही है। उसे इस तरह पाला जैसे साहबों के कुत्ते पलते हैं, सुविधा में। मगर निकला कृतघ्न। अहसान फरामोश। दिखा दिया न दोगलापन। साला मर जाता क्या, जो कुतिया के पीछे दीवाना न होता।’


‘कुछ दिनों से वह जंजीर में बंधा पल-पल मर ही तो रहा था।’


‘तो तुम्हारा मतलब है अब जीने का प्रमाण देने गया है।’ पत्नी को इस वाक्य का कोई उत्तर नहीं सूझा। उसे चुप पाकर मैंने कहा, ‘एक बात कहे देता हूँ कि अब वह इस घर में नहीं आ सकता। चाहे साला मरे कहीं।’


पत्नी ने आश्चर्य से पूछा, ‘यह क्या मजाक है। बच्चे की तरह पाला और एक गलती से एकदम अलग कर देंगे।’


‘तो क्या गले से लगाएंगे। दोगलों के लिए इस घर में कोई जगह नहीं।’


दिन भर हम दोनों तनाव में रहे। पत्नी ने भोजन परोसते हुए चुप्पी तोड़ने की गरज से पूछा, ‘झब्बू गायब हुआ तो गायब ही हो गया?’


मैं चुपचाप खाना खाने लगा। कुछ देर बाद उसने फिर कहा, ‘चला गया ठीक है। मगर इतना बेदर्द हो गया। लौटकर देखा भी नहीं।’


यद्यपि तमाम विरोध के बावजूद याद तो मुझे भी सता रही थी झब्बू की। मगर पत्नी की बात से मुझे पता नहीं क्यों गुस्सा आ गया। मैंने पुनः घोषित कर दिया- ‘मैं तुम्हें साफ बताए देता हूँ, कमीना अगर दुबारा आए भी तो फटकने न देना।’ वह समझ गई कि मैं झब्बू की बेरुखी से अपमानित महसूस कर रहा हूँ। पूरे दो दिन की मस्ती के बाद झब्बू प्रकट हुआ अचानक।


मैं तब दफ्तर जाने के लिए जल्दी-जल्दी तैयारी कर रहा था कि बाहर झब्बू की विशिष्ट कुंकुंवाहट से चौंक गया।


पत्नी भी बाहर आ गई। हम दोनों को देखकर वह गेट के बाहर मारे खुशी के उछलने लगा। उसे भीतर आकर लाड़ दिखाने की बेताबी थी। मैंने पत्नी से कहा कि बिलकुल तरजीह न दे, गद्दार को। पत्नी तो गेट खोल भी रही थी मगर मैंने रोक दिया। मैंने हाथ में डंडा लेकर गेट के इस ओर से ही झब्बू को दुत्कारते हुए कहा, ‘भाग साले नालायक, जहां मस्ती करने गया था वहीं मर।’


झब्बू विस्फारित आंखों से देखता हुआ चुप हो गया। उसका सारा उत्साह खत्म हो गया। मैंने पत्नी से कहा- ‘गेट खोलो तो गाड़ी निकालूं जरा । उसने गेट खोल दिया अभी मैं मोटरसाइकिल निकालकर स्टार्ट कर ही रहा था कि झब्बू से रहा न गया। तमाम घुड़की के बावजूद वह मेरे पास आकर कुंकुवाने लगा।


मुझे उसकी इस अदा पर और क्रोध आ गया और मैंने एक भरपूर लात लगाई। झब्बू के लिए यह अप्रत्याशित था। लात खाकर बमुश्किल वह संभला। उसने कूं-कांय तक नहीं किया। चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा।


मैंने पत्नी को गेट बंद कर देने को कहा। उसने बंद भी कर दिया। झब्बू पत्नी की ओर देखता हुआ खड़ा रहा और मैं दफ्तर के लिए निकल गया। शाम को आया तो देखा कि झब्बू गेट के बाहर ही पांवों में सर रखे बैठा है। पत्नी ने बताया कि वह यहां से हटा तक नहीं है। पूछने पर पत्नी ने बताया कि बाहर जाकर उसने खाना भी दिया मगर झब्बू ने आंख उठाकर देखा भी नहीं।


मुझे आश्चर्य तो हुआ मगर मैं अपने निर्णय पर डटा रहा। रात्रि भोजन के बाद मैंने कहा- ‘बाहर जाकर दे दो फिर से भोजन। नालायक को भीतर घुसने मत देना।’ पत्नी ने गेट को सतर्कता से खोला कि कहीं झब्बू भीतर न आ जाए मगर गेट खुलने पर भी वह भीतर नहीं आया। पड़ा रहा। भोजन देते हुए देखकर उसने पत्नी की ओर सजल नेत्रों से निहारा। पत्नी की आंखें भी भर आईं। भोजन देकर वह पुनः घर में आ गई।


मैं आंगन में गेट के पास खड़ा होकर देख रहा था, दो घंटे में भी दिन भर का भूखा झब्बू हिला डुला तक नहीं। भोजन को एक नजर देखता था। फिर दोनों पांव पर सिर रखकर निढाल पड़ा रहता था।


सुबह उठकर हमने देखा झब्बू उसी तरह अपने स्थान पर पड़ा हुआ था पांवों पर सर रखे! भोजन भी जस का तस था। पत्नी से देखा न गया। उसने कहा, ‘मर जाएगा। न खाता है न टलता है।’ मैंने कहा, ‘मर गया, हमारे लिए। बेवफा औरत और कुत्ते के साये से जितनी जल्दी हो, आदमी दूर हो जाए। वरना उसका न केवल विनाश हो जाता है, बल्कि अंत भी जल्दी ही हो जाता है। पत्नी ने कहा- ‘बिचारे से एक बार गलती हुई है। पुचकार लो। भीतर आ जाएगा तो खाना भी खा लेगा। तुम तो बस ‘मांगही गुर त धराही ढेला’ का करतब दिखाते हो, पुचकार भी लिया करो कभी।


‘मैं देवी जी हँसने-रोने पर काबू रखता हूँ। मेरे मुस्कराने का तुमने गलत अर्थ लगाया है। मैं तो अपनी जीत पर मुस्करा रहा हूँ।’


‘जीत कैसी?’


‘जीत तो है ही। कुत्ते को हमने दुलारा, प्यार किया मगर उसने दगा किया। तुम जानती हो कि जीवन भर मैं किसी भी दगाबाज कुत्ते को माफ नहीं कर सका। जिसने भी मेरे स्नेह और विश्वास का नाजायज फायदा उठाया उससे पल भर में मैं अलग हो गया। कुछ इस तरह जैसे उसका मेरा कभी कुछ लेना देना नहीं था।’


‘जानती हूँ, मगर तुम्हारे अंतस को भी जानती हूँ। दिल पर पत्थर रखकर प्रियजनों से शत्रुता का स्वांग भरते हो। केवल अहं के लिए ओढ़ी हुई दृढ़ता से नुकसान ही होता है। तुम भीतर से तो झब्बू के लिए तड़पते रहे हो, मगर अड़े हुए हो बेकार में।’


‘वाह तुम तो मनोवैज्ञानिक हो गई हो।’


‘तुम्हारे साथ रहकर कुछ तो विद्या आ ही जाएगी गुरु जी!’ उसका इतना कहना था कि मुझे हँसी आ गई। मुझे हँसते देखकर पत्नी का हौसला बढ़ा। उसने कहा- ‘देखो, अब जिद छोड़ो और बुला लो झब्बू राजा को।’ मैंने पत्नी की ओर मुस्कराकर देखा और कहा, ‘कभी-कभी तुम्हारी भी चल जानी चाहिए। एक नेक पति का कर्तव्य भी निभ जाएगा और झब्बू मरने से भी बच जाएगा।’


उसने खुश होते हुए कहा, ‘नेकी का प्रमाण-पत्र तुम स्वयं बांटते हो, तुम्हें प्रमाणपत्र की क्या जरूरत। बस पुकार लो झब्बू को’ कहते हुए उसने स्वयं बुलाया – ‘झब्बू’।


पत्नी की आवाज सुनकर झब्बू के कान खड़े हुए। पांवों पर रखे सर को उसने आहिस्ता से उठाया, मगर खड़ा नहीं हुआ। पत्नी ने फिर पुकारा, वह पुनः अपने स्थान पर बैठा रहा।


अब मुझसे रहा नहीं गया, मैंने कहा, ‘झब्बू, चल आ जल्दी चल।’ मेरा इतना कहना था कि झब्बू फुर्ती से उठ खड़ा हुआ और तेजी से घर के भीतर चला आया। मुझे भी अपने पर काबू न रहा। मैंने उसे अपने दोनों हाथों से उठा लिया। झब्बू की आंखों से आंसुओं की झड़ी सी लग गई। उसको मैंने नहलाया। अपने हाथ से खाना खिलाया तब जाकर उसकी पुरानी चपलता लौटी।


पत्नी ने उस दिन कहा, ‘अब सुधर गए हो। बात मान भी जाते हो।’


मैंने कहा, ‘बात सिद्धांत की है देवी जी! उसने खाना-पीना छोड़ कर प्रायश्चित किया। मैं पत्थर तो हूँ नहीं।’


‘अरे, मुझे तो आज पता चला।’ पत्नी ने तीर फेंकते हुए कहा। मैं समझ रहा था कि मेरी रुक्षता, अनुशासनप्रियता और दृढ़ता पर वह अवसर जानकर कटाक्ष कर रही है।


मैंने सोचा, मन पर लगे घाव हल्की सी छुवन से रिसने लगते हैं। उनका इलाज यही है कि उचित अवसर पर निदान की स्थिति देखकर पूर्ण उपचार कर दिया जाए। आहत व्यक्ति को जानबूझकर मन हल्का करने का अवसर दिया जाना चाहिए। पत्नी के द्वारा इस अवसर पर किए गए हल्के से प्रहार को मैंने इसीलिए सही कोण से मुस्कराकर ग्रहण किया।


दिन बीतने लगे। झब्बू मगर उस दिन के बाद एकदम अनुशासित हो गया। इस बीच सोनू की परीक्षाएं खत्म हो गईं। उसने घर आकर बताया कि पंद्रह-बीस लोग घूमने के लिए दक्षिण भारत जा रहे हैं। सब फाइनल इयर के लड़के-लड़कियां हैं। एक मिनी बस लेकर सब जा रहे हैं।


मैंने उसे तीन हजार रुपये दे दिए कि घूम-घाम आए। सोनू को उसकी मां ने झब्बू कांड सविस्तार बता दिया। सोनू हँसते-हँसते लोटपोट हो गया। हँसते हुए उसने कहा- ‘बाबू भी बस हद कर देते हैं।’ इससे आगे कुछ न कह सका, मगर मुझे लगा कि इस वाक्य के बहाने उसने बहुत कुछ कह दिया है।


दो दिन बाद वह दक्षिण भारत की यात्रा पर चला गया, लौटा तो बहुत खुश था। उसका परीक्षा परिणाम निकला। उसने सोचा नहीं था कि वह मेरिट में आ जाएगा। उसने बहुत खुश होते हुए भी बताया कि उसके साथ दक्षिण भारत यात्रा पर गई एक लड़की सुधा भी प्रावीण्य सूची में स्थान पा गई है।


मुझे लगा कि अपनी प्रावीण्यता से कहीं अधिक वह सुधा की उपलब्धि से प्रसन्न था। मैंने कहा कुछ नहीं, खुशी का माहौल था। उस दिन झब्बू को उसने मोटरसाइकिल में सामने बिठाकर घुमाया। बाद में पता लगा कि सुधा भी इसी नगर में रहती है। इसी वर्ष उसके पिता जी ने स्वैच्छिक अवकाश लिया है। सोनू की मां से पता लगा कि लड़की का मूल गांव केरल के एलप्पी जिले में है। दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान ये लोग लड़की के गांव में भी एक दिन रुके।


सोनू अक्सर केरल की हरियाली और साक्षरता की बातें करता। मैं उसकी केरल संबंधी प्रतिक्रियाओं को सहज रूप से लेता, लेकिन अब जाकर कुछ सतर्क हुआ। सोनू की बातों के महत्व को अब मैं विचारने लगा।


सोनू पिछले बरस से ही इडली सांभर और दोसा के बारे में अपनी मां से बातें करता था। उसी के आग्रह पर मैं पिछले बरस इडली बनाने का सांचा लेने पर मजबूर हुआ था। सोनू कभी कहता कि इडली सांभर हल्के नाश्ते के रूप में लाजवाब हैं, पूरी दुनिया में। मौज में आने पर एक दिन कहने लगा, ‘पड़ोसी बनाने के लिए बाबू केरलियन लोगों से बढ़कर दूसरा कोई उपयुक्त हो ही नहीं सकता।’


‘क्यों?’ मैंने कहा।


 तर्क दिया- ‘शांति प्रेमी, अपने काम से काम रखनेवाले, साफ सुथरे और सुशिक्षित होते हैं, इसलिए।’

‘अच्छा। और क्या-क्या खासियत लगती है तुमको।’

‘मितभाषी और विश्वसनीय तो होते ही हैं’, उसने सविस्तार बतलाया। साल भर पहले जब वह छुट्टियों में आया था तब बड़ा बनाने के लिए दाल पीसने का बहुत बड़ा पत्थर भी खरीद लाया था। तब मुझे अजीब लगा था। मगर रहस्य अब खुलने लगे थे। मैंने महसूस किया कि सोनू इन वर्षों में कुछ और ही तरह से बड़ा हुआ है। मैं इस सबको फिर भी सामान्य तौर पर ही ले रहा था। इस तरह की बातें थीं भी सामान्य, मगर सोनू की मां ने जो कुछ बताया उससे मैं पुनः स्तब्ध होकर रह गया।

मुझे बताया गया कि सोनू और सुधा कुछ इस तरह करीब आ गए हैं कि अब हमारी भूमिका केवल आशीर्वाद देने भर की बची है। मैंने सब कुछ सुनकर कहा, ‘मैं तो यह भी बर्दाश्त नहीं कर पाता कि स्वजातीय लड़की को भी मेरी सहमति के बगैर वह चुने। मगर यहां तो अंतरजातीय और अंतरप्रांतीय खेल तय हो गया।’

‘खेल नहीं शादी।’

‘शादी है यह साला, कमीना’ अचानक मेरे मुंह से गुस्से में निकल गया।

पत्नी ने गुस्साते हुए कहा, ‘अपने आपको भी तुम कितनी भद्दी गाली देते हो, धिक्कार है।’

‘अपने बेटे को धिक्कारो, शर्म है उसे।’

‘धिक्कार से लाभ क्या है। आखिर तो टूटना और हारना हमें ही है। तुम्हीं हो जो झब्बू की गुस्ताखी पर पगला गए थे, मगर उसे तिल–तिल मरते देखकर खुद पटरी पर आ गए।’

मैं चुप रहा। फिर पत्नी ने कहा, ‘जीवन केवल ऐंठने और दुखी होने के लिए नहीं है। तुम सोचते अधिक हो, मगर सही परिणाम तक नहीं जाते।’ अब मुझसे रहा न गया। मैंने कहा, ‘बताओ भला। सिद्ध करो।’

‘सिद्ध तो है। तुम चाहते हो कि तुम्हारी अभिलाषाएं पूरी हों और सब जाएं चूल्हे में।’

‘इसमें मेरी अभिलाषा की क्या बात है।’

‘है ही। अरे अपने आपको खत्म किए दे रहे हो। सुखा रहे हो खुद को। ये भी कोई दुखी होने की बात है। बस झट फतवा दे देते हो, कर लेते हो प्रतिज्ञा। उतना ही बिगड़ो कि सब कुछ न बिगड़ जाए।’

मैंने टूटते हुए कहा, ‘तो तुम्हीं बताओ भई क्या करूं।’

‘तुम खुद सोचो।’

‘सोचता हूँ तो और शर्म आती है। कुत्ता तो फिर भी विचारा शरीर की जरूरत के कारण मेरी अवहेलना करने पर मजबूर हुआ, मगर अपने सोनू का मामला तो तन से भी अधिक मन का है। इसे तो पड़ोसी तक बनाने के लिए केरलियन लोग उपयुक्त लगते हैं।’

इस वाक्य के साथ तनाव के बावजूद हम दोनों हँस पड़े। पत्नी ने कहा- ‘उम्र केवल खीझने के लिए नहीं मिली।’ मैंने उसके हाथों को दबाते हुए कहा, ‘तो किसलिए मिली है जी, जरा वो भी फरमा ही दीजिए।’ अभी मैं कुछ और कहता कि बाहर सोनू की गाड़ी की आवाज आई। आवाज सुनकर झब्बू उछलने लगा।

सोनू ने हमें प्रणाम किया। फिर गुमसुम सा कुर्सी पर बैठ गया। मैंने उसकी चिंता और परेशानी को देखकर खुद को अपराधी महसूस किया। अपने आपपर गुस्सा भी आया। मैं इस अवसर को किसी भी तरह गंवाना नहीं चाहता था। एक तरह से प्रायश्चित के लिए मैंने मन ही मन खुद को तैयार ही कर रहा था। या ज्यादा सफाई से स्वीकार करूं तो यही कि मैं अब जीवन के इस पड़ाव में कोई हारने वाली लड़ाई नहीं छेड़ना चाहता था। झब्बू ने मुझे हिलाकर रख ही दिया था। मैं सोचने लगा कि आखिर तो टूटे संबंधों को जीने के लिए बहानों का सहारा बनाकर चलता ही हूँ। अच्छा यही है कि समय रहते चेत जाऊं।

मैं अब उम्र के उस दौर में प्रवेश कर रहा हूँ जहां जीत-हार का कोई बहुत महत्व नहीं होता। वह भी एक मिथ्या जीत। किसी की हार से अर्जित जीत सबसे बड़ी हार होती है, यह मैंने खूब समझ लिया था।

मिथ्या अहंकार के कारण जीवन भर टूटता भी रहा हूँ मैं। मुझे यह सोचकर भीतर ही भीतर हँसी भी आ रही थी कि एक कुत्ते से तो मैं जीत न सका। भला अपने बेटे से क्या जीत पाऊंगा। सहसा मैंने सोनू को हताशा से उबारते हुए पूछा, ‘क्या बात है बेटा? कुछ तकलीफ है तो कहो।’ सोनू ने संभलते हुए कहा, ‘बाबू, मेरी नौकरी एन.टी.पी.सी. कोरबा में लग गई।’

‘बड़ी खुशी की बात है।’

‘सुधा के मां-बाप केरल जा रहे हैं, वहीं रिटायर्ड लाइफ बिताएंगे।’

‘बड़ी खुशी से जाएं।’

‘आपको मां ने कुछ नहीं बताया’ सोनू ने जोर देकर पूछा।

‘अब भी तुम्हारी मां ही बताएगी। तुम सीधे नहीं बोल सकते।’ मैंने आश्वस्त करते हुए कहा।

‘सुधा ने भी बाबू एप्लाई किया था, उसका भी वहीं हो गया है।’ सोनू ने कहा। मैंने दृढतापूर्वक मगर प्रसन्न होकर कहा- ‘तो अच्छा है बेटा। सुविधा रहेगी। इससे बढ़कर और क्या बात होगी। तुम दोनों खुश रहो।’ अब हतप्रभ रह जाने की बारी सोनू, की थी। उसने मेरे जवाब के रहस्य को समझने की गरज मेरी ओर पुनः देखा। वह मेरी मुस्कराहट से साफ समझ गया कि मैं कतई अस्वाभाविक अंदाज में यह नहीं कह रहा था।

रही सही उसकी मां ने पूरी कर दी। उसने हँसते हुए कहा, ‘सोनू तुम्हारे बाबू को झब्बू ने खूब सिखा दिया बेटा। तुमने उसे पाला, उसकी कीमत झब्बू ने अदा कर दी। उसने तुम्हारा मार्ग प्रशस्त कर दिया। इसके विद्रोह से तुम्हारे बाबू ने जो कुछ झेला उससे यह सिद्ध हो गया कि नाहक दुराग्रह पालकर दुखी होना ठीक नहीं होता। तुम्हारी खुशी हमारी खुशी है।’

सोनू को लगा जैसे किसी देश का राज ही उसे मिल गया हो। प्रतिक्रिया स्वरूप उसने बढ़कर झब्बू को गोद में उठा लिया।

सोनू की गोद में बैठा झब्बू मेरी ओर ही देख रहा था। यद्यपि झब्बू की खुशी भी उसकी आंखों से साफ झलक रही थी, मगर मुझे तब भी लग रहा था जैसे उसकी आंखों में शिकायत हो कि बेटे से भिड़ना पड़ा तो शरणागत हो गए। अपनी बारी आते ही जाति और नस्ल के सवाल यूं हवा हो गए।

■वरिष्ठ  कथाकार  परदेशी राम वर्मा के अब तक आठ कथा संग्रहतीन उपन्यास सहित संस्मरणनाटकजीवनी एवं बाल कथा संग्रह प्रकाशित हैं।

संपर्क एल.आई.जी.-18, आमदी नगर, हुडको, भिलाई– 490009 (छ.ग.) मो.9827993494

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समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सोचना

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जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। (हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी) -------------------------------------- हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं। दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है। मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है। शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो च