सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

'भूरी आँखें घुंघराले बाल' अनुपमा तिवाड़ी के कहानी संग्रह की समीक्षा

जिन्दगी की ठोस सच्चाइयों का जीवंत दस्तावेज◆

कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को अपनी बाहरी और भीतरी दुनियां से साक्षात्कार होने जैसा कुछ न कुछ अनुभव होना चाहिए अर्थात कहानी को पढने के पूर्व और पढने के उपरान्त मानसिक अनुभवों का जो अंतर है, उस अन्तर का इन दोनों ही दुनियाओं से ठहरकर सीधा संवाद होना चाहिए |अनुपमा तिवाड़ी की कहानियों को पढ़ने के उपरान्त उपरोक्त वर्णित इस शर्त की कसौटी पर उन्हें कसे जाने की अगर बात हो, तो मेरा खुद का अपना  अनुभव यह कहता है कि उनके संग्रह 'भूरी आँखें घुंघराले बाल' की ज्यादातर कहानियाँ हमारी भीतरी और बाहरी दुनियाओं से  भरपूर संवाद करती हैं | इन कहानियों को पढ़कर हम यूं ही आगे नहीं बढ़ जाते बल्कि एक लम्बे समय तक इन कहानियों के भीतर रंगे-घुले जिन्दगी के असल पात्रों के दुःख दर्द और उनके संघर्ष को हम करीब से महसूस करते हैं | ये कहानियाँ कहीं से भी कहानी न लगते हुए जिन्दगी की ठोस सच्चाइयों का एक जीवंत दस्तावेज लगती हैं जिसे लेखिका ने सामाजिक जिम्मेदारियों से भरे अपने यायावरी जीवन के बीच से खोज निकाला है | 

बहुत करीब से देखी परखी गयीं सामाजिक घटनाओं को लेकर जब संवेदना की आँख से कहानियाँ लिखी जाती हैं तब उन कहानियों में जीवन के दर्दनाक पहलुओं की स्वाभाविकता बची रह जाती है| यही स्वाभाविकता कहानी और पाठकों के मध्य एक सेतु की तरह है जहां से होकर ही कहानी और पाठक एक दूसरे के करीब पहुँच पाते हैं |कहानी के कथ्य की स्वाभाविकता जीवन की ठोस सच्चाइयों के करीब पहुंचकर ही अपनी अर्थवत्ता ग्रहण कर पाती है | अनुपमा की कहानियों को पढ़ते हुए कथ्य की उसी स्वाभाविकता को हम बराबर महसूस करते हैं|  कथ्य की स्वाभाविकता को महसूसने के साथ कहानी में प्रयुक्त सरलरेखीय भाषा शिल्प जैसे आज के गैर जरुरी मुद्दे दिलोदिमाग से दूर जाने लगते हैं | अनुपमा ने घटनाओं की एकरेखीय प्रस्तुति और  सरलरेखीय भाषा शिल्प का प्रयोग करते हुए भी कथ्य की गहराई के सहारे कहानियों को जिस तरह पठनीय बनाया है , यह पठनीयता ही कहानियों के साथ बची रह जाने वाली असल पूंजी है जिसे आज के समय में एक तरह से जान बूझ कर नजर अंदाज करने की कोशिशें हुई हैं |  कहानी "एक थी कविता" स्त्री जीवन से जुड़ी ऎसी कहानी है जिसे पढ़कर समाज और परिवारों के दमन की हौलनाक तस्वीरें एक ठोस सच्चाई के साथ आँखों के सामने चलचित्र की तरह आने लगती हैं | एक दमित स्त्री जिसे हर हाल में संघर्ष करना है, कभी अपने अस्तित्व के लिए तो कभी  पारिवारिक अत्याचारों के खिलाफ ! कहानी में इस स्त्री  संघर्ष को एक ब्यापक स्पेस मिला है | कहानी  की मुख्य पात्र  'कविता' जिस तरह  अपनी मुक्ति के लिए परिवार और समाज की सभी वर्जनाओं को तोड़कर बाहर निकलती है और तमाम कठिनाईयों के बाद भी अपने लिए एक स्वतन्त्र जीवन जीने का विकल्प चुनती है,ऐसे निर्णय बहुत मुश्किल प्रतीत होते हुए भी उसे चुने जाने की मांग कहानी के भीतर से उठती है जो आज के सन्दर्भ में सही भी है |अनुपमा ने जिन पात्रों को लेकर जीवन की कहानियाँ बुनी हैं वे पात्र समाज के ठुकराए हुए वंचित और दमित पात्र हैं | वंचित और दमित पात्र होते हुए अगर वह पात्र एक स्त्री हो तब उसकी कहानी दमन के कई रंगों को लिए हुए होती है | ऎसी कहानियों को खोजती हुईं अनुपमा की नजरें उन जगहों तक भी गयी हैं जिन्हें कई बार पितृ सत्ता में डूबा हुआ समाज जान बूझकर नजर अंदाज करने का आदी होता है | एक लड़की को उसकी  देह से परे देखने की दृष्टि जब समाज के पास न हो, उसे केवल एक स्त्री के रूप में ही देखे जाने की आदत सी पड़ गयी हो  तो आखिर ऐसे समाज की नजर में घर से निकली अकेली लड़की की क्या स्थिति होती है? ऐसे ही ज्वलंत हालातों की पड़ताल   "ओ लड़की तू कहाँ है" कहानी के माध्यम से अनुपमा ने की है |रेल में सफ़र कर रही एक सर्वहारा वर्ग की दमित लड़की जो रेल के दरवाजे के पास बैठी है , उसे हरेक पुरूष द्वारा यौनिक दृष्टि से देखा जाना और उसी यौनिक दृष्टि से उनकी ओर से उसे छूने की कोशिशों का घटित होना  आज हमारी आँखों के सामने आम घटना है जिसे हमारा समाज बड़ी आसानी से स्वीकार भी चुका है |ऎसी घटनाएँ अब लोगों का ध्यान नहीं खींचती, बल्कि लोग अब उसे सहज मान चुके हैं | समाज की इसी सहज स्वीकार्यता पर यह कहानी प्रहार करती हुई जायज सवाल खड़ा करती है |

एक सशक्त स्त्री कई बार कमजोर कही जाने वाली स्त्री का भी दमन कर बैठती है | फैसला कहानी में एक स्त्री द्वारा ही जब एक अन्य स्त्री सुकन्या को यह कहकर उपेक्षित किया जाता है कि गाँव की लडकियां बहुत झूठ बोलती हैं तब यह प्रसंग पाठकों के मन को कचोटने लगता है | अनुपमा की कहानियों में दमन के विविध रंगों को सामने रखने की कोशिश जिस तरह हुई है , वह उनके अनुभव संसार की प्रामाणिकता को हमारे सामने रखती है |संग्रह की कुछ कहानियाँ स्त्री मुक्ति के अनछुए  रास्तों को भी टटोलने की कोशिश करती हैं | स्त्री जीवन में पसरे हुए लोभ लालच और कपट पूर्ण व्यवहार भी स्त्री मुक्ति के मार्ग में बाधक होते हैं | "गुट्टन चाची" कहानी की पात्र गुट्टन चाची ऎसी ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती है जिनके अस्वीकार्य और असामान्य व्यवहारों से परिवार कई बार विघटन की राह पर आ जाते हैं | अनुपमा ने ऎसी कहानियों के माध्यम से एक स्त्री को सचेत एवं जागरूक करने का प्रयास किया है | आचरण की  सकारात्मकता किसी भी मनुष्य को समाज में स्वीकार्यता की ओर ले जाती है चाहे वह कोई  स्त्री ही क्यों न हो| स्त्री की  स्वीकार्यता ही तो उसकी मुक्ति का एक साधन है जिसे अनुपमा भली भांति समझती हैं और उसे इस कहानी के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं |

सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के  साथ साथ  शैक्षिक गतिविधियों के निर्वहन में संलग्नता ,कई बार किसी कथाकार को कुछ अधिक सचेत कर जाती है | अनुपमा भी उन्हीं कथाकारों में से हैं जिनकी सचेतनता उनके द्वारा चुने हुए पात्रों के दुःख दर्द के  माध्यम से सामने आती है |'टपोरी' कहानी का 'मुन्ना' , 'तारे' कहानी का 'फ़तेह सिंह' सहित 'एक मई' कहानी का 'फन्नी' , ये सभी ऐसे पात्र हैं जो हमारे आसपास सघन रूप में मौजूद हैं जिन्हें अपने जीवन संघर्ष में समाज ने बिलकुल अकेला छोड़ दिया है  | ये सभी पात्र अपने अकेलेपन में जीने को अभिशप्त हैं जिन्हें लोगों का साथ चाहिए पर यह साथ कहीं से भी उन्हें मिलता हुआ नहीं दिखता | जीतना उनके नसीब में कहीं नहीं लिखा , वे बस जीने के लिए ही जूझ रहे हैं | तारे कहानी का पात्र फ़तेह सिंह जब यह कहता है कि भीड़भाड़ वाले शहरों में भाग्य की चाबी एक बार खो जाती है तो बड़ी मुश्किल से मिलती है , तो उसका एकान्तिक संघर्ष ध्वनित होता है जिसे कोई संवेदनशील मनुष्य ही सुन सकता है | ऎसी कहानियाँ  लोक के प्रति समाप्त हो चुकी संवेदना को पुनः पुनः दोबारा अपने साथ लौटाकर लाती हैं | संवेदना का पुनर स्थापन भी कहानी का एक उद्देश्य है , इस नजरिये से अगर  देखा जाए तो ये कहानियाँ प्रेमचंद युगीन कहानियों की याद ताजा करने लगती हैं |

ऐसे अकेले और वंचित लोग जिनके भाग्य की चाबी कहीं खो गयी है, उसे खोजने में हमारी भी सामूहिक भूमिका तय हो , हम उनकी कुछ  सहायता कर सकें , इस तरह का भाव लिए इन कहानियों का कथ्य अपनी लोक उपयोगिता साबित करने में सफल दिखती है |

इस संग्रह में कुल तेरह कहानियाँ हैं | शीर्षक कहानी 'भूरी आँखें घुंघराले बाल' भी स्त्री जीवन के उतार चढ़ाव पर बुनी गयी कहानी है | इस कहानी में भी स्त्री जीवन की विभीषिकाएँ उसी रूप में मौजूद हैं जिसे कई बार हम अपने आसपास घटित होता हुआ देखते तो हैं पर देखकर भी उसे एक स्त्री की नियति मानकर चुप्पी साध लेते हैं |

अपनी कहानियों में अनुपमा समाज की ओर से बरती जाने वाली हर उस चुप्पी पर बैचैन नजर आती हैं जो स्त्री को एकान्तिक कर  हाशिये की ओर धकेलने के लिए जिम्मेदार है |

एक पुरूष के प्रेम में पड़ी और उसके द्वारा छली गयी स्त्री का दुःख असहनीय होता है |उसे महसूसने के लिए एक नाजुक सा दिल , नाजुक सा  मन चाहिए पर वह अब शायद ज्यादातर लोगों के पास नहीं |अपनों के पास भी नहीं |  उसके दुःख को महसूसने के बजाय उससे पिंड छुडाने के लिए जब उसका परिवार ही किसी बूढ़े से उसकी शादी करा दे तो उसका दुःख कई गुना बढ़ जाता है |जब वर्षों बाद किसी बच्चे में जिसकी आँखें भूरी हैं और जिसके बाल घुंघराले हैं , वह अपने उसी प्रेमी की प्रतिछवि को महसूस करती है तो पुरूष का वही छल उसके सीने को छलनी कर जाता है | स्त्री पीड़ा का यह चरम उत्कर्ष है जिसे संवेदना की आँख से ही देखा समझा जा सकता है |

'सफेदपोश' , 'किरायेदार' , 'बड़े सरकार' इत्यादि भी अनुपमा के अनुभव संसार से उपजीं कहानियाँ हैं जहां स्त्री दमन अपनी स्वाभाविकता में मौजूद है |दमन की यह स्वाभाविकता संवेदनशील पाठकों को दमन के बिरूद्ध  उद्वेलित होने को प्रोवोक भी कर सकती है, यही इन कहानियों का निकष भी है जिसे ध्यान में रखकर इन्हें एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए | अपने पहले संग्रह के साथ, अनुपमा अपने पाठकों में कथा लेखन का प्रभाव छोड़ पाने में सफल होती लगती हैं,उन्हें बधाई!

कहानी संग्रह : भूरी आँखें घुंघराले बाल, कथा लेखिका :अनुपमा तिवाड़ी ,प्रकाशक :शिवना प्रकाशन, बस स्टेंड,सीहोर (मध्यप्रदेश)मूल्य :150 रूपये

रमेश शर्मा 

92,श्रीकुंज,बोईरदादर,रायगढ़(छत्तीसगढ़)मो.9752685148, 7722975017     

  

टिप्पणियाँ

  1. यह समीक्षा हंस पत्रिका के जून 2021 अंक में प्रकाशित हुई थी। एक कहानी की किताब पर इतनी सुंदर समीक्षा पढ़ने को मिली, बहुत अच्छा लगा।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इन्हें भी पढ़ते चलें...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

'नेलकटर' उदयप्रकाश की लिखी मेरी पसंदीदा कहानी का पुनर्पाठ

उ दय प्रकाश मेरे पसंदीदा कहानी लेखकों में से हैं जिन्हें मैं सर्वाधिक पसंद करता हूँ। उनकी कई कहानियाँ मसलन 'पालगोमरा का स्कूटर' , 'वारेन हेस्टिंग्ज का सांड', 'तिरिछ' , 'रामसजीवन की प्रेम कथा' इत्यादि मेरी स्मृति में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं । हाल के दो तीन वर्षों में मैंने उनकी कहानी ' नींबू ' इंडिया टुडे साहित्य विशेषांक में पढ़ी थी जो संभवतः मेरे लिए उनकी अद्यतन कहानियों में आखरी थी । उसके बाद उनकी कोई नयी कहानी मैंने नहीं पढ़ी।वे हमारे समय के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां खूब पढ़ी जाती हैं। चाहे कहानी की अंतर्वस्तु हो, कहानी की भाषा हो, कहानी का शिल्प हो या दिल को छूने वाली एक प्रवाह मान तरलता हो, हर क्षेत्र में उदय प्रकाश ने कहानी के लिए एक नई जमीन तैयार की है। मेर लिए उनकी लिखी सर्वाधिक प्रिय कहानी 'नेलकटर' है जो मां की स्मृतियों को लेकर लिखी गयी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे कोई एक बार पढ़ ले तो भाषा और संवेदना की तरलता में वह बहता हुआ चला जाए। रिश्तों में अचिन्हित रह जाने वाली अबूझ धड़कनों को भी यह कहानी बेआवाज सुनाने लग...

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था ...

समकालीन कहानी : अनिल प्रभा कुमार की दो कहानियाँ- परदेस के पड़ोसी, इंद्रधनुष का गुम रंग ,सर्वेश सिंह की कहानी रौशनियों के प्रेत आदित्य अभिनव की कहानी "छिमा माई छिमा"

■ अनिल प्रभा कुमार की दो कहानियाँ- परदेस के पड़ोसी, इंद्रधनुष का गुम रंग अनिलप्रभा कुमार की दो कहानियों को पढ़ने का अवसर मिला।परदेश के पड़ोसी (विभोम स्वर नवम्बर दिसम्बर 2020) और इन्द्र धनुष का गुम रंग ( हंस फरवरी 2021)।।दोनों ही कहानियाँ विदेशी पृष्ठ भूमि पर लिखी गयी कहानियाँ हैं पर दोनों में समानता यह है कि ये मानवीय संवेदनाओं के महीन रेशों से बुनी गयी ऎसी कहानियाँ हैं जिसे पढ़ते हुए भीतर से मन भींगने लगता है । हमारे मन में बहुत से पूर्वाग्रह इस तरह बसा दिए गए होते हैं कि हम कई बार मनुष्य के  रंग, जाति या धर्म को लेकर ऎसी धारणा बना लेते हैं जो मानवीय रिश्तों के स्थापन में बड़ी बाधा बन कर उभरती है । जब धारणाएं टूटती हैं तो मन में बसे पूर्वाग्रह भी टूटते हैं पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इन्द्र धनुष का गुम रंग एक ऎसी ही कहानी है जो अमेरिका जैसे विकसित देश में अश्वेतों को लेकर फैले दुष्प्रचार के भ्रम को तोडती है।अजय और अमिता जैसे भारतीय दंपत्ति जो नौकरी के सिलसिले में अमेरिका की अश्वेत बस्ती में रह रहे हैं, उनके जीवन अनुभवों के माध्यम से अश्वेतों के प्रति फैली गलत धारणाओं को यह कहान...

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला वागर्थ के फरवरी 2024 अंक में है। कहानी विभिन्न स्तरों पर जाति धर्म सम्प्रदाय जैसे ज्वलन्त मुद्दों को लेकर सामने आती है।  पालतू कुत्ते झब्बू के बहाने एक नास्टेल्जिक आदमी के भीतर सामाजिक रूढ़ियों की जड़ता और दम्भ उफान पर होते हैं,उसका चित्रण जिस तरह कहानी में आता है वह ध्यान खींचता है। दरअसल मनुष्य के इसी दम्भ और अहंकार को उदघाटित करने की ओर यह कहानी गतिमान होती हुई प्रतीत होती है। पालतू पेट्स झब्बू और पुत्र सोनू के जीवन में घटित प्रेम और शारीरिक जरूरतों से जुड़ी घटनाओं की तुलना के बहाने कहानी एक बड़े सामाजिक विमर्श की ओर आगे बढ़ती है। पेट्स झब्बू के जीवन से जुड़ी घटनाओं के उपरांत जब अपने पुत्र सोनू के जीवन से जुड़े प्रेम प्रसंग की घटना उसकी आँखों के सामने घटित होते हैं तब उसके भीतर की सामाजिक जड़ता एवं दम्भ भरभरा कर बिखर जाते हैं। जाति, समाज, धर्म जैसे मुद्दे आदमी को झूठे दम्भ से जकड़े रहते हैं। इनकी बंधी बंधाई दीवारों को जो लांघता है वह समाज की नज़र में दोगला होने लगता है। जाति धर्म की रूढ़ियों में जकड़ा समाज मनुष्य को दम्भी और अहंकारी भी बनाता है। कहानी इन दीवा...

2025-26 के इस बजट से मायूस हुए 16000 एन एच एम स्वास्थ्य संविदा कर्मचारी. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं है खास

2025-26 के इस बजट से मायूस हुए 16000 एन एच एम स्वास्थ्य संविदा कर्मचारी. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं. करोना योद्धा कर्मचारियों में भारी निराशा घोषित 27 प्रतिशत वेतन वृद्धि के लिए कई बार मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों से मुलाकत कर चुके हैं. छत्तीसगढ़ एन.एच.एम. कर्मचारी  बड़े आंदोलन की तैयारी में एन एच एम कर्मियों के आंदोलन में जाने से स्वास्थ्य व्यवस्था होगी प्रभावित “एनएचएम कर्मचारीयों को पूर्व घोषित 27 प्रतिशत वेतन-वृद्धि, सहित 18 बिंदु मांग को बजट 2025-26 में शामिल करने का था भरोसा रायपुर ।  छत्तीसगढ़ प्रदेश एन.एच.एम. कर्मचारी संघ अपने लंबित मांग को लेकर लगातार आवेदन-निवेदन-ज्ञापन देते आ रहे हैं एवं लम्बे समय से नियमितीकरण सहित 18 बिंदु को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। पिछली सरकार ने 19 जुलाई 2023 अनुपूरक बजट में एन.एच.एम. कर्मियों के वेतन में 27 प्रतिशत की राशि की बढ़ोतरी की घोषणा की थी, जो आज तक अप्राप्त हैं।उक्त संविदा कर्मचारी संघ ने लगातार विभिन्न विधायक/मंत्री सहित मुख्यमंत्री को अपना ज्ञापन दिया था, जिसका आज तक निराकरण नहीं हुआ है, जिससे कर्मचारियों म...

कबरा पहाड़ के शैलाश्रय जिन्हें देखकर मनुष्य और पुरातन सभ्यता के अंतरसंबंधों को आज भी किसी न किसी रूप में यहाँ आकर हम महसूस करते हैं

कबरा पहाड़ को मैं बचपन से देखते आ रहा हूँ क्योंकि हमारे गाँव जुर्डा से लगे गजमार पहाड़ी श्रृंखला का यह एक अभिन्न हिस्सा है । मैं लगभग 8  से 10 साल का रहा हूंगा जब एक नेपाली बाबा यहां पहाड़ की तलहटी पर झोपड़ी बनाकर रहते थे। लोगों को जब पता चला तो गांव के गांव उठकर उनके दर्शन के लिए चल पड़ते थे ।उनमें मैं भी एक था जो वहां चलकर गया था।  'कबरा' शब्द छत्तीसगढ़ी का शब्द है, जिसे हिन्दी अर्थ में धब्बेदार शब्द से हम जोड़ सकते हैं। यह मझोले और छोटे ऊँचाई के सघन वृक्षों और झाड़ियों से ढंका बलुआ पत्थरों का विस्तृत पहाड़ है । यह पहाड़ वनस्पतियों के हरे-भरे केनवास में जगह-जगह उभरे बलुआ चट्टानों की वजह से दूर से देखने पर हमारी आँखों में धब्बेदार दिखाई देता है। संभवतः पहाड़ का यह नाम इसी वजह से ही कबरा पड़ा होगा । यद्यपि हमारे गाँव के पुराने लोग इसे आज भी ‘गजमार पहाड़’ के नाम से ही पुकारते हैं । कबरा पहाड़ उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व में धनुषाकार में फैला हुआ है। इसका उत्तर-पश्चिमी छोर रायगढ़ के पहाड़ मंदिर से ही आरंभ हो जाता है । रायगढ़ शहर के पूर्वी क्षेत्र में इसी गजमार पहाड़ी श्रृंखला के ऊपर पहाड़ मंदिर स...

गंगाधर मेहेर : ओड़िया के लीजेंड कवि gangadhar meher : odiya ke legend kavi

हम हिन्दी में पढ़ने लिखने वाले ज्यादातर लोग हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के कवियों, रचनाकारों को बहुत कम जानते हैं या यह कहूँ कि बिलकुल नहीं जानते तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।  इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ओड़िसा राज्य के संबलपुर शहर में स्थित गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर वक्ता वहां जाकर बोलने का अवसर मिला ।  2 और 3  मार्च 2019 को आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जिस शख्श के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण हुआ है वे ओड़िसा राज्य के ओड़िया भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं और उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से  ओड़िसा राज्य को देश के नक़्शे में थोड़ा और उभारा है। वहां जाते ही इस कवि को जानने समझने की आतुरता मेरे भीतर बहुत सघन होने लगी।वहां जाकर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों से , वहां के विद्यार्थियों से गंगाधर मेहेर जैसे बड़े कवि की कविताओं और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी जुटाना मेरे लिए बहुत जिज्ञासा और दिलचस्पी का बिषय रहा है। आज ओड़िया भाषा के इस लीजेंड कवि पर अपनी बात रखते हुए मुझे जो खु...

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी रायगढ़ - डॉ. बलदेव

अब आप नहीं हैं हमारे पास, कैसे कह दूं फूलों से चमकते  तारों में  शामिल होकर भी आप चुपके से नींद में  आते हैं  जब सोता हूँ उड़ेल देते हैं ढ़ेर सारा प्यार कुछ मेरी पसंद की  अपनी कविताएं सुनाकर लौट जाते हैं  पापा और मैं फिर पहले की तरह आपके लौटने का इंतजार करता हूँ           - बसन्त राघव  आज 6 अक्टूबर को डा. बलदेव की पुण्यतिथि है। एक लिखने पढ़ने वाले शब्द शिल्पी को, लिख पढ़ कर ही हम सघन रूप में याद कर पाते हैं। यही परंपरा है। इस तरह की परंपरा का दस्तावेजीकरण इतिहास लेखन की तरह होता है। इतिहास ही वह जीवंत दस्तावेज है जिसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वज लेखकों को जान पाती हैं। किसी महत्वपूर्ण लेखक को याद करना उन्हें जानने समझने का एक जरुरी उपक्रम भी है। डॉ बलदेव जिन्होंने यायावरी जीवन के अनुभवों से उपजीं महत्वपूर्ण कविताएं , कहानियाँ लिखीं।आलोचना कर्म जिनके लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्हीं के लिखे समाज , इतिहास और कला विमर्श से जुड़े सैकड़ों लेख , किताबों के रूप में यहां वहां लोगों के बीच आज फैले हुए हैं। विच...