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डॉक्टर परिधि शर्मा की कहानी - ख़त

 

शिवना नवलेखन पुरस्कार 2024 अंतर्गत डॉक्टर परिधि शर्मा के कहानी संग्रह 'प्रेम के देश में' की पाण्डुलिपि अनुसंशित हुई है। इस किताब का विमोचन फरवरी 2025 के नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में शिवना प्रकाशन के स्टाल पर  किया जाएगा । यहाँ प्रस्तुत है उनकी कहानी  'ख़त'


कहानी:   ख़त

डॉ. परिधि शर्मा

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रात की सिहरन के बाद की उदासी ठंडे फर्श पर बूंद बनकर ढुलक रही थी। रात के ख़त के बाद अब कोई बात नहीं बची थी। खुद को संभालने का साहस भी मात्र थोड़ा-सा बच गया था। ख़त जिसमें मन की सारी बातें लिखी गईं थीं। सारा आक्रोश, सारे जज़्बात, सारी भड़ास, सारी की सारी बातें जो कही जानी थीं, पूरे दम से आवेग के साथ उड़ेल दी गईं थीं। ख़त जिसे किसी को भी भेजा नहीं जाना था।

ख़त जिसे किसी को भेजने के लिए लिखा गया था। कुछ ख़त कभी किसी को भेजे नहीं जाते बस भेजे जाने के नाम पर लिखे जाते हैं।

खिड़की के कांच के उस ओर खुली हवा थी। हवा के ऊपर आकाश। पेड़ पौधे सबकुछ। आजादी। प्रेम में विफल हो जाने के बाद की आजादी की तरह। खिड़की के पास बैठे हुए आकाश कांच के पार से उतना नंगा नहीं दिख रहा था।

यूं ही बैठे बैठे अनायास ही उसे खयाल आया, आंखों पर चश्मे चढ़ाकर दुनिया देखने वालों को भी दुनिया कम नंगी लगती हो शायद।

दूर बहुत ऊपर गर्व से उड़ता चील आकाश की ऊंचाई की कहानी कह रहा था।

प्रेम में विफल हो जाने के बाद भी प्रेम का रह जाना उसे तकलीफ दे रहा था, मगर दुःख इस बात का था कि प्रेम में अस्वीकृत उसे इसलिए किया गया था कि उसकी योग्यता काफी न थी।

भौतिकतावादी सोच की समृद्धता के आगे घुटने टेकते उसके प्रेम का मोल कोई क्या समझता। जीवन के ही सस्ते हो जाने के दौर में प्रेम की गरिमा जहां तक बचाई जा सकती थी, उसने बचाई और अपने दुःख और आंसू बगैर किसी को दिखाए बेआवाज़ अपनी आंखों में समेट कर मानो खुद को बचा लिया। मगर उस प्रेम को बाहर फेंक देना उसके बस में न था जो उसके भीतर बच गया था। ख़त में सबकुछ उतार देने के बावजूद। यह बच गया प्रेम ठहराव पैदा कर रहा था। बार बार अंतिम मुलाकात के लम्हों को लौटा रहा था। उसके होने के एहसास भर के सहारे उससे बातें करना एक समय के बाद उबाऊ लगते हुए भी जरूरी हो गया था। क्या यह बातें करने की प्रक्रिया उम्र भर चलनी थी? शायद हां। इस वार्तालाप में केवल वह नहीं होता था, वह भी होती थी कल्पनाओं में श्रोता बनकर मुस्कुराती हुई। शायद वह सारी जिंदगी उसी तरह मुस्कुराती रहेगी श्रोता बनकर, उतनी ही बूढ़ी, उतनी ही जवान। आखिरी मुलाकात के जितनी। उसकी कल्पनाओं में कैद। इसके बाद के समय में उस प्रेमिका को जानना इस कल्पना को बिगाड़ सकता है, इसलिए अब उसके विषय में कुछ भी और जानना उचित नहीं। यदि वह जा चुकी है तो उसका पीछा अब नहीं होना चाहिए।

वह ओवरकोट पहन कर बाहर निकल आया। सड़क किनारे की झाड़ियों में चंपा के खिलने का वक्त हो चला था। कहीं दूर से किसी संगीत मंडली द्वारा प्रेम गीत बजाए और गाये जाने की आवाजें आ रही थीं। श्रमजीवी जिनकी जिजीविषा अक्षुण्ण थी, ठिठुरते हुए भोर में ट्रैक्टर की ट्राली में लदे काम पर चले थे।

आगे मंदिर के सामने फूल बेचते बच्चे मिले जो उसे कातर दृष्टि से जाते हुए देखते रहे। सुबह हो चुकी थी। सामने सड़क पार कर एक दीवार दिखाई दी जिस पर लिखा था कि 'यहां गाड़ियां खड़ी करना मना है', मगर किसी मजदूर ने अपनी एक जर्जर साईकिल उसी वाक्य के ठीक नीचे दीवार से टिका दी थी।

उसने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली और लाइटर की मदद से सुलगाने लगा। हवा और पानी से प्रेम करने वाले लोग कब धुंए और बारूद के दीवाने हो गए थे ये कौन बताए। बारूद बनाने वाले ने ज्यादा नहीं तो कम से कम एक बार खुद के चीथड़े उड़ने की कल्पना तो की ही होगी। जब वह सिगरेट पीते हुए भी दुखी रहता, तब वह अक्सर हंसती हुई कहा करती थी, दुख को धुंए में उड़ा दिया करो।

वह जवाब में कुछ भी कहता, जैसे कि, क्या तुम एक रौबदार परिवार से ताल्लुक रखने का दंभ भरती हो। बदले में वह कहती, मेरे पिता प्रशासन में हैं और मां और भाई पुलिस में। अपनी योग्यता का जिक्र वह न करती क्योंकि उससे पुरूष के अहम पर चोट लगने का डर होता। वे दोनों ही असहज होकर खामोश हो जाते। शहर में साथ साथ घूमने पर भी झिझक महसूस करते। दोनों के बीच बढ़ते फासले उसे मुंह चिढ़ाते। ऐसा नहीं था कि उसने सरकारी नौकरी के लिए कोशिशें न की हों, बस बात नहीं बन रही थी।

बहुत सुंदर दिनों में जब वे दोनों एक ही सीढ़ी पर खड़े होते थे तब प्रेम का आकर्षण कितना अधिक हुआ करता था। सीढ़ियां चढ़ते हुए रास्ते अलग हुए और मंजिलें भी। वह आज भी नीचे की सीढ़ियों से ऊपर की ओर देखता हुआ उसे ढूंढने की कोशिश में खड़ा रह गया था। अपनी ही धुन में इतराता। बगैर अफसोस किये। वह इतना न कर पाता तो शायद झुकी गर्दन के साथ एक निजी कंपनी की नौकरी करते हुए शर्मिंदा होता रहता मानो कोई गुनाह कर रहा हो। मानों वही प्रेम का गुनहगार हो। तो क्या वह प्रेम करने का गुनाह करते करते स्वयं प्रेम का गुनहगार हो जाता !

वह पैदल ही चलता जा रहा था। सुबह में अब हल्की धूप घुल गई थी। ओवरकोट उतार कर उसने कमर में बांध लिया था। वह लोगों को देख रहा था। सभी जल्दी में थे। वे सभी उसे नशे में लग रहे थे। सिगरेट तो वह पी रहा था मगर नशे में दुनिया लगती थी। अंतिम मुलाकात में मानों वह बहस कर गई थी इसी नशे वाली बात पर। वह कह रहा था, "नशे में मैं नहीं ये दुनिया है, इस पूरे ब्रह्मांड की इस छोटी सी पृथ्वी में चींटियों की तरह रेंगते ये तिनके बराबर लोग जाने किस घमंड में चूर हैं, उस ऊपर वाले तक का डर नहीं उन्हें और तुम सोचती हो कि मैं नशे में हूं!"

"नशे में तो तुम भी हो, जिसे लगता है सबकुछ हमेशा एक जैसा रहता है, तुम होश में आओ, सब बदल चुका है", कहती हुई वह चली गई थी।

समय का निरंतर बीत जाना दवा कर गया था। वह अपने पूरे वजूद के साथ संभल पाया था।

नीली सड़क की मरम्मत के बावजूद उस पर कहीं कहीं कुछ छोटे छोटे गड्ढे बच गए थे। मानों किसी किरदार के वजूद पर लगे दाग हों। जैसे जोकर की गंभीरता। जैसे किसी क्रूर कातिल की करूणा।वह सिगरेट का धुआं उड़ाता पुराने दोस्तों के अड्डे तक जा पहुंचा। दोस्त अब पहले से न थे। वे अब फिक्रमंद और चिंतित लगते। वे अब कम हंसते। दो दोस्त चाय की चुस्कियां लेते हुए आपस में बतिया रहे थे, आखिर जिंदगी की त्रासदियों का अंत क्या है? ऐसा क्या है जो जीते-जी हमें दुखों से बचा ले...!

वह पूछना चाहता था, बल्कि उसने पूछा भी, क्या अपने भीतर बचे हुए प्रेम के साथ जीवित रह पाना संभव है? क्या बचा हुआ प्रेम दुखों से बचा सकता है? क्या उस बचे हुए प्रेम का आलिंगन करना चाहिए या उसे यूं ही अपने भीतर पड़े रहने दिया जाना चाहिए? क्या पुनः प्रेम करना चाहिए?

खुले वातावरण में साफ ठंडी हवा मानों उसके इस अंतिम ख्याल से सहमति जताती हुई बह चली थी। परंतु यह जो बचा हुआ प्रेम है, क्या पुनः प्रेम कर लेने से मिट जाता होगा!

उसने कोट की जेब से ख़त निकाला और एक बड़ी सी गंदी नाली में फेंक दिया।

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[यह कहानी अहा जिन्दगी दिसम्बर 2023 अंक से  साभार ली गयी है]


परिचय

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नाम : डॉ.परिधि शर्मा

जन्म : 6 अगस्त 1992

शिक्षा : मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी( MDS )

सम्प्रति : दन्त चिकित्सक

प्रकाशन : भास्कर रसरंग (20.09.2009) , वागर्थ (मार्च 2010), समावर्तन (अक्टूबर 2011),परिकथा (जनवरी-फरवरी 2012), समावर्तन (फरवरी 2012),परिकथा (मार्च-अप्रेल 2014), अहा जिन्दगी (दिसम्बर 2023) परिकथा (सितंबर-दिसम्बर 2024)इत्यादि पत्र पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित.

छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद के आमंत्रण पर श्रीकांत वर्मा सृजन पीठ बिलासपुर के मंच पर कहानी पाठ, रज़ा फाउंडेशन "युवा 2024" के दिल्ली में हुए आयोजन में उनके आमंत्रण पर सहभागिता एवं कवि श्रीकांत वर्मा पर वक्तब्य की प्रस्तुति।

एक यात्रा संस्मरण "आनंदवन में बाबा आमटे के साथ"मधुबन बुक्स की किताब वितान-7 (जो कुछ कान्वेंट स्कूलों में कक्षा सातवीं के बच्चों को पढ़ाई जाती है) में शामिल।

सम्मान: दैनिक भास्कर पत्र समूह की ओर से मुख्य अतिथि अनुपम खेर के हाथों यूथ अचीवर छत्तीसगढ़ प्राइड अवार्ड सम्मान 2014, शिवना नवलेखन पुरस्कार 2024 अंतर्गत कहानियों की पांडुलिपि 'प्रेम के देश में' प्रकाशन हेतु चयनित.


संपर्क :

डॉ. परिधि शर्मा

जुगल किशोर डेंटल क्लिनिक

आर.के टावर, न्यू मेडिकल रोड़

मलकानगिरी (ओड़िसा) 

Email- mylifemychoices140@gmail.com

 

 

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