सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रमेश शर्मा की कहानी 'खाली जगह'


           हर से तीस किलोमीटर दूर जंगल के भीतर एक छोटा सा गांव कुरेमाल  जहां पिछले तीस  सालों से रामदीन  गुरुजी स्कूल मास्टरी करते हुए इतिहास बना चुके हैं। उनकी सेवा की जो उम्र है वही उम्र उनके इस स्कूल की भी है। न रामदीन  गुरुजी को अपने सेवाकाल में सरकार की ओर से कोई तरक्की मिली, न इस विद्यालय के इतिहास में तरक्की का कोई नया अध्याय जुड़ा.... हां इतना जरूर हुआ कि रामदीन गुरूजी के स्वयं के खर्चे से दूसरे दिन ही सही दूर के एक बस स्टैंड में उतर कर लोगों के हाथों से सरकते हुए इस गांव तक अखबार पहुंच जाता है जिससे देश दुनिया का हाल सबको वे बताते रहते हैं।शहर से ज्यादा दूर ना होकर भी अपनी भौगोलिक बनावट के कारण इस गांव को विकास के नक्शे में ढूंढ पाना अब तक यहां के लोगों के लिए एक सपना ही रहा है। शायद इसलिए यहां के सीधे-साधे लोग इस जमाने में भी सपनों की उड़ान नहीं भरते जहां से कोई कहानी शुरू हो सके।

 


      रामदीन  गुरुजी का एक सपना है कि कम से कम उनके रिटायरमेंट तक इस गांव की मेड़ें और पगडंडियाँ सड़कों का रूप ले सकें । शहर तक आसानी से लोगों का आना जाना हो सके । इस छोटे से गांव में जीवन की असीम संभावनाएं हैं पर यहां की गरीबी देखकर भी वे कभी-कभी अत्यंत दुखी एवं उदास हो उठते हैं ।अखबार में जब वे देश दुनिया की खबरें पढ़ते हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है , यहां जबकि अभी भी एक वक्त की रोजी -मजूरी कमा कर लोग लाते हैं तभी घर का चूल्हा जलता है तो दूसरी तरफ कारपोरेट सेक्टर में महीनों में लाखों की तनख्वाह अर्जित करने वालों की दुनिया से भी वे परिचित होते हैं। इन तीस सालों की मास्टरी में असमानता की इतनी गहरी खाई को देखना उन्हें चकित करता है। हर आदमी के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की एक नदी बहती है जहां आदमी नहाता है, तैरता है और डूबकी भी लगाता है । कभी-कभी नदी उसे इतनी दूर बहा कर ले जाती है जहां से आदमी के लिए लौटना संभव नहीं। मास्टर जी के जीवन में बहने वाली नदी भी उन्हें कई कई बार दूर बहा कर ले जा चुकी है ।उनकी जीवटता ही है कि वे अब तक फिर से जीवन की ओर लौटते रहे हैं और अब तक इस गांव में डटे हुए हैं ... पर हाल ही की घटना ने मास्टर जी को तोड़ कर रख दिया है। मास्टर जी के जीवन में बहने वाली नदी उन्हें इतनी दूर बहा कर ले आई है कि शायद ही अब वे लौट सकें।

 

      घटना की शुरुआत वहां से होती है जब फूलमती नाम की एक छोटी सी बच्ची बीमार पड़ी । चौथी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची जब कई कई दिनों तक स्कूल नहीं पहुंची तो मास्टर जी ने उसकी खोज खबर ली ।उन्हें पता चला कि कई दिनों से वह बुखार से पीड़ित है ।  गांव में चिकित्सा की कोई सुविधा ना होने के कारण बच्ची का बुखार क्रॉनिक हो गया है । फूलमती के घर की हालत यह है कि उसके पिता दिहाड़ी  पर काम करने वाला मजदूर है । एक वक्त का कमा कर लाता है तो कहीं घर का चूल्हा जलता है । बच्ची की हालत यह है कि अगर उसे शहर ले जाकर इलाज नहीं करवाया गया तो उसकी जान भी जा सकती है । सारी परिस्थितियों को देखते हुए मास्टर जी का दिल नहीं माना , वे फूलमती के पिता रामेश्वर के हाथ में 10 के 30 नोट थमाते हुए शहर के डॉक्टर दिवाकर मिश्रा को दिखाने की जिद करने लगे।

   अगली सुबह रामेश्वर अपनी बेटी को साइकिल के कैरियर पर बिठा असिसते हुए 30 किलोमीटर की दूरी तय कर शहर पहुंचा है । उसकी साइकिल भी ऐसी कि पैडल के रबर पैड तक गायब।उसमें सिर्फ लोहे के बीच की नाल भर शेष थी जहां खाली पैर जोर लगाने से रामेश्वर के पांवों में दर्द भी हो रहा था।  

Top of Form

      बाएं पैर की चप्पल की पट्टी रास्ते में टूट जाने के कारण चप्पलों को उसने अपने थैले में डाल रखा था । इतना कुछ तकलीफ उठा कर भी बेटी के इलाज की आस ने उसके भीतर थोड़ी ताकत पैदा कर दी थी ।भरी धूप  में बीमार बेटी को इस पुरानी साइकिल पर बिठा शहर के मिश्रा डॉक्टर के क्लीनिक तक पहुंचने का संतोष उसकी आंखों में साफ झलक रहा था।वह देख रहा था यहां काफी भीड़ है । एक बड़ा सा हॉल  है जहां बीस-तीस कुर्सियां लाइन से लगी हैं जिसमें पेशेंट बैठे हुए हैं।दीवारों पर लगी मानव सेवा की आदमकद तख्तियां सबकी नजरें अपनी ओर खींच रही हैं ।एक कोने में काले कांच की दीवारों से सुसज्जित एक ए.सी. कमरा है जहां डॉक्टर मिश्रा का चेंबर है। कमरे के बाहर पेशेंट के नामों का रजिस्टर लिए टेबल के पीछे चेयर लगाकर एक असिस्टेंट बैठा हुआ है जिसके चेहरे की बेरुखी वहां हॉल में इस तरह फैल रही है जैसे पेशेंट की आंखों में धूल या तिनका गिराने वाली हो । यह सब देखते हुए डरते डरते कोने की सबसे आखिरी सीट पर रामेश्वर बैठ गया ।उसने फूलमती को अपनी गोदी में बिठा लिया जो बुखार से निढाल सी हो रही थी | रामेश्वर को कुछ सूझ नहीं रहा कि वह क्या करे | बगल की सीट पर बैठे एक बीमार बुड्ढे से वह पूछ बैठा-  “क्या करना होगा?

“अरे मरीज का नाम लिखा दो और दो-तीन दिन तक दौड़ो, डॉक्टर से भेंट हो गई तो ठीक है नहीं तो तुम्हारी किस्मत !” -- बूढ़े की झल्लाहट  भरी आवाज सुनकर ऊँघ रही फूलमती जाग गई ।

“इसका नाम लिखाना है बाबू” -- आवाज सुनकर पहले तो वह असिस्टेंट रामेश्वर को घूर कर देखा फिर नाम लिखने के बजाय उसकी नजरें रामेश्वर के ऊपर इस तरह तैरने लगीं जैसे वे कुछ ढूंढ रही हों । मैले कुचैले कपड़े,सर पर गमछे की पगड़ी, शरीर पर मटमैली बनियान , बिना चप्पल वाले खुरदुरे पांवों को देखकर असिस्टेंट के चहरे की बेरूखी थोड़ी और बढ़ गई । कुछ भी ढूँढ़ पाने की नाउम्मीदी में वह घुड़कने के अंदाज में कहने लगा – “ बैठ जाओ अभी , थोड़ा टैम लगेगा !”

पता नहीं फिर उसे क्या सूझा कि फूलमती का नाम दर्ज करते हुए उसने रामेश्वर को बताया कि अगर इमरजेंसी है तो डॉक्टर की फीस पांच सौ रुपये या फिर दो सौ रूपये जमा कर दो और कल शाम तक देख लेना। अगर पारी आ जाए तो ठीक नहीं तो परसों आना पड़ेगा । वह सब कुछ इतनी आसानी से कह गया जैसे किसी के सामने ताश के पत्ते फेंट रहा हो ।

रामेश्वर ने अपने थैले में रखे पैसों को टटोला जहां मास्टरजी द्वारा दी गए दस दस के तीस नोट पड़े थे | कुछ मैले कुचैले दस दस के पांच नोट जो उसके पास थे ,उन्हें भी वह साथ ले आया था । डॉक्टर से इमरजेंसी मीटिंग की जरूरत तो सबसे ज्यादा उसे है पर पांच सौ रूपये ....? वह फूलमती की तरफ देखा जो निढाल होकर कुर्सी पर ही लेट गई थी ।

“बापू... पानी” उसे आते देखकर दूर से ही उसने आवाज दी । वह सुना और वहीं कोने पर रखे फ़िल्टर का नल खोलकर पास रखी एक पुरानी सी ग्लास में पानी ले आया ।उसने अपने थैले को टटोला , जिसमें घर से ही रखा पारले जी का एक बिस्किट पेकेट भी था जिसे फाड़कर उसने बेटी के हाथ में दिया। वहां से कुछ बिस्किट निकालकर फूलमती चबाने लगी ,जब वह थक गई तब उसे उसने पानी पिलाया और ग्लास को फिर वहीं रख आया। इस बीच उसकी नजरें फिर उस असिस्टेंट की तरफ चली गईं । संभ्रांत नजर आने वाले लोगों से वह बड़े अदब से बातें कर रहा था और इमरजेंसी मीटिंग की फीस लेकर डॉक्टर के चेंबर में जाने का इशारा कर रहा था।

 

     रामेश्वर को कुछ सूझ नहीं रहा था । वह कुछ देर बैठे बैठे सोचता रहा , अगर डॉक्टर साहब बाहर निकलें तो उनके पाँव पकड़ कर बेटी की इलाज की खातिर वह विनती करे ... पर उसकी यह आस भी टूट गई जब उनका असिस्टेंट यह कहकर सबको विदा करने लगा कि साहब लंच पर चले गए अब उनसे कल दस बजे मुलाक़ात होगी।शाम को किसी टूर पर हैं , आज फिर वे नहीं मिल सकेंगे । रामेश्वर थोड़ी देर अवाक रहकर इधर उधर पागलों की तरह झाँकने लगा , कहीं डॉक्टर साहब दिख जाएं , पर उसे क्या पता कि डॉक्टरों के चेंबर से उनके बेडरूम तक एक अंधेरी सुरंग भी बनी रहती है जिससे होकर लोगों से नजरें बचाते वे जब चाहे आ जा सकते हैं । जब पूरा हाल खाली हो गया तब भारी मन से अपनी बीमार बेटी को उसी साईकिल के कैरियर पर बिठा वह घर की ओर लौटने लगा । लौटते समय वह महसूस करता रहा कि शरीर और मन दोनों से वह थका हुआ है।उसके खाली पाँव पैडल पर मुश्किल से पड़ पा रहे हैं । उसके भीतर की ताकत जैसे धीरे धीरे मरती जा रही है । उनके घर पहुँचने के पहले सूरज भी थककर आसमान के पीछे जा चुका था ।

 

     दूसरे दिन फूलमती का बुखार थोड़ा और बढ़ गया था | इलाज की आस में वह फिर उसे साईकिल के कैरियर पर बिठा शहर की ओर निकल रहा था |आज धूप कल से भी तेज थी | निकलते समय वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर  रहा था ... कम से कम आज बिटिया का इलाज हो जाए तो उसे शान्ति मिले | उसके दवा दारू के खर्च की व्यवस्था पर वह चिंता करते जा रहा था | दो सौ रूपए तो डॉक्टर को ही वह दे चुका है | बचे डेढ़ सौ में ही उसे दवा-दारू करनी है | इतने में होगा या नहीं रात भर वह सोचता ही रहा था पर वह तो दो तीन दिन से काम पर भी नहीं गया , तो फिर पैसे ?उसकी चिंता ने उसके भीतर फिर थोड़ी ताकत पैदा कर दी थी | वह असिसते हुए फिर उसी जगह पहुँच आया जहाँ कल से थोड़ी ज्यादा भीड़ थी | कल तो उन्हें कम स कम बैठने की जगह मिल गयी थी, आज तो वह भी नहीं | वे दोनों कुर्सियों के बाद वाली फर्श की खाली जगह पर ही बैठकर अपनी पारी की प्रतीक्षा में असिस्टेंट की ओर कातर भाव से देखने लगे |  

 

     कुछ ही देर बाद कार से उतर कर एक जवान दंपत्ति भी वहां आ पहुंचे | उनके आने से उस हॉल में दवाइयों की उठने वाली गंध की जगह परफ्यूम की तेज सुगंध फैल गई| वह महिला जो पेशेंट कम और तरोताजा ज्यादा लग रही थी हाल के मरीजों को देख कर नाक भौं सिकोड़ रही थी | उन्हें देखकर डॉक्टर का असिस्टेंट थोड़ा परेशान हो उठा |  वह उन से कातर भाव से निवेदन करते हुए बस पाँच मिनट में डॉक्टर से मिलवाने की बात कर रहा था | उनके चेहरे से ऐसे भाव उठ रहे थे जैसे पाँच मिनट भी उन पर भारी पड़ रहे हों  और ठीक पाँच  मिनट बाद बेल बजते ही वे डॉक्टर के चेंबर में प्रवेश कर रहे थे | कांच का वह काला दरवाजा फिर बंद हो गया जिसके खुलने की प्रतीक्षा में रामेश्वर बेचैन हो रहा था | थोड़ी देर बाद बाहर से चाय की दो प्यालियाँ भी अंदर भेजी जा रही थीं | वह मन ही मन ईश्वर को फिर से याद करने लगा | आधे घंटे बाद संभ्रांत दंपति विजेता की तरह बाहर आ रहे थे, उनके पीछे कोई तीसरा भी था जो उन्हें विदा कर रहा था | रामेश्वर अंदाज लगा रहा था कि शायद यही डॉक्टर साहब हैं जिनका चेहरा आज वह देख सका है | उसके भीतर की छटपटाहट थोड़ी और बढ़ गई थी जो फूलमती का नाम पुकारे जाने पर अब कहीं शांत हुई थी |

रामेश्वर बेटी को साथ लेकर दबे सकुचाते डॉक्टर के चेंबर में प्रवेश कर रहा है | उन्हें जाते हुए डॉक्टर का असिस्टेंट फिर घूरने लगा है | ऐसे मरीजों से बख्शीश में दो पैसे मिल पाने की नाउम्मीदी से उसकी झल्लाहट थोड़ी बढ़ गई है |

“हां बोलो क्या हुआ है?”

“इस को बुखार है डॉक्टर साहब”

“कब से?”

“जी सप्ताह भर हो गए!”

“और तुम आज इसे लेकर आ रहे हो... कम से कम 24 घंटे पहले आना था !”

“जी कल भी आया था साहब पर आप...!” बोलते बोलते रामेश्वर देख रहा था जो चेहरा फूलमती को चेकअप करते उसके पीछे था अचानक उसकी ओर  तन गया है

“तुम मुझ पर इल्जाम लगा रहे हो बेवकूफ!”

“जी साहब ऐसी बात नहीं है मैं तो...”

“कितने पैसे लाए हो? इसका तो मलेरिया ब्रेन में चढ़ चुका है!”

“ फीस के दो सौ देने के बाद डेढ़ सौ बचे हैं साहब!”

“ ओह्ह शीट्! क्या तमाशा है ?” बोलते बोलते डॉक्टर एक हाथ से दवाईयों की पर्ची लिखता रहा और दूसरे हाथ से काल बेल बजा दिया | इससे पहले रामेश्वर बेटी को साथ लेकर बाहर निकले एक दूसरा पेशेंट उनकी जगह आ धमका | रामेश्वर के मन में कई प्रश्न तैरने लगे , आखिर डॉक्टर उससे चाहता क्या था ? कहीं खतरे की बात तो नहीं ? डॉक्टर का तेवर देखकर आगे कुछ पूछने की हिम्मत उसकी नहीं हुई | वह बेटी को साथ लेकर पास के एक मेडिकल स्टोर्स में पहुंचा |

“ देखना साहब दवाईयां कितने की हैं ?”

दस दिन का लिखा है चार सौ रुपये की आएगी”-- पर्ची देखकर दुकानदार ने रामेश्वर से कहा और इशारे से पूछा -- दूँ ?

“जी ! तीन  दिन का अभी दे दीजिए, डेढ़ सौ में तो आ जाएंगी न ?

दुकानदार कुछ जवाब दिए बिना ही दवाइयां थमा कर बाकी के बचे पैसे लौटाने लगा |

“दवाइयां लेकर उन्हें अब गांव की ओर लौटना है | तीस किलोमीटर की दूरी भी तय करनी है |” --- रामेश्वर फूलमती को कैरियर पर बिठाते हुए सोचता रहा |

वह दो दिनों से कुछ न कुछ सोच ही तो रहा है | बिटिया ठीक हो जाएगी वह काम पर फिर से जाने लगेगा | फिर  मास्टरजी के पैसे धीरे धीरे लौटा देगा |

“बापू आज आप खुश तो हो ना?” क्योंकि डॉक्टर से हमारी मुलाकात हो गई |

“बापू डॉक्टर क्यों ऐसा कह रहा था कि 24 घंटे पहले आना था हम तो कल भी आए थे ना !”

“बापू डॉक्टर कह रहा था कि मलेरिया ब्रेन में चढ़  गया है | यह मलेरिया क्या होता है बापू ?”

“बापू ओ पैसों के बारे में क्यों पूछ रहा था आपसे?”

दो दिनों से चुप सी रहने वाली फूलमती अचानक सवाल पर सवाल किए जा रही थी | रामेश्वर तेजी से साईकिल असिसने लगा | इससे पहले कि सूरज बादलों की ओट में जा कर छुपे वह गांव पहुंच जाना चाहता था | वे गांव के छोर पर पहुंच भी गए थे |

“बापू मुझे चक्कर आ रहा है बाबू !” कुछ देर चुप रहने वाली बिटिया की आवाज फिर उसे सुनाई पड़ी |

वह सुन पाता इससे पहले ही वह एक तरफ झुक कर गिरने लगी थी जिसे अचानक साईकिल रोककर उसने अपनी छाती से रोका | उस वक्त तेज हवा भी चलने लगी थी | वह साइकिल वहीं छोड़ कर उसे अपनी छाती से चिपका गांव की तरफ दौड़ने लगा | उसकी गति हवा से भी तेज हो गई थी |  घर पहुंच कर उसने बेटी को आंगन में पड़ी खाट पर लिटा दिया,  तब तक उसकी पत्नी भी वहां आ पहुंची थी | उसने बेटी को बाहों में भर लिया जो अब बेहोश पड़ी थी | उसकी आंखें धीरे धीरे एक तरफ झुक आई थीं | वहां अब लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी | मास्टर जी भी वहां आ पहुंचे | उन्होंने फूलमती की नाड़ियों को छूकर देखा जो बंद हो चुकी थीं |

“रामेश्वर तुमने देर कर दी!” --मास्टर जी की आवाज सबने सुनी जो आंगन के उस पेड़ की पत्तियों को देख रहे थे जिन पर घना अंधेरा पसरने लगा था और जो अब पत्तियों और सबके चेहरों पर पसरते  हुए फूलमती के चेहरे पर सदा के लिए पसर जाएगा | रामेश्वर मास्टर जी के पैरों को पकड़ कर रो रहा था और दो दिन की आपबीती सुना रहा था |  इस आपबीती  में रुदन कम और वेदना ज्यादा थी जो मास्टर जी के दिल को बेधती चली जा रही थी | घर लौटते वक्त मास्टर जी के मन में बहुत से सवाल उठ रहे थे | काश वह रामेश्वर को कुछ और पैसे की सहायता कर पाए होते... कम से कम डॉक्टर की इमरजेंसी फीस के बराबर, पर उन्हें क्या पता था कि शहर का इतना मशहूर डॉक्टर इमरजेंसी मरीज की जगह इमरजेंसी फीस की एक नई परिभाषा चिकित्सा सेवा में जोड़ चुका है | डॉ. मिश्रा की तारीफ में अखबारों में आने वाली खबरें क्या महज  प्रचार प्रसार के स्टंट भर नहीं हैं जहां से और धन कमाया जा सके | क्या लोगों की संवेदना इस हद तक मर चुकी है? ऐसे प्रश्न मास्टरजी की नींद उड़ा दिया करते हैं | उन्हें पता है कि आज वे सोएंगे नहीं , देर रात तक जागते रहेंगे |

मास्टरजी अगली सुबह स्कूल की कक्षा में उदास बैठे हुए थे | कक्षा के कोने में उनकी कुर्सी लगी हुई थी जहां बैठे बैठे उनका ध्यान उस जगह पर  बार बार जा रहा था जो बीमार फूलमती के न आने से कई दिनों से खाली थी और अब खाली ही रहेगी | वे एक दूसरी बच्ची को उस जगह बैठ जाने का इशारा करने लगे | ऐसा करते हुए उनके मन में एक सवाल हथौड़े की तरह चोट करने लगा –

“ क्या खाली जगहें कभी भरी जा सकती हैं ?”


---------------------------

 

रमेश शर्मा

92 श्रीकुंज , बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

मोबाइल 7722975017,  9752685148

 

टिप्पणियाँ

  1. ओह्ह्ह्ह यथार्थ ऊकेरती बेहद मार्मिक रचना, साधुवाद!
    -नन्दलाल सिंह

    जवाब देंहटाएं
  2. अत्यंत मार्मिक कहानी।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत शानदार कहानी। बहुत मार्मिकता से लबरेज कहानी।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इन्हें भी पढ़ते चलें...

समर कैंप के प्रथम दिवस स्वामी आत्मानंद शा. चक्रधर नगर स्कूल में बैंकिंग साक्षरता पर हुआ आयोजन /छात्र-छात्राओं को ग्रामीण बैंक चक्रधर नगर का भ्रमण करवाया गया

समर कैंप के प्रथम दिवस स्वामी आत्मानंद शा. चक्रधर नगर स्कूल में बैंकिंग साक्षरता पर हुआ आयोजन/ छात्र-छात्राओं को ग्रामीण बैंक चक्रधर नगर का भ्रमण करवाया गया रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर केम्प का आयोजन 20 मई को प्रारम्भ हुआ। विद्यालय प्रबंधन की ओर से प्रथम दिवस बैंकिंग साक्षरता पर कार्यक्रम रखा गया था। विद्यालय प्राचार्य के आग्रह पर आयोजन के प्रथम दिवस स्टेट बैंक के सेवा निवृत अधिकारी प्रमोद शराफ एवं स्टेट बैंक के वित्तीय साक्षरता काउंसलर राजकुमार शर्मा उपस्थित हुए।बैंकिंग साक्षरता को लेकर बुनियादी जानकारियों के साथ दोनों ही अधिकारियों ने बच्चों से सार्थक संवाद किया। उन्होंने विस्तारपूर्वक बैंक से जुड़े कार्यों की सिलसिलेवार जानकारी दी। बैंक में किस तरह पैसे जमा किये जाते हैं, किस तरह पैसे निकाले जाते हैं, किस तरह इनके फॉर्म भरे जाते हैं, कितनी प्रकार की खाताएं बैंक में खोली जा सकती हैं , बैंक के लेनदेन में किस तरह की सावधानियां रखनी चाहिए,  इन सारी बातों पर अधिकारियों की ओर से बहुत महत्वपूर्ण संवाद स्थापित किये गए । छात्र-छात्राओं से ज

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ओमा द अक ने

समर केम्प में चक्रधरनगर स्कूल के बच्चों ने संगीत और गायकी का लिया आनंद / प्रसिद्ध युवा बांसुरी वादक विकास तिवारी ने दी अपनी प्रस्तुति

रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप के तहत 27 मई को बांसुरी वादक विकास कुमार तिवारी ने अपनी प्रस्तुति दी।  संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार  शराफ ने छात्र-छात्राओं से आगन्तुक अतिथि विकास कुमार तिवारी का परिचय कराया साथ ही उन्हें संबोधन एवं अपनी सांगीतिक प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े प्रधान पाठक विकास कुमार तिवारी ने शिक्षा एवं संगीत के क्षेत्र में अपने अनुभवों को साझा किया । संगीत जैसी कला की बारीकियों का जीवन में क्या महत्व है इस पर उन्होनें कुछ बातें रखीं। उन्होंने बांसुरी वादन की कुछ बेहतरीन प्रस्तुतियां  दीं जिसका बच्चों ने आनंद उठाया। कुछ बच्चों ने समर केम्प पर फीडबैक भी दिया। इस अवसर पर प्राचार्य राजेश डेनियल ने बच्चों एवं स्टॉफ को संबोधित करते हुए कहा कि यह सत्र हमारे लिए उपलब्धियों भरा रहा। न केवल विद्यालय में अच्छे परीक्षा परिणाम आए बल्कि अन्य गतिविधियों में भी वर्षभर यहां के छात्र-छात्राओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। समर कैंप भी हमारे लिए एक उपलब्धियों भरा यादगार आयोजन है जिसमें अनेक प्रकार की गतिव

युवा मोटिवेशनल स्पीकर प्रतिची पटेल एवं हैंडराइटिंग स्पेशलिस्ट जीआर देवांगन सर ने बच्चों को किया संबोधित। समर केम्प के बच्चों को दोनों ने दिए जीवन में आगे बढ़ने के टिप्स

रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप में हैंडराइटिंग स्पेशलिस्ट जीआर देवांगन एवं युवा मोटिवेशनल स्पीकर प्रतिची पटेल का आगमन हुआ।  प्रतिची पटेल का सम्बोधन सर्वप्रथम विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ़ ने दोनों अतिथियों का परिचय विद्यालय के छात्र-छात्राओं से करवाया। इस अवसर पर जीआर देवांगन ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि छात्रों की हैंड राइटिंग अगर सुंदर हो तो उन्हें परीक्षाओं में इसका लाभ मिलता है। मूल्यांकन कर्ता इससे प्रभावित होते हैं । जी आर देवांगन हैंड राइटिंग स्पेशलिस्ट हैंडराइटिंग से बच्चों के व्यक्तित्व का पता चलता है । इस दिशा में थोड़ी सी मेहनत से बच्चे अपना हैंडराइटिंग सुधार सकते हैं। हां यह जरूर है कि इसके लिए उन्हें सतत अभ्यास और मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी। उन्हें कर्सिव राइटिंग को लेकर बच्चों को बहुत से उपयोगी टिप्स भी दिए और सवाल जवाब के माध्यम से बच्चों ने बहुत सी बातें उनसे सीखीं। आयोजन में पधारे दूसरे अतिथि वक्ता युवा मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में ख्यात, हाल ही में सीबीएसई 12वीं बोर्ड एग्जाम उत्तीर्ण प्रतिची

पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के बताए तरीके /शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर में समर कैंप के तहत किया गया प्रायोगिक प्रदर्शन

पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के बताए तरीके शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर में समर कैंप के तहत किया गया प्रायोगिक प्रदर्शन रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के विभिन्न तरीकों का  बच्चों के समक्ष प्रायोगिक प्रदर्शन किया। संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ ने सर्वप्रथम समस्त अधिकारियों का स्कूली बच्चों से परिचय करवाया।   अग्निशमन सेवा से जुड़े अधिकारी खलखो सर ने इस अवसर पर सिलिंडर में आग लग जाने की स्थिति में किस तरह अपना बचाव किया जाए और आग लगने से आस पड़ोस को कैसे बचाए रखें , इस संबंध में बहुत ही अच्छे तरीके से जानकारी दी और अग्निशमन से जुड़े विभिन्न यंत्रों का उपयोग करने की विधि भी  उन्होंने बताई। उनके साथी जावेद सिंह एवं अन्य अधिकारियों ने भी उनका सहयोग किया। बच्चों ने स्वयं डेमोंसट्रेशन करके भी आग पर काबू पाने की विधियों का उपयोग किया। दैनिक जीवन में काम आने वाली ये जानकारियां बहुत ही सारगर्भित रहीं। इस डेमोंसट्रेशन को स्टॉफ के सभी सदस्

समर केम्प का दूसरा दिन 'तारे जमीं पर' फिल्म के प्रदर्शन और व्यावसायिक कैंपस के भ्रमण पर केंद्रित रहा /स्वामी आत्मानंद शा. उच्चतर मा. विद्यालय चक्रधर नगर के छात्रों ने अपना अनुभव साझा किया

समर केम्प का दूसरा दिन 'तारे जमीं पर' फिल्म के प्रदर्शन और व्यावसायिक कैंपस के भ्रमण पर केंद्रित रहा स्वामी आत्मानंद शा. उच्चतर मा. विद्यालय चक्रधर नगर के छात्रों ने अपना अनुभव साझा किया रायगढ़ । स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप के द्वितीय दिवस का आयोजन हुआ। सर्वप्रथम संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ द्वारा बच्चों को संबोधित किया गया। उन्होंने शिक्षाप्रद फिल्मों को लेकर बच्चों को बहुत सारी जानकारियां प्रदान कीं। उसके बाद शिक्षक स्टाफ राजा राम सरल और के पी देवांगन के तकनीकी सहयोग से प्रोजेक्टर के माध्यम से बच्चों को बड़े पर्दे पर 'तारे जमीं पर' नामक फिल्म दिखाई गई। यह फिल्म मूलतः बच्चों के मनोविज्ञान पर केंद्रित है । इस फिल्म का बच्चों ने खूब आनंद लिया। इस फिल्म को लेकर शालेय परिवार की शिक्षिकाओं नायर मेडम, वसुंधरा पांडेय मेडम, भगत मेडम, कनक मेडम एवम शारदा प्रधान ने बच्चों से बातचीत की एवं उनके विचार भी जानने का प्रयास किया। इस अवसर पर बच्चों की ओर से कीर्ति यादव,कशिश डनसेना,बरखा तम्बोली,मुस्कान नामदेव ने फ़िल्म को ल

कथा कहानी के नाम रहा समर कैंप का आखिरी दिन /बच्चों ने केम्प के अनुभवों पर साझा किया अपना फीडबैक

रायगढ़।स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में 10 दिवसीय समर कैंप का आयोजन 30 मई को संपन्न हुआ।  पहला सत्र कहानी सुनने सुनाने और उस पर सवाल जवाब का सत्र था। पहले सत्र में व्याख्याता रमेश शर्मा द्वारा बच्चों के लिए लिखी गईं नौ में से चुनी हुईं अपनी तीन कहानियाँ मीठा जादूगर, गणित की दुनिया और नोटबुक, जिसे विशेष तौर पर स्कूल शिक्षा विभाग एससीईआरटी रायपुर द्वारा बच्चों के लिए ही  प्रकाशित किया गया है, पढ़कर सुनाई गईं। इन कहानियों को सुनाने के बाद उन्होंने बच्चों से कई सवाल जवाब किये जिनके उत्तर बच्चों की ओर से दिए गए। बच्चों के उत्तर सुनकर उपस्थित छात्र छात्राओं एवं शिक्षक शिक्षिकाओं को यह महसूस हुआ कि बच्चों ने इन कहानियों को कई डाइमेंशन से समझने की कोशिश की है और उसे अपने जीवन से जोड़कर भी देखने का प्रयास किया है। कहानी सुनाने और सुनने की इस प्रक्रिया में बच्चों ने यह स्वीकार किया कि कहानी कला संप्रेषण की एक सशक्त विधा है और  इसके माध्यम से बहुत सी बातें रोचक ढंग से सीखी जा सकती हैं। इस अवसर पर कहानी लिखने की कला पर भी बातचीत हुई। इसी क्रम में व्याख्याता रश्मि

डॉ मनीष बेरीवाल ने सीपीआर पर और पीएस खोडियार ने कला एवं जीवन कौशल के अन्तर्सम्बन्धों को लेकर बच्चों से अपनी बातें साझा करीं। चक्रधर नगर स्कूल के समर केम्प में उनके व्याख्यान हुए

चक्रधर नगर स्कूल के समर कैंप में बच्चों को डॉक्टर मनीष बेरीवाल एवं रिटायर्ड प्राचार्य पी.एस. खोडियार ने संबोधित किया    रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप के तहत 24 मई को रिटायर्ड प्राचार्य पी.एस. खोडियार एवं डॉ मनीष बेरीवाल का अतिथि वक्ता के रूप में आगमन हुआ।कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार  शराफ ने छात्र-छात्राओं से आगन्तुक अतिथियों का परिचय कराया एवम उन्हें संबोधन हेतु आमंत्रित किया।पहले क्रम पर  खोडियार सर ने  ललित कला एवं जीवन कौशल को लेकर बच्चों को संबोधित किया। अच्छी शिक्षा ग्रहण करने के साथ साथ जीवन को किस तरह आसान और सुंदर बनाया जाए , इस राह में ललित कलाओं का क्या योगदान है,  जीवन जीना भी किस तरह एक कला है , समाज में कैसे अपने लिए हम एक सम्मानित स्थान बना सकते हैं, इन प्रश्नों को लेकर उन्होंने बहुत विस्तार पूर्वक अपने अनुभवों के माध्यम से महत्वपूर्ण बातें विद्यार्थियों के बीच साझा किया। दूसरे क्रम पर समर कैंप के अतिथि डॉ मनीष बेरीवाल ने बच्चों को संबोधित किया।उन्होंने सीपीआर के संबंध में विस्तार पूर्

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सोचना

अख़्तर आज़ाद की कहानी लकड़बग्घा और तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन पर टिप्पणियाँ

जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। (हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी) -------------------------------------- हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं। दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है। मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है। शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो च