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विष्णु खरे की पुण्य तिथि पर उनकी कविता "जो मार खा रोईं नहीं" का पुनर्पाठ

विष्णु खरे जी की यह कविता सालों पहले उनके कविता संग्रह से पढ़ी थी। अच्छी  कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं तो भीतर भी उतर जाती हैं। उनमें से यह भी एक है। कविता के भीतर पसरे भाव को पिता के नज़रिए से देखूं या मासूम बेटियों के नज़रिए से,दोनों ही दिशाओं से चलकर आता प्रेम एक उम्मीद  जगाता है।अपने मासूम बेटियों को डांटते ,पीटते हुए पिता पर मन में आक्रोश उत्पन्न नहीं होता। उस अजन्मे आक्रोश को बेटियों के चेहरों पर जन्मे भाव जन्म लेने से पहले ही रोक देते हैं। प्रेम और करुणा से भरी इस सहज सी कविता में मानवीय चिंता का एक नैसर्गिक भाव उभरकर आता है।कोई सहज कविता जब मन को असहज करने लगती है तो समझिए कि वही बड़ी कविता है। 


आज पुण्य तिथि पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि !


जो मार खा रोईं नहीं 

【विष्णु खरे】

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तिलक मार्ग थाने के सामने

जो बिजली का एक बड़ा बक्‍स है

उसके पीछे नाली पर बनी झुग्‍गी का वाक़या है यह


चालीस के क़रीब उम्र का बाप

सूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी

अपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआ

नाराज़ हो रहा था अपनी

पांच साल और सवा साल की बेटियों पर

जो चुपचाप उसकी तरफ़ ऊपर देख रही थीं


ग़ुस्‍सा बढ़ता गया बाप का

पता नहीं क्‍या हो गया था बच्चियों से

कुत्‍ता खाना ले गया था

दूध दाल आटा चीनी तेल केरोसीन में से

क्‍या घर में था जो बगर गया था

या एक या दोनों सड़क पर मरते-मरते बची थीं

जो भी रहा हो तीन बेंतें लगी बड़ी वाली को पीठ पर

और दो पड़ीं छोटी को ठीक सर पर

जिस पर मुंडन के बाद छोटे भूरे बाल आ रहे थे


बिलबिलाई नहीं बेटियां एकटक देखती रहीं बाप को तब भी

जो अंदर जाने के लिए धमका कर चला गया

उसका कहा मानने से पहले

बेटियों ने देखा उसे

प्‍यार करुणा और उम्‍मीद से

जब तक वह मोड़ पर ओझल नहीं हो गया !

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🙏💐 रमेश शर्मा

टिप्पणियाँ

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