सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ग्राम उत्थान, सामाजिक समरसता,लोकचेतना और गांधी जी का शिक्षा दर्शन

गांधी जी के शैक्षिक दर्शन में जाने से पूर्व उनके मूल दर्शन को समझने की कोशिश  करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि उनका उद्देश्य अंग्रेजों की राजनैतिक दासता से मुक्ति के साथ साथ स्वतंत्रता के उपरान्त देशज परम्पराओं का नवीनीकरण करते हुए शैक्षिक , नैतिक , आर्थिक ,आध्यात्मिक स्तर पर भी देश को प्रगति के पथ पर ले जाना था, इसके केंद्र में ग्राम उत्थान उनका प्रमुक्ष ध्येय था। स्वतंत्रता आन्दोलन के समूचे इतिहास पर नजर डालें और उसका एक सम्यक विवेचन करें तो यह बात ध्यातब्य है कि जहां अन्य लोग हिंसा /अहिंसा किसी भी  साधन के माध्यम से जहां केवल और केवल अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहते थे वहीं गांधी की दृष्टि उनसे कहीं ब्यापक थी । वे स्वतंत्रता के साथ साथ उस स्वतंत्रता के मूल्यों की रक्षा हेतु लोकसमाज में शैक्षिक , नैतिक , आर्थिक ,आध्यात्मिक स्तर पर एक पूर्व तैयारी भी चाहते थे ताकि देश में जब पुनर्सृजन की कहानी लिखी जाए तो ये पूर्व तैयारियां देश की उन्नति के लिए लिखी गई उस कहानी को पुख्ता करें । उनकी यह दृष्टि ही उन्हें दूसरों से अलग करती है।

गांधी इस बात को जानते थे कि किसी भी देश और उसकी समाज ब्यवस्था के सुसंचालन के लिए लोक विचार और लोकचेतना की जड़ों का मजबूत होना कितना अहम् है और उनकी नजर में इन जडों को मजबूत करने की शक्ति केवल लोक शिक्षा में है ।गांधी की नजर से देखें तो शिक्षा वह अमोघ अस्त्र है जो अक्षर-ज्ञान से आगे बढ़कर अपने देश-समाज की परम्पराओं, जीवन-बोध और जीवन-मूल्यों का अभिज्ञान कराते हुए उसके अनुरूप राष्ट्रोत्थान एवं समाजोत्थान की दिशा में लोगों को जागरूक एवं सक्रिय  करता है। 

लेकिन अंग्रेजों ने अपने शासन-तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए यहाँ पर एक ऐसी शिक्षा पद्धति की नींव रखी जो शिक्षित वर्ग को लोकजीवन से विमुख करने वाली थी और जिसके माध्यम से यह शिक्षित वर्ग अंग्रेजों के अधीनस्थ काम करने को प्रेरित भी हुआ । उस दरमियान परिस्थितियाँ भी ऎसी बनीं कि राजा राम मोहन राय जैसे जानकार और देश में गहरी आस्था रखने वाले लोग अंग्रेजी शिक्षा के इस अँधेरे पक्ष को भांप नहीं सके  और देश की प्रगति के लिए इस शिक्षा पद्धति को आवश्यक समझ लिया । उसके बाद के कतिपय भारतीय बुद्धिजीवी भी इस अंग्रेजी शिक्षा की वकालत में खड़े होते गये। 

वह समय भी आया जब मैकाले की इस अंग्रेजी शिक्षा की बुराईयाँ दिखने लगीं और उसके जन विरोधी चरित्र को पहचानने का कार्य भी उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से शुरू होने लगा। ‘बंग-दर्शन’ नाम की पत्रिका में 1878 में बंकिमचंद का ‘लोक शिक्षा’ नाम से जो लेख छपा था, उसमें उन्होंने अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षण के नाम पर दी जाने वाली वैज्ञानिक एवं आधुनिक शिक्षा को अपर्याप्त बताते हुए इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया था कि ‘‘हमारा विश्वास है कि व्याकरण और रेखागणित का ज्ञान मानसिक उन्नत्ति के लिए जरूरी होते हुए भी व्यावहारिक जीवन के मसलों से जूझने में सम्पूर्ण रूप से सहायक नहीं है। हमें लगता है कि इन तथ्यों और मसलों से राममोहन राय से लेकर श्रीमान् फटिकचंद तक पाश्चात्य रंग में रंगे हुए सभी प्रतिष्ठित लोग इससे अवगत नहीं हैं या इसकी उपेक्षा करते आये हैं। …… अंग्रेजी शिक्षा के कारण शिक्षितों और अशिक्षितों के बीच कोई सहानुभति, कोई संवाद नहीं है। शिक्षित समुदाय अशिक्षित समुदाय के दिल की धड़कन को महसूस करने में असमर्थ है। यही नहीं शिक्षित, अशिक्षित की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखते। कृषक राम की अगर खेत जोतते-जोतते थककर मौत भी हो जाती है, तो हमें क्या? कृषक राम कैसे जीवन-यापन करता है, उसकी रूचि क्या है, अॅग्रेजीयत के रंग में रंगे बंगाली युवकों को इन सवालों से कोई मतलब नहीं। कृषकराम भाड़ में जाए, हमें इससे क्या मतलब ?’’

बंकिम चंद के इस कथन से स्पष्ट है कि मैकाले की इस शिक्षा पद्धति ने समाज में विघटन पैदा करना आरम्भ कर दिया था। इस विघटन को गांधी अपनी पैनी नजर से देख रहे थे । जो शिक्षा ग्रामीण लोकजीवन को समृद्ध करने के बजाय उसकी प्रगति में रूकावट पैदा करे वह शिक्षा गांधी की नजर में जनविरोधी शिक्षा थी जो समाज में प्रेम और समरसता लाने के बजाय विभिन्न वर्गों के मध्य खायी पैदा करने का काम कर रही थी ।

बंकिम चंद तो यह मान ही रहे थे कि मैकाले की यह शिक्षा पद्धति जनविरोधी है जो समाज में श्रमिक वर्ग को उपेक्षित करने और एक नया प्रभु वर्ग पैदा करने का कार्य कर रही है | गांधी उसके आगे जाकर इसकी बुराईयों को भांप रहे थे । गांधी की नजर में ऎसी शिक्षा देश को पुनः पुनः गुलामी की ओर ले जाने का एक ऐसा खतरनाक हथियार था जिसका विरोध करना वे जरूरी समझते थे।  

इसके विकल्प के रूप में गांधी ने शिक्षा का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया । उन्होंने तकली और चरखे के माध्यम से शिक्षा को एक नए नवाचार से जोड़कर लोगों के सामने न केवल प्रस्तुत किया बल्कि उसे अपने जीवन में आत्मसात कर इसके लिए जनमानस को इस दिशा में प्रेरित करने का कार्य भी किया। गांधी का यह स्पष्ट मानना था कि जिस दिन भारत के गाँव गरीबी से मुक्त होंगे उस दिन असली स्वराज आएगा। इसी ध्येय  को लेकर शिक्षा में उन्होंने तकली और चरखे को जोड़ा | गांधी की नजर में चरखा न केवल आर्थिक आजादी एवं गरीबी से मुक्ति का प्रतीक है,बल्कि वह अहिंसा, लघु एवं कुटीर उद्योगों की पक्षधरता का भी प्रतीक है । उनका नजरिया इसे लेकर स्पष्ट था कि अगर हर हाथ को काम मिलेगा तो सबके पास अपनी ब्यस्तता और आर्थिक आजादी रहेगी और इसके फलस्वरूप समाज में वैमनस्यता और हिंसा को पाँव पसारने का मौका नहीं मिलेगा । समाज में अगर हिंसा और वैमनस्यता न होगी तो समरसता और प्रेम का विस्तार होगा जिससे देश की प्रगति के नए रास्ते खुलेंगे।

अगर थोड़ा गहरायी में जाकर समझने की कोशिश करें तो गांधी ने तकली और चरखे का आविष्कार तालीम के दो रूप में किया था । तकली और चरखा एक तो बच्चों के सामूहिक खेल का साधन थी और दूसरा प्रारम्भ से ही स्वालंबन का आधार भी थी। गांधी मानते थे कि यदि कर्म प्रधान शिक्षा में चरखे के माध्यम से युवाशक्ति कर्म में लीन रहेगी तो वह एकाग्र रहेगी , अनुशासित रहेगी । गांधी अनुशासन को चरित्र निर्माण की पहली सीढ़ी मानते थे । उनकी नजर में वही शिक्षा कारगर थी जो चरित्र निर्माण करे , उनका नजरिया स्पष्ट था कि चरित्रवान नागरिक स्वावलम्बी और स्वाभिमानी होता है जिनकी देश को हमेशा जरूरत रहती है। शिक्षा में तकली और चरखा के प्रयोग को उसी चरित्र की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में गांधी जी द्वारा देखा गया । देश में गांधी ऎसी चरित्रवान युवा शक्ति चाहते थे जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के आँखों के आंसू पोछ सके।         

गाँधीजी ने अपने शिक्षा दर्शन में सबसे पहले माध्यम के सवाल को महत्वपूर्ण  मानते हुए इस बात पर बल दिया कि भारत के विभिन्न प्रांतों में शिक्षा देने का काम प्रांतीय भाषाओं अर्थात उनकी मातृभाषाओं में किया जाना चाहिए। उनकी नजर में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा के स्थान पर मातृभाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा सहज और स्वाभाविक थी। 

‘इंडियन ओपिनियन’ पत्रिका के 19-8-1910 के अंक में अपने एक आलेख में गांधी ने लिखा था -  

 ‘‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृति पाई जाती है। मानोँ उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता, अर्थात परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति, चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धान्त को भूल जाने का खतरा मोल ले रहे हैं।’’

फरवरी 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में भी उन्होंने देश के उपस्थित गणमान्य लोगों के बीच बगैर किसी संकोच के यह बात कही थी – ‘‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अॅग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। ….. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा । हमारी भाषा ही हमारा प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझ से यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्त किये ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार से उठ जाना ही अच्छा है। …… यदि पिछले पचास वर्षों में हमें देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती, तो आज हम किस स्थिति में होते ! हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना  जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’’

मातृभाषा में शिक्षा को लेकर वे लगातार देश में सक्रिय रहे। जगह जगह उन्होंने इस हेतु लोगों को जागृत किया। 15 अक्टूबर 1917 को बिहार के भागलपुर शहर में छात्रों के एक सम्मेलन में भाषण देते  हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था – ‘‘मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर के बराबर है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वदेश भक्त कहलाने लायक नहीं है। बहुत से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि ‘हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं जिनमें हमारे ऊँचे विचार प्रकट किये जा सकें। किन्तु यह कोई भाषा का दोष नहीं। भाषा को बनाना और बढ़ाना हमारा अपना ही कर्तव्य है। एक समय ऐसा था जब अंग्रेजी भाषा की भी यही हालत थी। अंग्रेजी का विकास इसलिए हुआ कि अंग्रेज आगे बढ़े और उन्होंने भाषा की उन्नति की। यदि हम मातृभाषा की उन्नति नहीं कर सके और हमारा यह सिद्धान्त रहे कि अंग्रेजी के जरिये ही हम अपने ऊँचे विचार प्रकट कर सकते हैं और उनका विकास कर सकते हैं, तो इसमें जरा भी शक नहीं कि हम सदा के लिए गुलाम बने रहेंगे। जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकेगा।’’

एक अन्य अवसर पर गाँधी जी ने विदेशी भाषा द्वारा दी जाने वाली शिक्षा से होने वाली हानियों का उल्लेख करते हुए कहा था  – ‘‘माँ के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने में टूट जाता है। इसके अतिरिक्त विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा देने से अन्य हानियाँ भी होती है। शिक्षित वर्ग और सामान्य जनता के बीच में अन्तर पड़ गया है। हम जनसाधरण को नहीं पहचानते। जनसाधरण हमें नहीं जानता। वे हमें साहब समझते हैं और हमसे डरते हैं। यदि यही स्थिति अधिक समय तक रही तो एक दिन लार्ड कर्जन का यह आरोप सही हो जाएगा कि शिक्षित वर्ग जनसाधारण का प्रतिनिधि नहीं है।’’

गांधी किताबी ज्ञान से अधिक कर्म और अनुभव आधारित ज्ञान को अधिक महत्त्व देते थे । अक्षर-ज्ञान की तुलना में हाथ की शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने कहा था - ‘‘मेरी राय में तो इस देश में, जहाँ लाखों आदमी भूखों मरते हैं, बुद्धिपूर्वक किया जाने वाला श्रम ही सच्ची प्राथमिक शिक्षा या प्रौढ़ शिक्षा है। …. अक्षर-ज्ञान हाथ की शिक्षा के बाद आना चाहिए। हाथ से काम करने की क्षमता – हस्त-कौशल ही तो वह चीज है, जो मनुष्य को पशु से अलग करती है। लिखना-पढ़ना जाने बिना मनुष्य का सम्पूर्ण विकास नहीं हो सकता, ऐसा मानना एक वहम ही है। इसमें कोई शक नहीं कि अक्षर-ज्ञान से जीवन का सौंदर्य बढ़ जाता है, लेकिन यह बात गलत है कि उसके बिना मनुष्य का नैतिक, शारीरिक और आर्थिक विकास हो ही नहीं सकता (हरिजन-सेवक 15-03-1935)।

आज तमाम शिक्षाविदों , बुद्धीजीवियों ,लेखकों और समाजकर्मियों के लिए यह सोचने का बिषय है कि कंप्यूटर को तकली और चरखे का विकल्प बनाकर क्या आज की शिक्षा भारत को एक चरित्रवान और सामाजिक समरसता वाला देश बना पा रही है ?

आज शिक्षा में कंप्यूटर और सूचना तकनीक ने भले ही काम और प्रगति के नए रास्ते खोले हैं पर इस नए अनुप्रयोग ने हमारी शान्ति, हमारी सामाजिक समरसता, हमारे चरित्र और सनातन मूल्यों को तहस नहस अधिक किया है । सायबर अपराध और हिंसा इसी तकनीक की देन कहें तो गलत न होगा । सोते जागते मन की जो शान्ति मनुष्य के लिए जरूरी है वह एक तरह से छीन गयी है । मनुष्य अनेक रोगों से अधिक ग्रस्त हुआ है। 

शिक्षा में लोक की खुशहाली के लिए जिन आर्थिक आजादी और जीवन मूल्यों को लेकर गांधी जी ने अपने शिक्षा दर्शन में एक सपना देखा था वह भले ही आज अधूरा है और एक सपने की तरह हमें लगता है पर एक दिन ऐसा आएगा कि उधर हमें लौटना ही पड़ेगा । शिक्षा में गांधी का दर्शन भले ही आज हास्यास्पद लगे पर एक दिन ऐसा आएगा कि यही हमारे लिए अंतिम विकल्प होगा।

--------------------------------------------------------

रमेश शर्मा , 92 श्रीकुंज, बोईरदादर, रायगढ़ [छत्तीसगढ़]

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला वागर्थ के फरवरी 2024 अंक में है। कहानी विभिन्न स्तरों पर जाति धर्म सम्प्रदाय जैसे ज्वलन्त मुद्दों को लेकर सामने आती है।  पालतू कुत्ते झब्बू के बहाने एक नास्टेल्जिक आदमी के भीतर सामाजिक रूढ़ियों की जड़ता और दम्भ उफान पर होते हैं,उसका चित्रण जिस तरह कहानी में आता है वह ध्यान खींचता है। दरअसल मनुष्य के इसी दम्भ और अहंकार को उदघाटित करने की ओर यह कहानी गतिमान होती हुई प्रतीत होती है। पालतू पेट्स झब्बू और पुत्र सोनू के जीवन में घटित प्रेम और शारीरिक जरूरतों से जुड़ी घटनाओं की तुलना के बहाने कहानी एक बड़े सामाजिक विमर्श की ओर आगे बढ़ती है। पेट्स झब्बू के जीवन से जुड़ी घटनाओं के उपरांत जब अपने पुत्र सोनू के जीवन से जुड़े प्रेम प्रसंग की घटना उसकी आँखों के सामने घटित होते हैं तब उसके भीतर की सामाजिक जड़ता एवं दम्भ भरभरा कर बिखर जाते हैं। जाति, समाज, धर्म जैसे मुद्दे आदमी को झूठे दम्भ से जकड़े रहते हैं। इनकी बंधी बंधाई दीवारों को जो लांघता है वह समाज की नज़र में दोगला होने लगता है। जाति धर्म की रूढ़ियों में जकड़ा समाज मनुष्य को दम्भी और अहंकारी भी बनाता है। कहानी इन दीवा...

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सो...

'नेलकटर' उदयप्रकाश की लिखी मेरी पसंदीदा कहानी का पुनर्पाठ

उ दय प्रकाश मेरे पसंदीदा कहानी लेखकों में से हैं जिन्हें मैं सर्वाधिक पसंद करता हूँ। उनकी कई कहानियाँ मसलन 'पालगोमरा का स्कूटर' , 'वारेन हेस्टिंग्ज का सांड', 'तिरिछ' , 'रामसजीवन की प्रेम कथा' इत्यादि मेरी स्मृति में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं । हाल के दो तीन वर्षों में मैंने उनकी कहानी ' नींबू ' इंडिया टुडे साहित्य विशेषांक में पढ़ी थी जो संभवतः मेरे लिए उनकी अद्यतन कहानियों में आखरी थी । उसके बाद उनकी कोई नयी कहानी मैंने नहीं पढ़ी।वे हमारे समय के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां खूब पढ़ी जाती हैं। चाहे कहानी की अंतर्वस्तु हो, कहानी की भाषा हो, कहानी का शिल्प हो या दिल को छूने वाली एक प्रवाह मान तरलता हो, हर क्षेत्र में उदय प्रकाश ने कहानी के लिए एक नई जमीन तैयार की है। मेर लिए उनकी लिखी सर्वाधिक प्रिय कहानी 'नेलकटर' है जो मां की स्मृतियों को लेकर लिखी गयी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे कोई एक बार पढ़ ले तो भाषा और संवेदना की तरलता में वह बहता हुआ चला जाए। रिश्तों में अचिन्हित रह जाने वाली अबूझ धड़कनों को भी यह कहानी बेआवाज सुनाने लग...

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था ...

शिक्षकों की इन समस्याओं को है समाधान की दरकार : “शालेय शिक्षक संघ ने जतायी उम्मीद, शिक्षकों को निराश नहीं करेगी विष्णुदेव सरकार”..

  शिक्षकों की इन समस्याओं को है समाधान की दरकार : “शालेय शिक्षक संघ ने जतायी उम्मीद, शिक्षकों को निराश नहीं करेगी विष्णुदेव सरकार”.. छ्ग कैबिनेट से प्रदेश के कर्मचारियों को है बड़ी उम्मीदें, क्योंकि अब तक कर्मचारी लाभ से रहे वँचित Facebook रायपुर 5 मार्च 2024।  शालेय शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष वीरेंद्र दुबे के नेतृत्व मे संगठन का प्रदेश प्रतिनिधिमंडल जिनमें प्रांतीय महासचिव धर्मेश शर्मा, प्रदेश कार्यकारिणी अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी एवं प्रदेश मीडिया प्रभारी जितेंद्र शर्मा ने छ्ग शासन को प्रदेश के शिक्षकों की विभिन्न समस्याओं को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल तथा वित्तमंत्री ओ पी चौधरी के समक्ष रखते हुए इन मांगो को यथाशीघ्र पूर्ण करने का आग्रह किया है। प्रांताध्यक्ष वीरेंद्र दुबे ने जिन समस्याओ को शासन के समक्ष रखा वे निम्नांकित हैं – उच्चतर वेतनमान:-  शिक्षक एल बी संवर्ग के लिए उच्चतर वेतनमान – क्रमोन्नत/समयमान की पात्रता के लिए कुल सेवा अवधि की गणना संविलियन दिनांक से की जा रही है अतः 1994-95 से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे कर्मचारी अभी भी उच्चतर व...

आदित्य अभिनव की कहानी: गोधूलि aditya abhinav ki kahani godhuli

आदित्य अभिनव की कहानियों ने हाल के वर्षों में पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। उनकी कई कहानियां प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में इन दिनों प्रकाशित भी हुई हैं। यहां ली गई उनकी कहानी "गोधूलि" मध्यवर्गीय परिवारों में व्याप्त परंपरागत समस्याओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है।ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवारों में बुजुर्गों का जीवन बहुत ऊबड़ खाबड़ भरे रास्तों से होकर गुजरता है।कई बार पीढ़ियों के बीच सामंजस्य का अभाव चरम पर होता है। इतना कि उनके बीच रिश्तों के लिए कोई स्पेस ही नहीं बचा रह जाता।अलगाव ही एक मात्र रास्ता रह जाता है। खासकर वे बुजुर्ग जो पत्नी के गुजर जाने के बाद अपने जीवन में बहुत अकेले हो चुके होते हैं , उनके जीवन की गाड़ी पटरी से उतरने लग जाती है।इस कहानी में अमरकांत भी ऐसे ही बुजुर्ग हैं जो अकेलेपन का दंश झेलते हुए बहु बेटे के साथ किसी तरह जीवन की गाड़ी को खींच कर ले जा रहे हैं। पर उसे आगे और खींच कर ले जाना संभव नहीं लग रहा। जीवन की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए कई बार मनुष्य को लगभग अस्वीकार्य रास्तों पर भी चलना पड़ता है। जीवन में आपसी प्यार , समर्पण और संवेदना का प्रवेश कई ...

डॉक्टर परिधि शर्मा की कहानी - ख़त

  शिवना नवलेखन पुरस्कार 2024 अंतर्गत डॉक्टर परिधि शर्मा के कहानी संग्रह 'प्रेम के देश में' की पाण्डुलिपि अनुसंशित हुई है। इस किताब का विमोचन फरवरी 2025 के नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में शिवना प्रकाशन के स्टाल पर  किया जाएगा । यहाँ प्रस्तुत है उनकी कहानी  'ख़त' कहानी:    ख़त डॉ . परिधि शर्मा _______________ रात की सिहरन के बाद की उदासी ठंडे फर्श पर बूंद बनकर ढुलक रही थी। रात के ख़त के बाद अब कोई बात नहीं बची थी। खुद को संभालने का साहस भी मात्र थोड़ा-सा बच गया था। ख़त जिसमें मन की सारी बातें लिखी गईं थीं। सारा आक्रोश , सारे जज़्बात , सारी भड़ास , सारी की सारी बातें जो कही जानी थीं , पूरे दम से आवेग के साथ उड़ेल दी गईं थीं। ख़त जिसे किसी को भी भेजा नहीं जाना था। ख़त जिसे किसी को भेजने के लिए लिखा गया था। कुछ ख़त कभी किसी को भेजे नहीं जाते बस भेजे जाने के नाम पर लिखे जाते हैं। खिड़की के कांच के उस ओर खुली हवा थी। हवा के ऊपर आकाश। पेड़ पौधे सबकुछ। आजादी। प्रेम में विफल हो जाने के बाद की आजादी की तरह। खिड़की के पास बैठे हुए आकाश कांच के पार से उतना नंगा नहीं...

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी रायगढ़ - डॉ. बलदेव

अब आप नहीं हैं हमारे पास, कैसे कह दूं फूलों से चमकते  तारों में  शामिल होकर भी आप चुपके से नींद में  आते हैं  जब सोता हूँ उड़ेल देते हैं ढ़ेर सारा प्यार कुछ मेरी पसंद की  अपनी कविताएं सुनाकर लौट जाते हैं  पापा और मैं फिर पहले की तरह आपके लौटने का इंतजार करता हूँ           - बसन्त राघव  आज 6 अक्टूबर को डा. बलदेव की पुण्यतिथि है। एक लिखने पढ़ने वाले शब्द शिल्पी को, लिख पढ़ कर ही हम सघन रूप में याद कर पाते हैं। यही परंपरा है। इस तरह की परंपरा का दस्तावेजीकरण इतिहास लेखन की तरह होता है। इतिहास ही वह जीवंत दस्तावेज है जिसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वज लेखकों को जान पाती हैं। किसी महत्वपूर्ण लेखक को याद करना उन्हें जानने समझने का एक जरुरी उपक्रम भी है। डॉ बलदेव जिन्होंने यायावरी जीवन के अनुभवों से उपजीं महत्वपूर्ण कविताएं , कहानियाँ लिखीं।आलोचना कर्म जिनके लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्हीं के लिखे समाज , इतिहास और कला विमर्श से जुड़े सैकड़ों लेख , किताबों के रूप में यहां वहां लोगों के बीच आज फैले हुए हैं। विच...