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"वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम": अपने समय और परिवेश को अभिव्यक्त करती कविताएं - डॉ. नीलोत्पल रमेश , Ve khoj rahe the apne hisse ka prem :Poetry book of Ramesh sharma

"वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम" कवि कथाकार रमेश शर्मा का पहला कविता संग्रह है। इनके अब तक तीन कहानी संग्रह भी  प्रकाशित हो चुके हैं, पहला 'मुक्ति' ( 2013 ई.), दूसरा 'एक मरती हुई आवाज' ( 2019 ई.) और तीसरा "उस घर की आंखों से"(2021ई.)।  इस संग्रह में रमेश शर्मा की 64 कविताएं संकलित हैं । ये  कविताएं देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं।कवि ने  इन कविताओं में अपने समय को ही अभिव्यक्त करने की कोशिश की है। कवि जिस परिवेश और समय में रह रहा है उसे ही इन कविताओं में अभिव्यक्ति मिली है। कवि को इसमें कहीं से हड़बड़ी नहीं दिखाई पड़ती है, वह आराम से दुनिया की चकाचौंध से बेखबर अपनी कविताओं में लीन है। ये कविताएं हमारे आसपास और नजरों के सामने घटित होती दिख रही हैं। रमेश शर्मा ने वर्तमान दौर के सारे विषयों को अपनी कविताओं का माध्यम बनाया है, जिसमें शहर, गांव, मित्र, प्रेम, पिता, किसान, माँ, पहाड़, प्रेमिका, लड़कियां आदि सबकुछ समाहित हैं । इन्हीं चीजों के संयोग से कवि की कविताएं निर्मित हुई हैं।  'वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम' कविता के माध्यम से रमेश शर्मा ने अपने प्रेम के बहाने अपने अस्तित्व को ही खोजने की कोशिश की है। इस धरती पर गुमी हुई वस्तुओं की लंबी लिस्ट है जिसे खोजने की आवश्यकता है। 

अगर इन्हें खोजा नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं कि आदमी का अस्तित्व ही ना रहे, फिर तो आदमी पुतला बनकर ही रह जाएगा। उसकी धरती, उसके सपने, उसका प्रेम,सब कुछ खत्म हो जाएगा, इसलिए कवि ने अपने प्रेम के बहाने इन्हें खोजने की कोशिश की है।वह कहता है- 

वे खोज रहे थे 

उस धरती को 

जो कभी उनकी थी 

उस उजाले को 

जो कभी उनका था 

उस प्रेम को 

जिस में डूब कर वे जीते आ रहे थे अब तक! 


उनके हिस्से में 

कुछ भी तो नहीं था अपना कहने को 

जैसे सब कुछ गुम हो चुका था इसी धरती पर कहीं 

जैसे सब कुछ अपहृत कर लिया था किसी ने !


'क्या किसी दिन ऐसा होगा' कविता के माध्यम से कवि ने समय की गति के साथ सब कुछ बदलते हुए देखा है और अपने पुराने दिनों के लौट आने की उम्मीद किए हुए हैं, ताकि समाज में बदलते परिवेश से निजात पाया जा सके । बहुत ही तेजी से हमारे समाज में दंगे, हत्याएं और बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हुआ है जिसके चलते कवि अपने पुराने दिनों को वापस लाने की वकालत करता है, यहां तक कि स्कूल के दिनों में लौट जाना चाहता है ताकि दुनिया का एक नया भूगोल निर्मित हो सके। कवि ने इसे इस तरह से व्यक्त किया है- 


फिर भी सोचता हूं किसी दिन ऐसा हो जाए शायद 

और दुनिया का एक नया भूगोल आकार लेने लगे 

तो कितना अच्छा हो 

कि किसी दिन हम फिर से मिलें

और मेरे घर का रास्ता तुम्हारे घर के रास्ते से होकर गुजरे

कितना अच्छा हो कि हम सुबह-सुबह उठें

और वह दिन हम सबकी देहरी में हमारा इन्तजार करता हुआ मिले!

             कवि कथाकार समीक्षक डॉ. नीलोत्पल रमेश

माँ कविता के माध्यम से कवि ने किसी भी घर में माँ की अहमियत को सिद्ध करने की कोशिश की है। माँ के होने मात्र से घर में खुशियां छाई रहती हैं। उसके चले जाने के बाद एक ही घर में कई-कई घर बन जाते हैं। भाई-भाई आपस में बात नहीं करते हैं, मानो एक रिश्ते की डोर को संभालने वाली माँ का नहीं रहना बहुत कुछ कर जाता है। माँ के होने मात्र से कई-कई रास्ते स्वयं खुलते चले जाते थे। कवि ने माँ के जाने के बाद की स्थितियों का इस प्रकार वर्णन किया है- 

उसका जाना 

बंद हो जाना था उन रास्तों का भी 

घर के भीतर कई-कई घरों का बन जाना था 

असमय इस घर से इस तरह उसका हमें छोड़ कर जाना ! 


हिस्सा कविता के माध्यम से कवि ने झूठ और फरेब की मायावी दुनिया निर्मित करने वालों के असली चेहरे को उजागर करने की कोशिश की है। हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो देश को अशांत करने की कोशिश कर रहे हैं | वर्षों से अमन चैन की जिंदगी बसर करने वालों के दिलों में दरार डाल रहे हैं । उन्हें झूठ और फरेब के सहारे राष्ट्र से बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं । वे अपने चेहरे पर नकली राष्ट्रवाद का नकाब पहने घूम रहे हैं । कवि ने इसे इस तरह अभिव्यक्त किया है- 


बहस भी ऐसी कि शक्लो सूरत से परे 

न ही कोई ओर छोर  

फिर भी एक शक्ल गढ़ी जाती है 

गढ़ी जाती है एक मूरत 

झूठ और फरेब हाथ-पांव बन जाते जिसके 

और चेहरे पर चढ़ा दी जाती आहिस्ता 

नकली राष्ट्रवादी नक़ाब 

जो लोगों को रह रहकर लगाती डराने ! 


चिट्ठियां कविता के माध्यम से कवि ने चिट्ठियों की अहमियत को बताया है। चिट्टियां रिश्तों  को बचाए रखने में सक्षम थीं | इसमें लोग अपने रिश्ते को साफ साफ महसूस करते थे, लेकिन अब चिठ्ठियों की जगह मोबाइल के मैसेज ने ले लिया है। जिस तरह से हम मोबाइल पर मैसेज लिखते और डिलीट करते हैं, उसी तरह से हम अपने रिश्तो को भी डिलीट करते जा रहे हैं| चिट्टियां अब धरोहर हो गई हैं। आने वाले बच्चे इसके बारे में सिर्फ पढेंगे और उसे जानने की कोशिश करेंगे। कवि ने इसे इस प्रकार लिखा है- 

जबकि चिट्ठी लिखना तो दूर 

ठीक-ठीक यह भी नहीं पता अब तो 

कि किस युग में लिखी जाती रही होंगी चिट्टियां 

तब यह समझाना और भी कठिन 

कि चिट्टियां रिश्तों की विरासत हुआ करती थीं  

जहां हाथ से लिखे अक्षरों में 

रिश्तों की धडकनें साफ-साफ सुनी जा सकती थीं ! 


बाजार कविता के माध्यम से कवि ने बाजार की गिरफ्त में फंसती दुनिया की विवशता को दिखाया है। यह बाजार, हमारे आसपास की बात कौन कहे, हमारे घरों में घुस गया है| हम पूरी तरह से बाजारवाद की गिरफ्त में जकड़ते चले जा रहे हैं| चाहकर भी हम इससे बाहर नहीं निकल सकते । हमारी कई इच्छाएं जन्म लेती हैं और मर जाती हैं, लेकिन बाजार उन्हें जिंदा कर देता है। उसे पूरी तरह से मनुष्य की इच्छाओं का पता है। इन्हीं इच्छाओं के बल पर बाजार ने पूरी दुनिया को अपने चंगुल में फंसा लिया है| कवि ने लिखा है- 


जाना यह भी 

कि कई इच्छाएं तो जन्म लेती हैं और मर भी जाती हैं अचानक 

पर चारों तरफ फैला बाजार 

उन्हें फिर से जिंदा करने की जुगत में लगा रहता है निरंतर 

लगा रहता है इस बात को हवा देने में 

कि अनंत हैं मनुष्य की इच्छाएं 

क्योंकि बाजार को पता है 

इच्छाओं के बिना उसका धंधा नहीं चलता ! 


'बचाने आ रहे हैं हत्यारे' कविता के माध्यम से कवि ने उस आभासी दुनिया का जिक्र किया है जिसमें लोगों की सोच ही बदल गई है। इस बदलती सोच के कारण ही लोगों को, अनपढ़ पढ़े लिखे और हत्यारे रक्षक लगने लगे हैं ।अब ऐसे ही माहौल में लोग जीने को अभिशप्त होते जा रहे हैं।  कवि ने लिखा है- 

आपको खुश होता देख 

मिटने लगे हैं भेद  

अनपढ़ पढ़े-लिखे लगने लगे हैं 

और हत्यारे लगने लगे हैं रक्षक !


'प्रेम करने वाली लड़की' कविता के माध्यम से कवि ने उस लड़की का जिक्र किया है जो प्रेम करती थी और प्रेम के बदले नियति जो देती आ रही थी सजा, उसी के बदले उसे मिली थी मौत! मानो प्रेम करने की सजा समाज ने मुकर्रर कर दी हो । उसे उसके नाम से लोग नहीं जानते थे, जानते थे तो सिर्फ प्रेम करने वाली लड़की के नाम से। जो अब घर की दीवारों पर टंगी तस्वीरों में ही रह गई है।कवि को अफसोस है कि वह अपने नाम से कभी नहीं पुकारी गई। इसे कवि ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है- 

वह बेनाम नहीं थी पर उस दिन हो गई बेनाम 

जब उतरकर लोगों की जुबान से 

चली गई चुपचाप अपनी दुनिया में 

जहां जाते हैं प्रेम करने वाले 

टंगी हैं तस्वीरें अब भी घर में 

पर अरसा हो गया 

कि तस्वीरों वाली लड़की के नाम से पुकारी गई हो कभी !

'काम वाली केतकी बाई' कविता के माध्यम से कवि ने काम करने वाली केतकी के श्रम और जीवटता का वर्णन किया है| केतकी बाई का दिन कैसे गुजर जाता है उसे स्वयं भी पता नहीं चलता | अपने घर की गाड़ी ठीक तरह से चले, इसके लिए वह सुबह से शाम तक दूसरों के घरों में ही काम करती रहती है, फिर भी वह लोगों की निगाह में अपनी पुख्ता जगह नहीं बना पाती है| कवि ने इसे  इस प्रकार अभिव्यक्त किया है- 


केतकी बाई ! 

जीवन की धरती पर गहरे धंसी हैं तुम्हारी जड़ें फिर भी 

समय के आईने में ठूँठ सी लगती हो क्यों? 

जबकि तुम्हें तो मॉडल नहीं 

रोल मॉडल होना चाहिए हमारे समय का ! 

'कबरा पहाड़' कविता के माध्यम से कवि ने रायगढ़ (छत्तीसगढ़) के निकट स्थित प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्रों से समृद्ध पुरातात्विक धरोहर को बचाने की अपील की है। यह धरोहर देख-रेख के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होने के कगार पर पहुंच गया है। इससे जुड़ी हुई हैं कई यादें| इसकी पीठ पर उकेरे गए चित्र मनुष्य के हजारों वर्ष पूर्व मौजूद होने के प्रमाण हैं । कवि ने इसे इस प्रकार लिखा है- 

जिन्होंने फेरा था उसकी पीठ पर हाथ 

और हजारों वर्ष पूर्व अपनी कलाओं से 

दिया था मनुष्य होने का सबूत 

कोई मोल उनका नहीं रहा अब जैसे 

मानो लौट आया हो कोई बर्बर युग फिर से 

सभ्यताओं का संहार करने के लिए ! 


पलायन कविता के माध्यम से कवि ने मजदूरों के पलायन की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है । ये मजदूर अपनी जड़ों को छोड़कर रोजी-रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों में चले जाते हैं, जहां रात-दिन मेहनत करते हैं । इनकी मेहनत की बदौलत वहां के लोग मालामाल होते जा रहे हैं ।कवि ने इसे इस तरह से लिखा है- 


ढोते हुए सवालों को साथ-साथ 

उतरते हैं वे इलाहाबाद और गाजीपुर की ईंट भट्टियों में 

और बदल जाते हैं दो टांगें और दो हाथ वाले आदमी में अचानक 

झोंक कर उन्हें 

जहां खड़ी की जाती हैं अर्थ की ऊंची मीनारें !


'वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम' कविता संग्रह के माध्यम से कवि रमेश शर्मा ने मनुष्यों के भीतर प्रेम के गायब होते चले जाने की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है, जिसे आज बचाने की जरूरत है । प्रेम के सहारे ही इस दुनिया को रंगीन बनाया जा सकता है।प्रेम है तो सब कुछ है, नहीं है तो पूरी दुनिया निरर्थक है। इस संग्रह की कविताएं बहुत पठनीय हैं ।



कविता संग्रह - वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम

कवि - रमेश शर्मा

प्रकाशक- अधिकरण प्रकाशन नई दिल्ली-110094

मूल्य 150 रूपये, पृष्ठ-128, प्रकाशन वर्ष-2019 


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डॉ.  नीलोत्पल रमेश  की कविताएं , कहानियां एवं समीक्षाएं हंस ,  पाखी  , शिवना साहित्यिकी, गगनांचल, सुसम्भाव्य इत्यादि प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी यह समीक्षा छत्तीसगढ़ मित्र पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।

'कसौटी के दायरे में' उनकी समीक्षाओं की किताब है । इसके अलावा कथावृत्त, कसौटी पर कविताएं,बारूद की फसलें उनकी चर्चित किताबें हैं।

संपर्क : पुराना शिव मंदिर , बुध बाजार , गिद्दी -ए , जिला - हजारीबाग - 829108  ( झारखंड ) मो. 9931117537, 

8709791120

ईमेल - neelotpalramesh@gmail.com  

टिप्पणियाँ

  1. रमेश शर्मा जी की कविताएं अपने समय को रेखांकित करती है। मानवीय मूल्यों के पक्षधर उनकी कविताएं इतनी सरल-सहज, बोधगम्य एवं सम्प्रेषित हैं कि अलग से व्याख्या करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती। रमेश शर्मा की कविताओं में बिम्बों की दूरुहता और कृत्रिमता कहीं नहीं है। सार्थक सुंदर समीक्षा के लिए डाँ. निलोत्पल रेमश जी को हार्दिक बधाईयां।

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  2. एक प्रतिभाशाली कवि की कविताओं पर डॉ.नीलोत्पल रमेश जी की यह समीक्षा बहुत अच्छी लगी। इस समीक्षा से कविताओं को समझने बूझने में आसानी हुई खासकर शीर्षक कविता 'वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम' को। बधाई हमारी।

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    1. इस प्रेरक टिप्पणी के लिए चेतन विश्वकीर्ति जी आपका हार्दिक शुक्रिया।

      हटाएं

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समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सोचना

अख़्तर आज़ाद की कहानी लकड़बग्घा और तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन पर टिप्पणियाँ

जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। (हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी) -------------------------------------- हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं। दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है। मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है। शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो च