सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जीवन के उबड़ खाबड़ रास्तों की पहचान करातीं कहानियाँ

जीवन के उबड़ खाबड़ रास्तों की पहचान करातीं कहानियाँ

■सुधा ओम ढींगरा का सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह चलो फिर से शुरू करें

■रमेश शर्मा

 --------------------------------------


सुधा ओम ढींगरा का सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह ‘चलो फिर से शुरू करें’ पाठकों तक पहुंचने के बाद चर्चा में है। संग्रह की कहानियाँ भारतीय अप्रवासी जीवन को जिस संवेदना और प्रतिबद्धता के साथ अभिव्यक्त करती हैं वह यहां उल्लेखनीय है। संग्रह की कहानियाँ अप्रवासी भारतीय जीवन के स्थूल और सूक्ष्म परिवेश को मूर्त और अमूर्त दोनों ही रूपों में बड़ी तरलता के साथ इस तरह प्रस्तुत करती हैं कि उनके दृश्य आंखों के सामने बनते हुए दिखाई पड़ते हैं। हमें यहां रहकर लगता है कि विदेशों में ,  खासकर अमेरिका जैसे विकसित देशों में अप्रवासी भारतीय परिवार बहुत खुश और सुखी होते हैं,  पर सुधा जी अपनी कहानियों में इस धारणा को तोड़ती हुई नजर आती हैं। वास्तव में दुनिया के किसी भी कोने में जीवन यापन करने वाले लोगों के जीवन में सुख-दुख और संघर्ष का होना अवश्य संभावित है । वे अपनी कहानियों के माध्यम से वहां के जीवन की सच्चाइयों से हमें रूबरू करवाती हैं।

संग्रह की एक कहानी है ‘वे अजनबी और गाड़ी का सफर’ । फिल्मों में दिखाई जा रहीं घटनाओं की तरह वास्तविक जीवन में भी बहुत सी घटनाएं अब घटने लगी हैं । यह कहानी हमें एक ऐसे विषय की ओर ले जाती है जिसे अक्सर हम फिल्मों या अन्य टीवी सीरियलों में देख पाते हैं। पत्रकारिता से जुडीं दो भारतीय युवतियाँ चीनी युवती को एक यूरोपीय पुरुष के साथ रेलगाड़ी में सफ़र करते हुए देखती हैं। लड़की के हाव भाव देखकर उन्हें संदेह होता है कि वह लड़की कुछ तकलीफ में है। उन दोनों भारतीय युवतियों ने किस तरह सूझबूझ, होशियारी व सर्तकता से संकट में फंसी उस लड़की को एक अंग्रेज ड्रग माफिया से मुक्त करवाया,ये सभी घटनाएं कहानी को पढ़ने से ही पता लग सकती हैं। सुधा ओम ढींगरा अमेरिका में रहती हैं और उनका भारत में लगातार आना-जाना लगा रहता है । ऐसा लगता है कि यह कहानी उन यात्राओं के अनुभवों से ही जन्म लेने वाली कहानी है। यह कहानी लोगों को संभावित अप्रिय घटनाओं से न केवल सतर्क करती है बल्कि दूसरों की सहायता के लिए भी सजग रहने का आग्रह करती है। 

शीर्षक कहानी ‘चलो फिर से शुरू करें’ अप्रवासी युवक कुशल के पारिवारिक जीवन की कथा है जिसमें बहुत से उतार चढ़ाव हैं।  विदेशी महिला मार्था से विवाह कर वह माँ-बाप से अलग हो गया है । पुत्र से अत्यधिक लगाव होते हुए भी पुत्र की गृहस्थी में दखल देना ठीक नहीं , यह सोचकर माँ-बाप ने भी समझदारी दिखाते हुए उससे दूरी बना ली है। समय आता है जब उस माता-पिता को किसी परिचित के माध्यम से खबर मिलती है कि मार्था, कुशल को तलाक देकर, बच्चों को उसके पास छोड़ कर चली गई है। इतना ही नहीं मार्था ने  कुशल के नाम पर तीन मिलियन का कर्ज़ भी ले लिया है। कहानी में यह प्रसंग ध्यातव्य है कि यदि कुशल श्वेत अमेरिकन होता तो मार्था बच्चों को साथ ले जाती परन्तु भारतीय अमेरिकन पिता के बच्चों को वह कभी स्वीकार नहीं कर पाती।  इन मुश्किल परिस्थितियों में मां-बाप ही काम आते हैं यह कुशल को पता है । यह घटना भारतीय माता-पिता के प्रति एक आस्था जगाने वाली घटना भी लगती है जो सच के करीब भी है। इस मुश्किल घड़ी में कुशल को माता-पिता का साथ मिलता है । वह अपने बच्चों को उनके पास छोड़कर एक नए जीवन की शुरुआत करने लगता है। 'चलो फिर से शुरू करें' संघर्षों की कहानी है , रिश्तों के प्रति आस्था की कहानी है और साथ साथ जीवन की घटनाओं से सबक सीखने वाली कहानी भी है। 

संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी है ‘वह ज़िन्दा है…’! कहानी हस्पताल की घटनाओं का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करती है।  कविता एक गर्भवती महिला है , अल्ट्रासाउंड करने वाली नर्स कीमर्ली जब उसे सीधे तौर पर कहती है कि ‘मिसेज़ सिंह यूअर बेबी इज़ डेड।’ ऐसा सुनते ही कविता के शरीर की गति थम सी जाती है। फिर जो होता है उस त्रासदपूर्ण घटना की सहज कल्पना की जा सकती है। कविता के शरीर की गति थम जाने से मृत बच्चे को बहुत मुश्किल से उसके शरीर से बाहर निकाला जाता है।अब कविता की केवल साँसें ही चल रही हैं जबकि वह अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है । दो बार गर्भपात हो जाने के बाद यह तीसरा मौका ही उसके लिए माँ बन पाने का एक अवसर था। वह अवसर अब उसके जीवन में नहीं है। नर्स द्वारा बिना सोचे समझे यांत्रिक रूप से , संवेदनहीन होकर सच्चाई  को जिस तरह प्रस्तुत किया जाता है उससे कविता को गहरी चोट लगती है। वह उसे सहन नहीं कर पाती। पति द्वारा कार को पार्क करके वापस आने तक कुछ मिनटों में ही उस दंपत्ति की ज़िदगी बेरंग सी होने लगती है।अब आगे संघर्ष यह है कि  पति को हस्पताल मैनेजमेंट के बिरूद्ध मानवता की लड़ाई लड़ने की जरूरत आन पड़ी है। उसका तर्क बस इतना ही है कि वह सच बोलने के खिलाफ नहीं, पर सच को बोला कैसे जाए इस पर उसे आपत्ति है!

कई जगह विदेशी कल्चर ठोस सच्चाइयों पर ही निर्भर होता है । यह एक किस्म का यांत्रिक भाव है, वहां मानवीय भावनाओं के लिए कोई स्पेस नहीं होता। हमारे भारतीय कल्चर में मानवीय भावनाओं पर विशेष ध्यान रखा जाता है , यह मनुष्य के हित में भी है , कहानी इसी ओर इशारा करती है।  

कई बार भावनाओं को सँभालने के लिए झूठ का सहारा भी लिया जा सकता है या सच को टाला भी जा सकता है। अलग-अलग किस्म की संस्कृतियों के बीच के अंतर को लेखिका ने मानवीय संवेदना के स्तर पर जिस तरह यहां प्रस्तुत करने की कोशिश की है वह काबिले तारीफ है। 

‘भूल-भुलैया’ संग्रह की एक अन्य कहानी है।  भारतीयों के व्हाट्सएप समूहों में लगातार इस प्रकार के संदेश आ रहे थे कि एशियाई लोगों को अकेले  देख कर, अगवा कर लिया जाता है और उन्हें बड़े ट्रकों में उठाकर बाहर ले जाया जाता है। फिर वहां  उनके मानवीय अंग निकाल लिए जाते है। इन संदेशों को पढ़कर घबरायी हुई सुरभि जॉगिंग करते हुए पार्क में उसका पीछा करते स्त्री पुरुष को उसी गैंग का समझ लेती है। अपने बचाव के लिए पुलिस को वह फ़ोन भी कर देती है । पुलिस आकर उसकी गलतफहमी दूर करती है कि ये सारी बातें अफवाह हैं । हकीकत यह है कि पीछे पीछे आने वाले स्त्री-पुरुष उसकी सहायता के लिए ही उसके साथ आ रहे थे। खुलासा होता है कि जिस घटना को लेकर ऐसी अफवाहें फैलीं हैं,दरअसल वह ग़लतफ़हमी के कारण ही घटित हुई । इस तरह की घटनाएं आज बहुत देखने को मिलती हैं जहां अफवाहों के कारण देखते-देखते अप्रिय स्थितियां निर्मित हो जाती हैं। यह कहानी मनुष्य की वैचारिक चेतना पर एक सवाल खड़ा करती है और सतर्क रहने की दिशा में ले जाती हुई प्रतीत होती है। अफवाहों के इस समय में ऐसी कहानियाँ प्रासंगिक भी हैं।

कहानी ‘कभी देर नहीं होती’ रिश्तों के उतार चढ़ाव भरे ऊबड़ खाबड़ रास्तों से हमें गुजारती है। ननिहाल की चालाकी और असामान्य व्यवहार के कारण आनंद और उसके छोटे भाई बचपन से ही दादा-दादी के प्यार से वंचित हैं। उनके आपसी रिश्तों में ननिहाल बड़ी रूकावट है।  सब कुछ समझते हुए भी मम्मी और ननिहाल के आगे पापा की चुप्पी बच्चों के लिए बड़ी पीड़ा दायक है पर पापा की समझ ऐसी है कि उनकी चुप्पी से ही बच्चों का परवरिश ठीक ढंग से हो पाएगा। तनाव , झगड़ा किसी भी परिवार के लिए अच्छा नहीं है । जब अरसे बाद अमरीका के एक शहर में रह रही आनंद की बुआ ने मिलने पर उसे ‘नंदी’ कह कर पुकारा, तो वह इतने वर्षों लंबे अंतराल के बाद उसी माहौल व अपनत्व से भर उठा। उसके लिए ददिहाल से जुड़ने की यह अपूर्व घटना है जिसकी खुशी अव्यक्त सी है। यह कहानी दरअसल रिश्तों को जोड़ने वाली कहानी है जहां से रिश्तों के प्रति आस्थाएं मन में जन्म लेने लगती हैं और एक अपूर्व, अव्यक्त सी खुशी से हमारा सामना होता है।

"कटीली झाड़ी" संग्रह की एक अन्य कहानी है ।मानवीय चरित्र को समझने के लिए यह कहानी हमारे सामने बहुत सी परतें खोलती है। बड़े बाप की बेटी होने के अहंकार में डूबी अनुभा एक ऐसा कैरेक्टर है जिसका सामना कॉलेज में नेहा नामक लड़की से होता है। नेहा की योग्यता और उसकी सुंदरता से उसको बहुत ईर्ष्या होने लगती है । उसके अहम को चोट पहुंचने लगती है। नेहा के जीवन के हर कदम पर कांटे बिछाना उसका ध्येय  बन जाता है। यहां तक की शादी के बाद भी वह उसे बदनाम करने की कोशिश करती है पर वहाँ उसे मुंहकी खानी पड़ती है। मनुष्य का चरित्र भी कटीली झाड़ियों की तरह हो सकता है , ऐसे चरित्रों से सावधान रहने हेतु यह कहानी अपील करती है। पर जीवन में कुछ ऐसे कैरेक्टर से भी हम मिलते हैं , जो हमारे बारे में अच्छा सोचते हैं , हमारा कभी नुकसान नहीं करते और इन पात्रों के कारण रिश्तों पर हमारा विश्वास बना रहता है। कुछ ऐसे पात्रों का भी चित्रण इस कहानी में मिलता है।सुधा ओम ढींगरा सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के पात्रों का यहां तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती हैं जिससे कहानी का प्रभाव बढ़ जाता है। 

संग्रह की एक अन्य कहानी के माध्यम से लेखिका यह दिखाने की कोशिश करती हैं कि दुनिया के हर एक मुल्कों में लोगों का जीवन अंधविश्वासों से भरा पड़ा है।  जब अपूर्व सुंदरी डयू स्मिथ गौरव मुखी को अपने जीवन के काले अतीत के बारे में बताती है तो एकबारगी उसे यकीन नहीं होता । उसे यह जानकर अत्यन्त हैरानी होती है कि डयू के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है जैसाकि किसी भी सुंदर लड़की के जवान होने पर उसे लोगों की बुरी नज़रों से और उनके दुश्कर्म से गुज़रना पड़ सकता है। यहां धर्मगुरु ही दुष्कर्म का वाहक है पर ड्यू के माता पिता ने अपने धर्मगुरु के चरित्र पर संदेह न करके अपने भीतर पल रहे अंधविश्वास को ही प्रगाढ़ किया । माता पिता का यह अंधविश्वासी व्यवहार चकित करता है। सच तो यह है कि डयू उसी दुश्कर्म के कारण ही एच आई वी वायरस की चपेट में आयी। आगे उसका संघर्ष जारी रहा और अपनी मेहनत व योग्यता के बल पर वह एक बड़ी कंपनी में बड़े ओहदे पर पहुँच गयी।ड्यू के पास सब कुछ था परन्तु इस घटना के कारण उसकी सुंदर नीली आँखें उदास और बेनूर रहती थीं। गौरव को समझ में अब आया था कि  डयू उससे शादी करना क्यों नहीं  चाहती थी । यह कहानी एचआईवी पीड़ित लोगों से सद्भावना रखने की अपील भी करती है।

सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में जहां भाषिक सौंदर्य है वही संप्रेषण और पठनीयता के स्तर पर भी ये कहानियाँ हमसे जुड़ती हैं।

संग्रह की कहानियों को पढ़ने के बाद हमें लगता है कि सुधा ओम ढींगरा की कहानियाँ जीवन मूल्यों के पुनर्स्थापन की कहानियाँ हैं । ये कहानियाँ जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण को जन्म देने में हमें वैचारिक सहयोग प्रदान करती हैं। इस संग्रह को एक बार अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।


कहानी संग्रह: चलो फिर से शुरू करें 

लेखक – सुधा ओम ढींगरा

प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर, मप्र 466001

प्रकाशन वर्ष – 2024


------------------------------ 


संपर्क: 

92 श्रीकुंज कॉलोनी

बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)पिन 496001

मो.7722975017

ईमेल- 

rameshbaba.2010@gmail.com

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ओमा द अक ने

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सोचना

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज

गाँधीश्वर पत्रिका का जून 2024 अंक

गांधीवादी विचारों को समर्पित मासिक पत्रिका "गाँधीश्वर" एक लंबे अरसे से छत्तीसगढ़ के कोरबा से प्रकाशित होती आयी है।इसके अब तक कई यादगार अंक प्रकाशित हुए हैं।  प्रधान संपादक सुरेश चंद्र रोहरा जी की मेहनत और लगन ने इस पत्रिका को एक नए मुकाम तक पहुंचाने में अपनी बड़ी भूमिका अदा की है। रायगढ़ के वरिष्ठ कथाकार , आलोचक रमेश शर्मा जी के कुशल अतिथि संपादन में गांधीश्वर पत्रिका का जून 2024 अंक बेहद ही खास है। यह अंक डॉ. टी महादेव राव जैसे बेहद उम्दा शख्सियत से  हमारा परिचय कराता है। दरअसल यह अंक उन्हीं के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित है। राव एक उम्दा व्यंग्यकार ही नहीं अनुवादक, कहानीकार, कवि लेखक भी हैं। संपादक ने डॉ राव द्वारा रचित विभिन्न रचनात्मक विधाओं को वर्गीकृत कर उनके महत्व को समझाने की कोशिश की है जिससे व्यक्ति विशेष और पाठक के बीच संवाद स्थापित हो सके।अंक पढ़कर पाठकों को लगेगा कि डॉ राव का साहित्य सामयिक और संवेदनाओं से लबरेज है।अंक के माध्यम से यह बात भी स्थापित होती है कि व्यंग्य जैसी शुष्क बौद्धिक शैली अपनी समाजिक सरोकारिता और दिशा बोध के लिए कितनी प्रतिबद्ध दिखाई देती ह

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि

प्रीति प्रकाश की कहानी : राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए

प्रीति प्रकाश की कहानी 'राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए' को वर्ष 2019-20 का राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान मिला है, इसलिए जाहिर सी बात है कि इस कहानी को पाठक पढ़ना भी चाहते हैं | हमने उनकी लिखित अनुमति से इस कहानी को यहाँ रखा है | कहानी पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि यह कहानी एक संवेदन हीन होते समाज के चरित्र के दोहरेपन, ढोंग और उसके एकतरफा नजरिये को  किस तरह परत दर परत उघाड़ती चली जाती है | समाज की आस्था वायवीय है, वह सच के राम जिसके दर्शन किसी भी बच्चे में हो सकते हैं  , जो साक्षात उनकी आँखों के सामने  दीन हीन अवस्था में पल रहा होता है , उसके प्रति समाज की न कोई आस्था है न कोई जिम्मेदारी है | "समाज की आस्था एकतरफा है और निरा वायवीय भी " यह कहानी इस तथ्य को जबरदस्त तरीके से सामने रखती है | आस्था में एक समग्रता होनी चाहिए कि हम सच के मूर्त राम जो हर बच्चे में मौजूद हैं , और अमूर्त राम जो हमारे ह्रदय में हैं , दोनों के प्रति एक ही नजरिया रखें  | दोनों ही राम को इस धरती पर उनकी जन्म भूमि  मिलनी चाहिए, पर समाज वायवीयता के पीछे जिस तरह भाग रहा है, उस भागम भाग से उपजी संवेदनहीनता को

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था जहाँ आने

कोइलिघुगर वॉटरफॉल तक की यात्रा रायगढ़ से

    अपने दूर पास की भौगौलिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को जानने समझने के लिए पर्यटन एक आसान रास्ता है । पर्यटन से दैनिक जीवन की एकरसता से जन्मी ऊब भी कुछ समय के लिए मिटने लगती है और हम कुछ हद तक तरोताजा भी महसूस करते हैं । यह ताजगी हमें भीतर से स्वस्थ भी करती है और हम तनाव से दूर होते हैं । रायगढ़ वासियों को पर्यटन करना हो वह भी रायगढ़ के आसपास तो झट से एक नाम याद आता है कोयलीघोघर! कोयलीघोघर ओड़िसा के झारसुगड़ा जिले का एक प्रसिद्द पिकनिक स्पॉट है जहां रायगढ़ से एक घंटे में सड़क मार्ग की यात्रा कर बहुत आसानी से पहुंचा जा सकता है । शोर्ट कट रास्ता अपनाते हुए रायगढ़ से लोइंग, बनोरा, बेलेरिया होते ओड़िसा के बासनपाली गाँव में आप प्रवेश करते हैं फिर वहां से निकल कर भीखमपाली के पूर्व पड़ने वाले एक चौक पर जाकर रायगढ़ झारसुगड़ा मुख्य सड़क को पकड लेते हैं। इस मुख्य सड़क पर चलते हुए भीखम पाली के बाद पचगांव नामक जगह आती है जहाँ खाने पीने की चीजें मिल जाती हैं।  यहाँ के लोकल बने पेड़े बहुत प्रसिद्द हैं जिसका स्वाद कुछ देर रूककर लिया जा सकता है । पचगांव से चलकर आधे घंटे बाद कुरेमाल का ढाबा पड़ता है , वहां र

पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के बताए तरीके /शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर में समर कैंप के तहत किया गया प्रायोगिक प्रदर्शन

पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के बताए तरीके शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर में समर कैंप के तहत किया गया प्रायोगिक प्रदर्शन रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के विभिन्न तरीकों का  बच्चों के समक्ष प्रायोगिक प्रदर्शन किया। संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ ने सर्वप्रथम समस्त अधिकारियों का स्कूली बच्चों से परिचय करवाया।   अग्निशमन सेवा से जुड़े अधिकारी खलखो सर ने इस अवसर पर सिलिंडर में आग लग जाने की स्थिति में किस तरह अपना बचाव किया जाए और आग लगने से आस पड़ोस को कैसे बचाए रखें , इस संबंध में बहुत ही अच्छे तरीके से जानकारी दी और अग्निशमन से जुड़े विभिन्न यंत्रों का उपयोग करने की विधि भी  उन्होंने बताई। उनके साथी जावेद सिंह एवं अन्य अधिकारियों ने भी उनका सहयोग किया। बच्चों ने स्वयं डेमोंसट्रेशन करके भी आग पर काबू पाने की विधियों का उपयोग किया। दैनिक जीवन में काम आने वाली ये जानकारियां बहुत ही सारगर्भित रहीं। इस डेमोंसट्रेशन को स्टॉफ के सभी सदस्

समीक्षा- कहानी संग्रह "मुझे पंख दे दो" लेखिका: इला सिंह

शिवना साहित्यिकी के नए अंक में प्रकाशित समीक्षा स्वरों की धीमी आंच से बदलाव के रास्तों  की खोज  ■रमेश शर्मा ------------------------------------------------------------- इला सिंह की कहानियों को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि इला सिंह जीवन में अनदेखी अनबूझी सी रह जाने वाली अमूर्त घटनाओं को कथा की शक्ल में ढाल लेने वाली कथा लेखिकाओं में से एक हैं। उनका पहला कहानी संग्रह 'मुझे पंख दे दो' हाल ही में प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंचा है। इस संग्रह में सात कहानियाँ हैं। संग्रह की पहली कहानी है अम्मा । अम्मा कहानी में एक स्त्री के भीतर जज्ब सहनशील आचरण , धीरज और उदारता को बड़ी सहजता के साथ सामान्य सी लगने वाली घटनाओं के माध्यम से कथा की शक्ल में जिस तरह इला जी ने प्रस्तुत किया है , उनकी यह प्रस्तुति कथा लेखन के उनके मौलिक कौशल को हमारे सामने रखती है और हमारा ध्यान आकर्षित करती है । अम्मा कहानी में दादी , अम्मा , भाभी और बहनों के रूप में स्त्री जीवन के विविध रंग विद्यमान हैं । इन रंगों में अम्मा का जो रंग है वह रंग सबसे सुन्दर और इकहरा है । कहानी एक तरह से यह आग्रह करती है कि स्त्री का