सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

'अंगूठे पर वसीयत' शोभनाथ शुक्ल के उपन्यास की समीक्षा

 

ग्रामीण समाज में नई चेतना का स्थापन

ग्रामीण समाज का जिक्र आते ही हमारे मनो मस्तिष्क में रिश्तों की सहजता और लोगों का भोलापन सहज रूप से घर करने लगता है | यह कुछ हद तक सच के करीब भी है पर शहरीकरण और बाजार की घुसपैठ ने इस समाज में भी समय के साथ विकृतियाँ उत्पन्न की हैं | कथाकार शोभनाथ शुक्ल जी का नवीनतम उपन्यास 'अंगूठे पर वसीयत' ग्रामीण समाज के भीतर पसरतीं जा रहीं अनपेक्षित विकृतियों के अनेकानेक रंगों को घटनाओं के माध्यम से चलचित्र की भांति रखता चला जाता है |ग्रामीण समाज में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर घटित होने वाली घटनाओं का विवरण कुछ इस तरह सिलसिलेवार मिलता है कि उपन्यास के साथ हम एक जिज्ञासु पाठक की हैसियत से जुड़ते हैं और फिर आगे बढ़ने लगते हैं |उपन्यास का केन्द्रीय पात्र 'रामबरन गरीब' समाज के उस आदमी का प्रतिनिधित्व करता है जो समाज में फैली विसंगतियों को लेकर चिंतातुर है| सामाजिक वर्ग भेद जैसी विसंगतियों से बाहर निकल  समाज की बेहतरी जैसी सोच रखना,  यूं तो मानवीय चेतना से संपन्न व्यक्ति का गुण है  जिसकी दुर्लभता से आज का समाज चिंतन के स्तर पर लगातार विपन्न होता जा रहा है ऐसे में 'रामबरन गरीब' जैसा चेतना संपन्न और चिन्तनशील पात्र पाठक के मन के भीतर जिज्ञासा की गति को बनाए रखने में बड़ी अहम् भूमिका निभाता है |इस उपन्यास को पढ़ते हुए महसूस होता है कि  भाषा शिल्प और  साहित्यिक लय की विरलता, कथ्य की एकरेखीय गति के बावजूद घटना प्रधान प्रसंगों की रोचकता के सहारे ही यह उपन्यास पाठक के मन के भीतर पाठकीय रूचि को अन्त तक जीवित किये रहता है.

 

ग्रामीण समाज में कुछ ऐसे पात्रों की उपस्थिति से भी यह उपन्यास हमें परिचित कराता है जिनकी करतूतों से ग्रामीण समाज की वह छवि जो हमारे मन में सदियों से बसी हुई है, उस छवि को आघात पहुंचता है | नोहरी चाचा नामक पात्र इनमें से ही एक पात्र है, जो वासना में डूबा हुआ है और  अपने स्वयं की भतीजी को हवश का शिकार बनाने पर आमादा है |कई बार सच कल्पना की तरह महसूस होता है और कोई कल्पना सच की तरह लग सकता है | नोहरी चाचा जैसे पात्रों से जुड़े प्रसंग पाठकों के मन में कुछ इसी तरह के अनुभविक प्रश्न उत्पन्न कर सकते हैं कि कोई ब्यक्ति अपनी बेटी समान भतीजी के साथ भी यह सब कुछ कैसे कर सकता है ? दरअसल यह उपन्यास ग्रामीण समाज में आये विचलन की कहानी को साफगोई से रख देने के लेखकीय दुस्साहस का एक दस्तावेज जैसा भी कुछ है जिसे पढ़ते पढ़ते हम महसूस करने लगते हैं |इसी क्रम में चौधराइन भी एक ऎसी महिला पात्र है जो देह की भूख मिटाने को सारी वर्जनाएं तोडती प्रतीत होती है | किशोरों के संग देह की भूख मिटाने की घटनाएँ ग्रामीण समाज के उसी विचलन की कथा सुनाती हैं जो अमूमन हमारे मन में कहीं नहीं है | लेखक ग्रामीण समाज की वर्तमान छवि को उसके सही रूप में इस उपन्यास के माध्यम से दिखाने की कोशिश करता है जो कि बहुत हद तक लोक मर्यादा के भय से ढंका छुपा होता है | शहरों में जिस खुलेपन को हम महसूस करते हैं उस खुलेपन को आज भी ग्रामीण समाज में अस्वीकृति मिलती है | इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि ग्रामीण समाज बुराईयों से अछूता है | ग्रामीण समाज में भी वह सारी बुराईयाँ देर सवेर घर कर चुकी हैं जिसकी कल्पना वहां की सहजता को लेकर  हम नहीं कर पाते | यह उपन्यास बाजार और राजनीति की घुसपैठ के चलते ग्रामीण समाज में पसरती जा रही तमाम बुराईयों की सूक्ष्म पड़ताल करता है | इसे हम लोक को उसके विचलन से आगाह करने के अर्थ में भी ले सकते हैं जो कि किसी कृति का बेहतर उद्देश्य हो सकता है |

परधानिन बुआ जो कि एक विधवा स्त्री है और गाँव की प्रधान है उसके जीवन में आए उतार-चढाओं के माध्यम से भी ग्रामीण समाज में स्त्री की स्थिति को जाना समझा जा सकता है | चौबे नामक पुरुष के साथ उसके प्रेम और दैहिक संबंधों की कहानी, सरपंच चुनाव पूर्व से शुरू होकर सरपंच बनने के बाद भी किस तरह पितृ सत्तात्मक समाज के तंग रास्तों से होकर गुजरने लगती है उसका एक चित्रण इस उपन्यास में मिलता है | पुरूष के लिए स्त्री  देह आकर्षक जरूर है पर स्त्री को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार करने के लिए चौबे जैसे कायर पुरूष के पसीने छूटने लगते हैं | परधानिन बुआ जैसी स्त्री के संघर्ष के माध्यम से ग्रामीण समाज में एक नयी चेतना के संचार का स्थापन संभव हो सकता है , उस संभावना को यह उपन्यास कुछ हद तक जन्म देने का एक लिखित दस्तावेज बन सकता है ऐसा हम कह सकते हैं |

आज बाजार की घुसपैठ ग्रामीण समाज में भी सघन हो चली है | बाजार जहां साधन संपन्न लोगों को प्रभावित करता है वहीं अभावग्रस्त लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है | यह उपन्यास ग्रामीण जीवन के उन जगहों की भी सैर कराता है जहां अभावग्रस्त लोग बुनियादी जरूरतों के साथ साथ बाजारू जरूरतों के आकर्षण में विकृतियों के शिकार होते चले जाते हैं |

इन तमाम पात्रों की कथाओं के संग चलते हुए यह उपन्यास अपने केंद्रीय पात्र रामबरन गरीब की कथा भी सुनाता है ।

यह कथा मनुष्य जीवन में आए भीषण संकट और रिश्तों की विकृतियों को हमारे सामने रखती है ।

रामबरन गरीब जो एक चेतना संपन्न सीधा-साधा ग्रामीण किसान है, जो समाज की सामूहिक बेहतरी का सपना देखता है और जिस में राजनीतिक चेतना के साथ साथ अन्याय का विरोध करने का भी एक मानव सुलभ गुण मौजूद है वही रामबदन अपने बेटे बलराम की चालबाजियों का शिकार होता है। बलराम रामबदन गरीब का इकलौता बेटा है और शहर में रहकर सरकारी अफ़सर है। मां-बाप की उपेक्षा करना उसकी आदत में शामिल है। वह कभी कभार मां-बाप की बीमारी के बहाने गांव आता रहता है और इस प्रतीक्षा में रहता है कि कब पिता की मृत्यु हो तो सारी संपत्ति उसके हाथ लगे । एक बार जब पिता रामबरन गरीब हस्पताल में मरणासन्न अवस्था में रहते हैं और उनकी मृत्यु जल्दी नहीं हो रही होती है तो झुंझलाकर उनसे वह जबरदस्ती वसीयत पर अंगूठे का निशान लगवाने की कोशिश करता है। बेटे के इस अमर्यादित और क्रूरता पूर्ण व्यवहार पर उसकी मां झुंझला उठती है। पति के इस अपमान पर वह बेटे पर क्रोधित होकर चीख पड़ती है। पत्नी के इस दारुण चित्कार से कोमा में पड़े रामबरन गरीब की देह भी जैसे जीवंत हो उठती है। इस घटना का असर यह होता है कि हफ्तों से कोमा में पड़े रामबरन गरीब के बदन में हलचल होती है। वे उठ बैठते हैं और चीखते हुए वसीयत छीन कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं । वे उन कागज के टुकड़ों पर थूकते हुए अपने इकलौते बेटे से कहते हैं -- 'जा आज से तू मेरे लिए मर गया। मैं तेरी इच्छा पूर्ति के लिए नहीं मरूंगा तो नहीं मरूंगा।' यह इस उपन्यास का सबसे विहंगम और द्रवित कर देने वाला दृश्य है जो समाज में दिनों दिन सघन रूप लेने लगा है |

 पत्नी जसुमति के सहारे अपने कदमों पर चलते रामबरन गरीब भाई का अस्पताल से बाहर निकलना सचमुच हैरत में डालने वाला दृश्य है जो हमें भीतर से झकझोर देता है। हमारे आसपास फैले ग्रामीण पात्रों पर केंद्रित यह उपन्यास अपनी रोचक किस्सागोई के कारण पठनीय बन पड़ा है।

यद्यपि इस उपन्यास को पढ़ते हुए किसी साहित्यिक उपन्यास में समाहित विविध कलात्मक रसों का सम्पूर्ण आनंद हमें नहीं मिल पाता, इसके बावजूद हम कह सकते हैं कि लेखक ने विभिन्न घटनाओं को अपने स्तर पर जोड़कर उसे कथा का विस्तृत रूप देने का जो अथक प्रयास किया है, वह उल्लेखनीय है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए, पाठक ग्रामीण समाज में घटित हो रहे विभिन्न रूपाकारों का, घटनाओं का आस्वादन ले सकते हैं।

 

उपन्यास: 'अंगूठे पर वसीयत'

लेखक : शोभनाथ शुक्ल

प्रकाशक : साक्षी प्रकाशन संस्थान सुल्तानपुर उ.प्र.

मूल्य : 300 रूपये सजिल्द

------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

रमेश शर्मा

92, श्रीकुंज , बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) - 496001

मो. 7722975017   

 

 

 



 

 

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

सुबह सवेरे अखबार में प्रकाशित कहानी: रेस्तरां से लौटते हुए

छुट्टी का  दिन था । वीकली ऑफ । उनके लिए छुट्टी का दिन याने मौज मस्ती का दिन। खाना पीना घूमना ।  एक ने कहा 'चौपाल जायेंगे , वहां लंच लेंगे ।'  'नहीं यार चौपाल नहीं , आज नारियल नेशन जायेंगे ।' - दूसरे ने झट से उसकी बात काटते हुए कह दिया  । दोनों की बातें सुनकर तीसरे ने हँसते हुए कहा 'तुम लोग भी न..... वही घिसी पिटी जगह ! अरे जीवन में जायका बदलने की भी सोचो , किसी नयी जगह की बात करो , ये क्या उसी जगह बार बार जाना ।'  तीसरे की बात सुनकर दोनों हक्का बक्का उसकी ओर देखने लगे थे ।उन दोनों को लगा कि यह सच बोल रहा है । पर  पहले ने बदलाव शब्द सुनकर आहें भरी और कहने लगा .... हमारे जीवन में बदलाव कहाँ है दोस्त ! वही रोज रोज का घिसा पिटा काम । सुबह हुई नहीं कि बीबी को नींद से जगाओ, टिफिन तैयार करवाने के लिए कहो। फिर बाथ रूम में जाकर हबड़ तबड़ नहाकर निकलो । कपड़े पहनो और भाग लो कम्पनी की बस पकड़ने। यार अब तो लगता है जैसे इसी रूटीन पर चलते चलते जिन्दगी के ऊपर जंग की एक परत जम गयी है । यह सब कहते कहते उसके चेहरे से नीरसता का भाव टपक पड़ा ।  दूसरा ज्यादा सोचता नहीं था । मानो...

2025-26 के इस बजट से मायूस हुए 16000 एन एच एम स्वास्थ्य संविदा कर्मचारी. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं है खास

2025-26 के इस बजट से मायूस हुए 16000 एन एच एम स्वास्थ्य संविदा कर्मचारी. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं. करोना योद्धा कर्मचारियों में भारी निराशा घोषित 27 प्रतिशत वेतन वृद्धि के लिए कई बार मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों से मुलाकत कर चुके हैं. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारी  बड़े आंदोलन की तैयारी में एन एच एम कर्मियों के आंदोलन में जाने से स्वास्थ्य व्यवस्था होगी प्रभावित “एनएचएम कर्मचारीयों को पूर्व घोषित 27 प्रतिशत वेतन-वृद्धि, सहित 18 बिंदु मांग को बजट 2025-26 में शामिल करने का था भरोसा रायपुर ।  छत्तीसगढ़ प्रदेश एन.एच.एम. कर्मचारी संघ अपने लंबित मांग को लेकर लगातार आवेदन-निवेदन-ज्ञापन देते आ रहे हैं एवं लम्बे समय से नियमितीकरण सहित 18 बिंदु को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। पिछली सरकार ने 19 जुलाई 2023 अनुपूरक बजट में एन.एच.एम. कर्मियों के वेतन में 27 प्रतिशत की राशि की बढ़ोतरी की घोषणा की थी, जो आज तक अप्राप्त हैं।उक्त संविदा कर्मचारी संघ ने लगातार विभिन्न विधायक/मंत्री सहित मुख्यमंत्री को अपना ज्ञापन दिया था, जिसका आज तक निराकरण नहीं हुआ है, जिससे कर्मचारियों म...

दिव्या विजय की कहानी: महानगर में एक रात, सरिता कुमारी की कहानी ज़मीर से गुजरने का अनुभव

■विश्वसनीयता का महासंकट और शक तथा संदेह में घिरा जीवन  कथादेश नवम्बर 2019 में प्रकाशित दिव्या विजय की एक कहानी है "महानगर में एक रात" । दिव्या विजय की इस कहानी पर संपादकीय में सुभाष पंत जी ने कुछ बातें कही हैं । वे लिखते हैं - "महानगर में एक रात इतनी आतंकित करने वाली कहानी है कि कहानी पढ़ लेने के बाद भी उसका आतंक आत्मा में अमिट स्याही से लिखा रह जाता है।  यह कहानी सोचने के लिए बाध्य करती है कि हम कैसे सभ्य संसार का निर्माण कर रहे जिसमें आधी आबादी कितने संशय भय असुरक्षा और संत्रास में जीने के लिए विवश है । कहानी की नायिका अनन्या महानगर की रात में टैक्सी में अकेले यात्रा करते हुए बेहद डरी हुई है और इस दौरान एक्सीडेंट में वह बेहोश हो जाती है। होश में आने पर वह मानसिक रूप से अत्यधिक परेशान है कि कहीं उसके साथ बेहोशी की अवस्था में कुछ गलत तो नहीं हो गया और अंत में जब वह अपनी चिंता अपने पति के साथ साझा करती है तो कहानी की एक और परत खुलती है और पुरुष मानसिकता के तार झनझनाने लगते हैं । जिस शक और संदेह से वह गुजरती रही अब उस शक और संदेह की गिरफ्त में उसका वह पति है जो उसे बहुत प्...

रघुनंदन त्रिवेदी की कहानी : हम दोनों

स्व.रघुनंदन त्रिवेदी मेरे प्रिय कथाकाराें में से एक रहे हैं ! आज 17 जनवरी उनका जन्म दिवस है।  आम जन जीवन की व्यथा और मन की बारिकियाें काे अपनी कहानियाें में मौलिक ढंग से व्यक्त करने में वे सिद्धहस्त थे। कम उम्र में उनका जाना हिंदी के पाठकों को अखरता है। बहुत पहले कथादेश में उनकी काेई कहानी पढी थी जिसकी धुंधली सी याद मन में है ! आदमी काे अपनी चीजाें से ज्यादा दूसराें की चीजें  अधिक पसंद आती हैं और आदमी का मन खिन्न हाेते रहता है ! आदमी घर बनाता है पर उसे दूसराें के घर अधिक पसंद आते हैं और अपने घर में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! आदमी शादी करता है पर किसी खूबसूरत औरत काे देखकर अपनी पत्नी में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! इस तरह की अनेक मानवीय मन की कमजाेरियाें काे बेहद संजीदा ढंग से कहानीकार पाठकाें के सामने प्रस्तुत करते हैं ! मनुष्य अपने आप से कभी संतुष्ट नहीं रहता, उसे हमेशा लगता है कि दुनियां थाेडी इधर से उधर हाेती ताे कितना अच्छा हाेता !आए दिन लाेग ऐसी मन: स्थितियाें से गुजर रहे हैं , कहानियां भी लाेगाें काे राह दिखाने का काम करती हैं अगर ठीक ढंग से उन पर हम अपना ध्यान केन्...

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी रायगढ़ - डॉ. बलदेव

अब आप नहीं हैं हमारे पास, कैसे कह दूं फूलों से चमकते  तारों में  शामिल होकर भी आप चुपके से नींद में  आते हैं  जब सोता हूँ उड़ेल देते हैं ढ़ेर सारा प्यार कुछ मेरी पसंद की  अपनी कविताएं सुनाकर लौट जाते हैं  पापा और मैं फिर पहले की तरह आपके लौटने का इंतजार करता हूँ           - बसन्त राघव  आज 6 अक्टूबर को डा. बलदेव की पुण्यतिथि है। एक लिखने पढ़ने वाले शब्द शिल्पी को, लिख पढ़ कर ही हम सघन रूप में याद कर पाते हैं। यही परंपरा है। इस तरह की परंपरा का दस्तावेजीकरण इतिहास लेखन की तरह होता है। इतिहास ही वह जीवंत दस्तावेज है जिसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वज लेखकों को जान पाती हैं। किसी महत्वपूर्ण लेखक को याद करना उन्हें जानने समझने का एक जरुरी उपक्रम भी है। डॉ बलदेव जिन्होंने यायावरी जीवन के अनुभवों से उपजीं महत्वपूर्ण कविताएं , कहानियाँ लिखीं।आलोचना कर्म जिनके लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्हीं के लिखे समाज , इतिहास और कला विमर्श से जुड़े सैकड़ों लेख , किताबों के रूप में यहां वहां लोगों के बीच आज फैले हुए हैं। विच...

गंगाधर मेहेर : ओड़िया के लीजेंड कवि gangadhar meher : odiya ke legend kavi

हम हिन्दी में पढ़ने लिखने वाले ज्यादातर लोग हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के कवियों, रचनाकारों को बहुत कम जानते हैं या यह कहूँ कि बिलकुल नहीं जानते तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।  इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ओड़िसा राज्य के संबलपुर शहर में स्थित गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर वक्ता वहां जाकर बोलने का अवसर मिला ।  2 और 3  मार्च 2019 को आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जिस शख्श के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण हुआ है वे ओड़िसा राज्य के ओड़िया भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं और उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से  ओड़िसा राज्य को देश के नक़्शे में थोड़ा और उभारा है। वहां जाते ही इस कवि को जानने समझने की आतुरता मेरे भीतर बहुत सघन होने लगी।वहां जाकर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों से , वहां के विद्यार्थियों से गंगाधर मेहेर जैसे बड़े कवि की कविताओं और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी जुटाना मेरे लिए बहुत जिज्ञासा और दिलचस्पी का बिषय रहा है। आज ओड़िया भाषा के इस लीजेंड कवि पर अपनी बात रखते हुए मुझे जो खु...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था ...