सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अख़्तर आज़ाद की कहानी लकड़बग्घा और तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन पर टिप्पणियाँ

जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

(हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी)

--------------------------------------


हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं।

दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है।

मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है।

शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो चुकी होती है। 

किसी किसी के जीवन में बहुत विकट परिस्थितियां भी आती होंगी । ऐसी किसी विकट परिस्थिति का सामना किए बिना इस कहानी की घटनाएं बहुत अविश्वनीय लग सकती हैं। कई बार जीवन की ठोस सच्चाईयां भी काल्पनिक लग सकती हैं। पर जब आपके पास कोई विकल्प ही न हो तो आप क्या करेंगे?

मजदूर दंपत्ति भी 5 साल के बड़े बच्चे को, जब वह सोया हुआ रहता है रास्ते में छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। इस घटना की परिस्थितियों को कथाकार अख्तर आजाद ने बड़ी संजीदगी से कहानी में इस तरह बुना है कि उसकी स्वाभाविकता बची हुई लगती है। घटनाओं के दृश्य और संवाद इतने मार्मिक हैं कि पाठक को बेचैन कर सकते हैं।

जीवन की त्रासदी यहीं खत्म नहीं हो जाती। उन्हें मीलों आगे चलने में अपने छोटे बच्चे की कुर्बानी भी देनी पड़ती है। पत्नी अब पूरी तरह चलने में असमर्थ है ।उसके पांव में छाले पड़ गए हैं । वह गर्भवती है। मजदूर जो दो साल के बच्चे को पीठ पर लादे चल रहा है , उसकी जगह उसे अब गर्भवती पत्नी को लादकर चलना है।दो साल के बच्चे को त्यागने का निर्णय उनके लिए इतना कठिन निर्णय है कि उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

वे बच्चे को रास्ते में किसी को देना चाहते हैं ,पर लेने को कोई तैयार नहीं होता।

उस कालखंड में दंपत्ति की मनः स्थिति को कहानी में बहुत मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

नदी किनारे एक जगह जहां आसपास घनघोर जंगल भी है , वे रात बिताते हैं । जंगली जानवरों की आवाजें भी वहां गूंज रही हैं।बड़े बच्चे को खो देने के बाद शरीर और मन के दर्द से बेहाल पत्नी जब सो जाती है तो पति को दिल पर पत्थर रखकर कठोर निर्णय लेना पड़ता है। वह छोटे बच्चे को नदी में जाकर बहा देता है।

सुबह होती है तो पति को जीवन का सबसे बड़ा और कठिन झूठ बोलना पड़ता है कि जब मेरी भी आंख लग गयी तब रात में बच्चे को लकड़बग्घा उठाकर नदी की ओर ले गया। उन विकट परिस्थितियों में एक माँ का रोना बिलखना पाठक को बेचैनी से भर सकता है।

यह कहानी महज कोलाज भर नहीं है। इस तरह की परिस्थितियां उस दरमियान घटित भी हुई हैं और लोगों के सामने नहीं आ सकी हैं।

कई बार कहानियां ऐसे दृश्य रच जाती हैं जिसे कोई भी सूचना तंत्र सामने नहीं ला सकता।


■कहानी को स्थूल नजरिये से देखना कहानी के साथ न्याय नहीं है~【तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन】 

--------------------------------------------------------

तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन हंस के मार्च 2020 अंक में है । इस कहानी की कुछ लोगों ने यह कहकर आलोचना की है कि लेखक ने फैन्टसी" के नाम पर कहानी में ऐसी घटनाओं को शामिल किया है जो स्वीकार्य नहीं हैं ।  जिन घटनाओं पर लोगों को आपत्ति है उनमें अंग्रेजी विषय  पढ़ाते समय विघ्न के नाम पर परिंदों  की चहचहाहट  रोकना, परिंदों  के घोंसलों  को तहस- नहस करना, पेड़ के नीचे चूहे मारने की दवा जमीन में डाल कर परिंदों  को मरवाना इत्यादि। पाठकों की आलोचना में आगे जो कहा गया है वह यह कि लेखक अपनी कहानी में एक नीम पेड़ की बात करता है जिसे वह भारी - भरकम विशाल पेड़ के साथ  उसकी शाखाओं को चारों ओर फैलने की बात करता है.. और उस पर परिंदे आकर न बैठ सकें इसलिए उसे भी अंग्रेजी शिक्षक के माध्यम से कटवा देता है । पाठकों को इस बात पर भी आपत्ति है कि कहानीकार  बारिश  और चिड़ियों  से प्रेम करने वाले बच्चे को सजा देता है । पाठक का सवाल है कि क्या अंग्रेजी  पढ़ाने वाला अध्यापक इतना निर्दयी होता है... ? पाठकीय आपत्ति यह भी है कि कहानीकार  अपनी कहानी में उस बच्चे  को  सिर्फ  इसलिए  बेंत से मारता है , सजा देता है कि वह  बच्चा चहकती  चिड़ियों को ,खेत को , बारिश  को देखता है। यह पाठकीय आरोप भी मढ़ दिया जाता है कि कहानीकार  उस मासूम बच्चे जो खेत, चिड़ियों  - बारिश  से प्यार   करता  है उसका एक हाथ भी बस में कटवा देते हैं। सवाल यह भी उठाया गया है कि यह कैसी कहानी है?जिसमें जीवन नहीं  है, प्यार  नहीं  है, आसमान नहीं है,  पेड़ का जीवन नहीं  है चिडियों की उड़ान - चहचहाहट  नहीं है, बच्चों  की मासूमियत  नहीं  है.?  

कहानी जखमें कुहन  पर सोशल मीडिया पर कुछ इसी तरह की  प्रतिक्रिया पढ़कर मेरी भी जिज्ञासा हुई कि मैं भी इस कहानी को पढूं। यह कहानी थोड़ी लंबी है, 16 पेज की।

कहानी को देखने समझने का सबका अपना-अपना नजरिया होता है। आज कहानी  उस दौर में आ गई है  जब कहानी में बहुत सारे प्रयोग हो रहे हैं । जब कहानी को हम स्थूल रूप में देखने की कोशिश करेंगे तो कहानी के प्रति नजरिया भी हमारा स्थूल ही होगा । जब अंग्रेजी शिक्षक को हम अंग्रेजी शिक्षक ही मान लेंगे, जब परिंदों को हम परिंदा ही मान लेंगे ,जब चूहे मारने की दवा को हम चूहे मारने की दवा ही समझ लेंगे, अंग्रेजी की पढ़ाई के दरमियान  विघ्न के रूप में दूर से आ रही आवाजों को हम आवाज ही समझ लेंगे , जब बस में कटे हुए हाथ को हम कटा हुआ हाथ ही मान लेंगे, जब गुंडा कुत्ता को हम गुंडा कुत्ता ही मान लेंगे तो कहानी के प्रति हमारा नजरिया जाहिर है एकदम स्थूल ही होगा।  यह कहानी, कहानी की घटनाओं को स्थूल रूप में देखने के बजाय उन्हें आज के सामाजिक तंत्र में आरोपित करके देखने की मांग करती है। आज का कारपोरेट कल्चर एक विशेष किस्म के वर्ग को प्रमोट करता है और इस वर्ग में शामिल होने के लिए आज एक ऐसी दौड़ दौड़ी जा रही है जहां हर किस्म की अमानवीयता की गूंज सुनाई देती है। यूं भी अंग्रेजियत की संस्कृति कारपोरेट कल्चर का  एक सिंबॉल ही  है जहां किसी किस्म की संवेदना के लिए जगह ही नहीं है । इस कल्चर की अमानवीयता को दिखाने के लिए ही कहानीकार ने विभिन्न फेंटेसी का सहारा लिया है।

मारे जाने वाले वे परिंदे आज हमें अनेक रूपों में दिखते हैं चाहे वह सड़कों पर भटकने वाला मजदूर हो, चाहे नौकरी से निकाले जाने वाला मजदूर  । ये घटनाएं मृत्यु ना होकर भी मृत्यु के समतुल्य ही हैं। इन मजदूरों के साथ कारपोरेट कल्चर जिसमें उच्च और मध्यवर्ग दोनों शामिल हैं हर किस्म की अमानवीयता बरतता है। कहानी में निजी बस और सरकारी बस का जो जिक्र है वह सीधे-सीधे कारपोरेट वर्ग और साधारण वर्ग के बीच भेद को दिखाता है। 

यह जो कटा हुआ हाथ है ,कारपोरेट वर्ग द्वारा मजदूरों, श्रमिकों आम लोगों के हक को काटे जाने का प्रतीक है। साधारण वर्ग अपने कटे हुए हकों के कारण जीवन से एकदम लहूलुहान है। आम लोगों के हिस्से को गुंडा कुत्ता जैसे समाज के खूंखार लोग छीन कर ले जा रहे हैं । कहानी में हक ( जो कि कटे हुए हाथ के रूप में कुत्ते के जबड़े में कैद है) को छीनने के विरुद्ध भी प्रबल प्रतिरोध की घटना है, जो कि सरकारी बस के लोगों के द्वारा एकजुट होकर गुंडा कुत्ते के बिरूद्ध  लड़ा जाता  है। 

एक आदमी के हाथ कट जाने वाली घटना कारपोरेट कल्चर के लिए एक बहुत साधारण घटना है जिसके लिए वह उफ्फ तक  नहीं करता और अपनी गति में ही वह आगे निकल जाता है।

यह अमानवीयता समाज के हर कोने में दृश्य मान है। जिसे कहानी समझाने की कोशिश करती है।

कहानी का मूल पात्र सुंदर जो कि सर्वहारा वर्ग का प्रतीक है अंत में शहर से गांव की ओर लौट जाना चाहता है। वह भी इसलिए क्योंकि गांव में अभी भी थोड़ी बहुत संवेदना बची हुई है।

असल में सच्चाई यह है कि आज समाज की  वास्तविक घटनाएं जीवन को हमसे दूर ले गई हैं, कहानी इसी सच्चाई को उभारती है और जब यह सच्चाई उभरकर सामने आती है तो पाठक को थोड़ी तिलमिला हट होती है। कई बार लोग सच को स्वीकार नहीं कर पाते और उस सच्चाई को ही नकारने की कोशिश करते हैं। यह नकार ही असल में उनकी नजर में कहानी को आलोचना के दायरे में लाती है। यह कहानी को देखने का एकदम स्थूल नजरिया है जबकि कहानी को अगर सूक्ष्म तरीके से देखें परखे तो यह कहानी हमें जीवन के करीब ले जाने की कोशिश करती है । समाज में व्याप्त हर अमानवीयता के विरुद्ध हमारे भीतर एक आक्रोश पैदा करती है। दरअसल यही सूक्ष्म नजरिया ही कहानी का असल  पक्ष है जिसे देख पाना हर पाठक के लिए संभव भी  नहीं है।

रमेश शर्मा

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

सुबह सवेरे अखबार में प्रकाशित कहानी: रेस्तरां से लौटते हुए

छुट्टी का  दिन था । वीकली ऑफ । उनके लिए छुट्टी का दिन याने मौज मस्ती का दिन। खाना पीना घूमना ।  एक ने कहा 'चौपाल जायेंगे , वहां लंच लेंगे ।'  'नहीं यार चौपाल नहीं , आज नारियल नेशन जायेंगे ।' - दूसरे ने झट से उसकी बात काटते हुए कह दिया  । दोनों की बातें सुनकर तीसरे ने हँसते हुए कहा 'तुम लोग भी न..... वही घिसी पिटी जगह ! अरे जीवन में जायका बदलने की भी सोचो , किसी नयी जगह की बात करो , ये क्या उसी जगह बार बार जाना ।'  तीसरे की बात सुनकर दोनों हक्का बक्का उसकी ओर देखने लगे थे ।उन दोनों को लगा कि यह सच बोल रहा है । पर  पहले ने बदलाव शब्द सुनकर आहें भरी और कहने लगा .... हमारे जीवन में बदलाव कहाँ है दोस्त ! वही रोज रोज का घिसा पिटा काम । सुबह हुई नहीं कि बीबी को नींद से जगाओ, टिफिन तैयार करवाने के लिए कहो। फिर बाथ रूम में जाकर हबड़ तबड़ नहाकर निकलो । कपड़े पहनो और भाग लो कम्पनी की बस पकड़ने। यार अब तो लगता है जैसे इसी रूटीन पर चलते चलते जिन्दगी के ऊपर जंग की एक परत जम गयी है । यह सब कहते कहते उसके चेहरे से नीरसता का भाव टपक पड़ा ।  दूसरा ज्यादा सोचता नहीं था । मानो...

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी रायगढ़ - डॉ. बलदेव

अब आप नहीं हैं हमारे पास, कैसे कह दूं फूलों से चमकते  तारों में  शामिल होकर भी आप चुपके से नींद में  आते हैं  जब सोता हूँ उड़ेल देते हैं ढ़ेर सारा प्यार कुछ मेरी पसंद की  अपनी कविताएं सुनाकर लौट जाते हैं  पापा और मैं फिर पहले की तरह आपके लौटने का इंतजार करता हूँ           - बसन्त राघव  आज 6 अक्टूबर को डा. बलदेव की पुण्यतिथि है। एक लिखने पढ़ने वाले शब्द शिल्पी को, लिख पढ़ कर ही हम सघन रूप में याद कर पाते हैं। यही परंपरा है। इस तरह की परंपरा का दस्तावेजीकरण इतिहास लेखन की तरह होता है। इतिहास ही वह जीवंत दस्तावेज है जिसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वज लेखकों को जान पाती हैं। किसी महत्वपूर्ण लेखक को याद करना उन्हें जानने समझने का एक जरुरी उपक्रम भी है। डॉ बलदेव जिन्होंने यायावरी जीवन के अनुभवों से उपजीं महत्वपूर्ण कविताएं , कहानियाँ लिखीं।आलोचना कर्म जिनके लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्हीं के लिखे समाज , इतिहास और कला विमर्श से जुड़े सैकड़ों लेख , किताबों के रूप में यहां वहां लोगों के बीच आज फैले हुए हैं। विच...

दिव्या विजय की कहानी: महानगर में एक रात, सरिता कुमारी की कहानी ज़मीर से गुजरने का अनुभव

■विश्वसनीयता का महासंकट और शक तथा संदेह में घिरा जीवन  कथादेश नवम्बर 2019 में प्रकाशित दिव्या विजय की एक कहानी है "महानगर में एक रात" । दिव्या विजय की इस कहानी पर संपादकीय में सुभाष पंत जी ने कुछ बातें कही हैं । वे लिखते हैं - "महानगर में एक रात इतनी आतंकित करने वाली कहानी है कि कहानी पढ़ लेने के बाद भी उसका आतंक आत्मा में अमिट स्याही से लिखा रह जाता है।  यह कहानी सोचने के लिए बाध्य करती है कि हम कैसे सभ्य संसार का निर्माण कर रहे जिसमें आधी आबादी कितने संशय भय असुरक्षा और संत्रास में जीने के लिए विवश है । कहानी की नायिका अनन्या महानगर की रात में टैक्सी में अकेले यात्रा करते हुए बेहद डरी हुई है और इस दौरान एक्सीडेंट में वह बेहोश हो जाती है। होश में आने पर वह मानसिक रूप से अत्यधिक परेशान है कि कहीं उसके साथ बेहोशी की अवस्था में कुछ गलत तो नहीं हो गया और अंत में जब वह अपनी चिंता अपने पति के साथ साझा करती है तो कहानी की एक और परत खुलती है और पुरुष मानसिकता के तार झनझनाने लगते हैं । जिस शक और संदेह से वह गुजरती रही अब उस शक और संदेह की गिरफ्त में उसका वह पति है जो उसे बहुत प्...

2025-26 के इस बजट से मायूस हुए 16000 एन एच एम स्वास्थ्य संविदा कर्मचारी. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं है खास

2025-26 के इस बजट से मायूस हुए 16000 एन एच एम स्वास्थ्य संविदा कर्मचारी. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं. करोना योद्धा कर्मचारियों में भारी निराशा घोषित 27 प्रतिशत वेतन वृद्धि के लिए कई बार मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों से मुलाकत कर चुके हैं. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारी  बड़े आंदोलन की तैयारी में एन एच एम कर्मियों के आंदोलन में जाने से स्वास्थ्य व्यवस्था होगी प्रभावित “एनएचएम कर्मचारीयों को पूर्व घोषित 27 प्रतिशत वेतन-वृद्धि, सहित 18 बिंदु मांग को बजट 2025-26 में शामिल करने का था भरोसा रायपुर ।  छत्तीसगढ़ प्रदेश एन.एच.एम. कर्मचारी संघ अपने लंबित मांग को लेकर लगातार आवेदन-निवेदन-ज्ञापन देते आ रहे हैं एवं लम्बे समय से नियमितीकरण सहित 18 बिंदु को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। पिछली सरकार ने 19 जुलाई 2023 अनुपूरक बजट में एन.एच.एम. कर्मियों के वेतन में 27 प्रतिशत की राशि की बढ़ोतरी की घोषणा की थी, जो आज तक अप्राप्त हैं।उक्त संविदा कर्मचारी संघ ने लगातार विभिन्न विधायक/मंत्री सहित मुख्यमंत्री को अपना ज्ञापन दिया था, जिसका आज तक निराकरण नहीं हुआ है, जिससे कर्मचारियों म...

रघुनंदन त्रिवेदी की कहानी : हम दोनों

स्व.रघुनंदन त्रिवेदी मेरे प्रिय कथाकाराें में से एक रहे हैं ! आज 17 जनवरी उनका जन्म दिवस है।  आम जन जीवन की व्यथा और मन की बारिकियाें काे अपनी कहानियाें में मौलिक ढंग से व्यक्त करने में वे सिद्धहस्त थे। कम उम्र में उनका जाना हिंदी के पाठकों को अखरता है। बहुत पहले कथादेश में उनकी काेई कहानी पढी थी जिसकी धुंधली सी याद मन में है ! आदमी काे अपनी चीजाें से ज्यादा दूसराें की चीजें  अधिक पसंद आती हैं और आदमी का मन खिन्न हाेते रहता है ! आदमी घर बनाता है पर उसे दूसराें के घर अधिक पसंद आते हैं और अपने घर में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! आदमी शादी करता है पर किसी खूबसूरत औरत काे देखकर अपनी पत्नी में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! इस तरह की अनेक मानवीय मन की कमजाेरियाें काे बेहद संजीदा ढंग से कहानीकार पाठकाें के सामने प्रस्तुत करते हैं ! मनुष्य अपने आप से कभी संतुष्ट नहीं रहता, उसे हमेशा लगता है कि दुनियां थाेडी इधर से उधर हाेती ताे कितना अच्छा हाेता !आए दिन लाेग ऐसी मन: स्थितियाें से गुजर रहे हैं , कहानियां भी लाेगाें काे राह दिखाने का काम करती हैं अगर ठीक ढंग से उन पर हम अपना ध्यान केन्...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

गंगाधर मेहेर : ओड़िया के लीजेंड कवि gangadhar meher : odiya ke legend kavi

हम हिन्दी में पढ़ने लिखने वाले ज्यादातर लोग हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के कवियों, रचनाकारों को बहुत कम जानते हैं या यह कहूँ कि बिलकुल नहीं जानते तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।  इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ओड़िसा राज्य के संबलपुर शहर में स्थित गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर वक्ता वहां जाकर बोलने का अवसर मिला ।  2 और 3  मार्च 2019 को आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जिस शख्श के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण हुआ है वे ओड़िसा राज्य के ओड़िया भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं और उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से  ओड़िसा राज्य को देश के नक़्शे में थोड़ा और उभारा है। वहां जाते ही इस कवि को जानने समझने की आतुरता मेरे भीतर बहुत सघन होने लगी।वहां जाकर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों से , वहां के विद्यार्थियों से गंगाधर मेहेर जैसे बड़े कवि की कविताओं और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी जुटाना मेरे लिए बहुत जिज्ञासा और दिलचस्पी का बिषय रहा है। आज ओड़िया भाषा के इस लीजेंड कवि पर अपनी बात रखते हुए मुझे जो खु...

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सो...