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नीरज वर्मा की कहानी : हे राम

नीरज वर्मा की कहानियाँ किस्सागोई से भरपूर होती हैं । साथ साथ उनकी कहानियाँ राजनैतिक संदर्भों को छूती हुईं हमें एक तरह से विचारों की दुनिया में घसीटकर भी ले जाने की कोशिश करती हैं। कहानी 'हे राम' इस बात को स्थापित करती है कि राजनीति मनुष्य को विचारवान होने से हमेशा रोकती है क्योंकि विचारवान मनुष्य के बीच राजनीति के दांव पेच फेल होने लगते हैं । नीरज वर्मा अपनी इस कहानी में गांधी को केंद्र में रखकर घटनाओं को बुनते हैं तब ऐसा करते हुए वे हमें उसी विचारों की दुनिया में ले जाने की कोशिश करते हैं।गांधी को केंद्र में रखकर लिखी गयी यह कहानी 'हे राम' देश के वर्तमान हालातों पर भी एक नज़र फेरती हुई आगे बढ़ती है । बतौर पाठक कहानी के पात्रों के माध्यम से इस बात को गहराई में जाकर महसूस किया जा सकता है कि गांधी हमारे भीतर वैचारिक रूप में हमेशा जीवित हैं । जब भी अपनी आँखों के सामने कोई अनर्गल या दुखद घटना घटित होती है तब हमारी जुबान से अनायास ही "हे राम" शब्द  निकल पड़ते हैं । इस कहानी में नीरज यह बताने की कोशिश करते हैं कि गांधी का हमारे जीवन में इस रूप में अनायास लौटना ही उनकी वैचारिक अमरता का द्योतक है । लाख कोशिशों के बावजूद भी उन्हें मनुष्यता की दुनिया से अलगाया नहीं जा सकता । कहानी साधारण बातचीत से आगे बढ़ती है इसलिए पाठकों को कई जगह ऐसा लग सकता है कि इसकी गति बहुत धीमी है, पर कई बार कहानी के कंटेंट तक पहुँचने के लिए धीरज के साथ उसे पढ़ना भी होता है, तब कहीं जाकर कहानी की अर्थवत्ता तक हम पहुँच पाते हैं ।     


हे राम 

एलिस के भीतरी आसमान में चिंता के बगुले पंख फैलाए बेतहाशा उड़ान भर रहे थे। वह खुद को कभी इतना असहाय नहीं पाया था,जितना आज महसूस कर रहा था। क्योंकि बापू की अध्यक्षता में इंडियन कांउसिल ऑफ कांग्रेस कोर कमेटी के सदस्य जंतर-मंतर में अनशन करने वाले थे। बापू ने सरकार के समक्ष पी.सी.बी के साथ बंद पड़े द्विपक्षीय क्रिकेट स्पर्धा को पुनः आरंभ करने हेतु दबाव बनाने का निर्णय लिया था। उनकी मान्यता थी कि, खेल राष्ट्रीय संबंधों  को मजबूत करता है। लेकिन एक बड़ा राष्ट्रवादी धड़ा इसके विरोध में रैली करने का मन बना रहा था। वैसे भी पुलवामा अटैक के विरोध में देश भर में पाकिस्तान को लेकर हवा गर्म थी। कुछ समाजसेवी संगठन मानव श्रृंखला बना कर बापू के इस फैसले का विरोध कर रहे थे। पर गांधी अपने निर्णय पर अड़े हुए थे। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार कांग्रेस कोर कमेटी को अनशन करने की अनुमति देने के पक्ष में नहीं दिख रही थी। विरोध करने वालों की नज़र में गांधी देश विभाजक थे। मीडिया सेल के लोग भी वाट्सएप ग्रुप में गांधी को ले कर तरह-तरह के मीम फारवर्ड कर रहे थे। एलिस बर्तन धोते हुए चिल्लाया था.....‘‘बापू आप समझते क्यों नहीं सांप्रदायिक ताकतें आपकी हत्या कर देंगी।’’ 

    ‘‘इसमें समझने वाली कौन सी बात है। मैं कांउसिल के मेंमरान को अपने साथ अनशन करने हेतु  बाध्य तो कर नहीं रहा हूं। तुम तो जानते ही हो मेरी आस्था स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में है। रही बात पाकिस्तान से सामरिक रिश्ते की तो हमे यह समझना होगा पाकिस्तान आज भले दूसरा देश है लेकिन यह मत भूलो वह भारत का अभिन्न अंग रहा है। यह तो लार्ड माउंटबेटन की सोची समझी चाल थी, वो जिन्ना की महत्वाकांक्षा और उनके स्वास्थ्य का भली-भांति अध्ययन कर के आया था। उसे पता था कि, पाकिस्तान विभाजन का यदि कोई नेतृत्व कर सकता है, तो वह जिन्ना ही कर सकता है। वह यह भी जानता था कि जिन्ना को कैंसर है। इस लिए आनन-फानन में उसने देश का विभाजन कर दिया। क्योंकि  जिन्ना के बाद ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं दिख रहा था जो भारत के टुकड़े करवा सके। माउंटबेटन की मंशा भारत को खंडित करने की थी, और उसने वही किया। अगर नेहरु और पटेल न होते तो तुम जिस जगह पर बैठे हो शायद वह कोई और देश होता...’’गांधी ने गहरा निःश्वास छोड़ा था। ‘‘यदि एशिया में शांति बनाए रखना है तो भारत और पाकिस्तान के रिश्ते को मजबूत करना होगा। मुझे लगता है खेल इसके लिए सबसे उपयुक्त माध्यम हो सकता है।’’ 

     ‘‘एलिस तुम मेरे लिए दिल्ली की हवाई टिकट बुक कराओ लेकिन ध्यान रहे टिकट इकॉनोमी क्लास की हो। और काउंटर से बुक कराई गई हो। क्योंकि अनावश्यक तकनीक के उपयोग का मैं विरोध करता हूं। इससे भयंकर बेरोजगारी बढ़ने का खतरा है। वैसे एलिस एक बात का मुझे गहरा दुःख है, तुम्हे आई.ए.एस. की नौकरी छोड़ कर मुझ बूढ़े के पास नहीं आना था।’’

     अस्थियों के पिंजर शेष में लगभग तार-तार हो चली धोती को लपेटते हुए बापू झटके से आगे बढ़े ही थे कि, अस्थमा के दौरे वाली ,  ढुस-ढूसी वाली खांसी उखड़ी थी। खांसी का वेग ज्यादा होने की वजह से बापू वहीं चारपाई पकड़ कर थोड़ा निढाल से हो गए थे।

  ‘‘ फॉर गॉड सेक अब आपसे नहीं हो पाएगा बापू , आप रहने दीजिए, आपको आपके राम का वास्ता।’’

  ‘‘मेरे प्यारे एलिस मैंने तुम्हे बार-बार समझाया है,तुम मेरे शरीर से प्यार करना छोड़ दो। तुम इस बूढ़े शरीर को लेकर जितना सोचोगे तुम्हे उतना ही कष्ट होगा। तुम ही कहो मैंने अपने शरीर से ऐसा क्या किया है जिस पर तनिक भी गर्व किया जा सके। मुझे कोई पर्वतारोहण तो करना नहीं है। यहां से हवाई अड्डा तक जाना है, वह भी पैदल नहीं जाना है, कोई न कोई व्हीलचेयर पर बैठा कर ही ले जाएगा। हां मैं मानता हूं मुझ पर तुम्हारा अतिरिक्त श्रम लगता है,उसके लिए मैं शर्मिंदा हूं। एक बात और कहूं एलिस, लोग मुझे वृथा ही महात्मा कहते हैं, यदि तुम देखो तो मैंने ऐसा कोई काम ही नहीं किया है जो नया हो। मेरे द्वारा किए गए सारे प्रयोग सनातन काल से चले आ रहे हैं।’’  

 ‘‘बापू वाक्पटुता में आपसे कौन जीता है, जो मैं कुछ बोल सकूंगा।’’ आँखों की कोर से लुढ़क आए बूंद को पोंछता हुआ एलिस मुस्कुराया था। ‘‘मैंने आपसे कितनी दफा कहा है, आपकी देह कमजोर हो गई है, मांस मच्छी तो आप खाते नहीं , कम से कम गाय का दूध तो पी लिया कीजिए।’’

  ‘‘एलिस मुझे लगता है तुमने आज तक मुझे समझा ही नहीं है। अहिंसा को लेकर किए गए मेरे प्रयोग में गाय के दूध का बहिष्कार बड़ा महत्व रखता है। तुम्हे तो पता ही है कि मैं कठोर सनातनी हिन्दू हूं। तुम ही कहो गाय को सिर्फ भगवान मान लेने भर से क्या हम हिन्दुत्व की रक्षा कर लेगें। प्रत्येक नागरिक को चाहिए कि वह गाय के खून से बने दूध का उपयोग करना छोड़ दे। क्योंकि दूध पर सिर्फ उसके बछड़े का ही अधिकार होता है।’’ अभी बापू बोल ही रहे थे तभी उनके भीतर से उठने वाली सूखी खांसी के जोरदार ढसके ने पूरे वातावरण को स्लेटी रंग में डूबो दिया था। एलिस बापू को सहारा देने के लिए लपका ही था, तभी रामगोपाल की बदहवास उपस्थिति ने वातावरण में गर्म हवा भर दी थी। रामगोपाल इतना बदहवास था कि उसका अपनी गति पर नियंत्रण ही नहीं रहा। उसके भाग कर आने से बल्लियों के सहारे तार से लटका बल्ब भी झटके से टूट कर गिर गया था। जिसकी वजह से वहां नीम अंधेरा पसर  गया, जहां से बस बापू की खांसी की आवाज ही सुनी जा सकती थी।

‘‘क्या हुआ रामगोपाल भाई आप इतने बदहवास क्यों हो?आगे कुछ कहोगे भी’’ ऐलिस घबरा कर गिरते-गिरते बचा था।

  ‘‘पूरे शहर में दंगे की स्थिति बन रही है, चौक-चौराहे पर पुलिस की गश्त बढ़ा दी गई है। जमाते इस्लामी और हनुमान सेना के जवान पूरे असलहा के साथ एक दूसरे के खिलाफ चाक चौबंद हो रहे हैं। कुछ न्यूज चैनल तो सरकार के द्वारा बापू को नज़र बन्द करने की खबर भी चला रहे हैं। एक चैनल अपने प्राइम टाईम पर बता रहा है, किस प्रकार बापू के चारो ओर जे़ड प्लस सुविधा बढ़ाने की पेशकश की गई है, जिसे गांधी ने खुद को सामान्य जन बताते हुए ठुकरा दिया। उनके साथ कोई साजिश न हो जाए इसलिए बापू के चारों ओर जैमर लगाने की भी बात की जा रही है।   

    ‘‘लेकिन ऐसा हुआ क्या है कि जनता उग्र हो रही है? अभी तो अनशन शुरु भी नहीं हुई है।’’ एलिस के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं।

    ‘‘होना क्या है, वही हिन्दू मुस्लिम का टंटा, और क्या। एलिस तुम बड़े किस्मत वाले हो जो बापू की सेवा में खुद को समर्पित कर दिए हो, बाहर की राजनीति से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है। देश में राजनीति के कैसे-कैसे थपेड़े चल रहे हैं, तुम्हे क्या पता।’’

  ‘‘रामगोपाल अब तुम ज्यादा दार्शनिकता न बघारो, जो भी है स्पष्ट कहो , मुझे बहुत घबराहट हो रही है।’’ एलिस थोड़ा पिनक गया था।

  ‘‘कुछ नहीं छोटी सी बात ने बड़ा रुप ले लिया है,जो भयानक भी है और घृणित भी। मुझे लगता है इसका समाधान कानून को करना चाहिए। लेकिन उसे भयानक राजनीतिक रंग दे दिया गया है।  इसे संभाला नहीं गया तो इसके चपेट में पूरा देश आ जाएगा।’’

 ‘‘हुआ क्या है कुछ कहोगे भी’’ एलिस की घबराहट बढ़ती जा रही थी।  

    ‘‘मैंने कहा न बात बहुत छोटी सी है लेकिन बड़ा रुप ले ली है। इसी शहर के सब्जी व्यापारी अकबरुद्दीन के बेटे शमीम का निकाह फातिमा से हुआ था। शमीम एक सरकारी संस्था में ऊंचा ओहदेदार है। अब बेटा बड़े पद पर था, इसलिए अकबरुद्दीन ने भी लड़के का स्टेटस घ्यान में रख कर रिश्ता तलाशा। अपनी फूफी के देवर अब्दुल खां जो कि शाहजहांपुर के पुलिस कप्तान हैं, की बेटी फ़ातिमा का रिश्ता अकबरुद्दीन ने खुद बढ़ कर अपने बेटे के लिए मांगा था। फातिमा थी भी बला की खूबसूरत l रुई की फाह सी कोमल और मक्खन सी मुलायम। अब सुन्दर थी तो थोड़ी नज़ाकत भी आ गई थी। उपर से पुलिस कप्तान की बेटी होने की अकड़ अलग। वैसे शमीम भी कम सजीला जवान नहीं था। देखने सुनने में सुन्दर होने के साथ-साथ उंचे पद पर भी था इसलिए खां साहब ने तत्काल रिश्ता मंजूर कर लिया। पिता का दबाव लगातार बन रहा था, लेकिन शमीम कहीं और दिल दिए बैठा था। खड़ी माई मन्दिर के पुजारी जनेऊधारी  की बिटिया अपर्णा और शमीम का प्यार कॉलेज में किसी से छिपा न था। दोनों के भीतर चांद एक साथ भूरभुरा कर रिसता था। साथ जीने मरने की कसमे खाई जाती थी। लेकिन जनेऊधारी के लिए तो बात मरने मारने वाली थी। उच्च कुलीन ब्राह्मण उपर से प्रतिष्ठित मन्दिर के पुजारी। शहर भर के लोग इज्जत से पांवलगी किया करते थे। शमीम ने भी खूब आपा-धापी मचा रखी थी। मामला आगे बढ़ता इससे पहले अकबरुद्दीन की बेगम ने कमान सम्हाला था। डेमोक्रान का ढक्कन खोल कर खड़ी हो गई ‘‘अपनी अम्मी के जान की सलामती चाहते हो तो फातिमा से निकाह पढ़ लो वर्ना मेरा मरा मुंह देखोगे।’’ शमीम ने खूब उछल कूद की लेकिन उसकी एक न चली।’’ 

    ‘‘पर इसमे बंवडर वाली ऐसी कौन सी बात हो गई है। हां यह बात जरुर है कि गन्धर्व विवाह में मुझे कोई कमी नजर नहीं दिखती। मुझे तो लगता है वर्तमान समाजिक परिप्रेक्ष्य में प्रेम विवाह और ज्यादा सापेक्षिक है। मैं तो अन्तर्जातीय विवाह को और ज्यादा तरजीह देने के पक्ष में हूं। ऐसे विवाह तो दो कौमों के मध्य एकता स्थपित करने के मुख्य कारक बन सकते हैं। अगर भारतीय एथिक की बात की जाए तो यहां रामायण महाभारत जैसे ग्रन्थो में प्रेम विवाह को लेकर ज्यादा स्वेच्छाचारिता देखने को मिलती है।’’ बापू ने अभी अपनी बात पूरी भी नहीं की थी, तभी एक बार फिर से सूखी खांसी का बवंडर पूरे कमरे में फैल गया था। बापू को लगातार खांसता देख एलिस घबराया था। वो बकरी के दूध में हल्दी डाल कर गर्म करने के लिए लपका ही था कि बापू ने उसे शांत करते हुए टोका,‘‘एलिस तुम नाहक ही घबरा रहे हो, मुझे अस्थमा का अटैक है और कुछ नहीं l वैसे भी मेरे सोने का समय हो रहा है। ऐसा करो तुम जौ की लप्सी बना दो, मैं तुम्हे रोकूंगा नहीं लेकिन बर्तन मैं स्वयं साफ करुंगा, क्योंकि व्यक्ति की आंतरिक शुद्धता के लिए उसकी बाहृय शुद्धता जरुरी है।’’बापू की बात सुन कर एलिस मुस्कुराता हुआ चला गया था, जो अंधेरे में किसी को न दिख सका। ‘‘हां कहो गोपाल तुम क्या बता रहे थे-आखिर फसाद की जड़ क्या है।’’

     ‘‘बापू , हक साहब ठहरे पुलिस कप्तान सो पुलिसिया अकड़ तो थी ही। उपर से फातिमा अलग सिर चढ़ी थी, निकाह के बाद दो दिन के लिए शमीम के घर क्या आई लगी नाक भौं सिकोड़ने। अव्वल तो ससुराल में रहने की फातिमा को तनिक भी इच्छा नहीं थी, उपर से अकबरुद्दीन के घर निजी शौचालय नहीं था। फारिग होने के लिए खेत में जाने पर फातिमा को अपनी सात पुश्तें याद आ गईं। शौचालय को ले कर तो वह अड़ ही गई जब तक घर में शौचालय न बन जाए तब तक मायके में ही रहेगी।’’ 

      ‘‘ठीक ही तो किया बच्ची ने यह उसका सत्याग्रह ही तो है। इसमें उसका क्या कसूर लोग महंगे-महंगे घर बनवा लेते हैं। घरों में कपड़ों और गहनों का अंबार लगा हो लेकिन शौचालय बनवाने के नाम पर कतरब्योंत करने लगते हैं। तुम ही कहो गोपाल भाई खुले में शौंच के लिए जाना नारी सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह लगाता है कि नहीं। इस विषय पर तो मेरा खुला विरोध है,सरकार को इस दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिए।’’ 

       ‘‘आपका कहना तो उचित है बापू लेकिन स्त्री का परिवार के प्रति भी तो कर्तव्य बनता है। सास श्वसुर की जिम्मेदारी भी तो होती है।’’

       ‘‘फिर इक्वल जेंडर का क्या ?,परिवार के प्रति लड़के की जिम्मेदारी भी कम नहीं होती है। इसे तुम्हे मानना पड़ेगा। खैर मुझे लगता है हम मुद्दे से भटक रहे हैं l बात की तह तक जाने से पहले दूसरी बात को तरजीह देना सही वकतृत्व कला नहीं है।’’गांधी थोड़ा सपाट हुए थे। 

          ‘‘क्षमा करें बापू मैं रौ में बह गया था। दर असल रुप धन और यौवन से परिपूर्ण फातिमा ने अपने अब्बू से साफगोई से कह दिया था-चाहे जो हो जाए मुझे उस कैदखाने में नहीं जाना है। बिटिया की ज़िद के आगे अब्दुलहक भी हारे थे। कहते हैं न आदमी अपनी औलाद से ही हारता है। लाख समझाया लेकिन फातिमा को नहीं मानना था सो नहीं मानी। हार कर अब्दुलहक ने मंत्री जी से पैरवी कर के शमीम की पोस्टिंग अपने शहर में ही करा ली थी। शुरु-शुरु में शमीम की खूब आवभगत की गई, फातिमा ने पति के सारे नाज नखरे उठाए लेकिन बाहरी मुलम्मा धीरे-धीरे हटता चला गया। किसी ने ठीक ही कहा है ससुराल में ज्यादा दिन तक रहने वाले दामाद की हैसियत नौकरो सी होती है। शमीम की स्थिति भी ससुराल में बद से बदतर हो गई थी। दिन भर आफिस से थक हार कर बेचारा जब घर लौटता तो मोहतरमा मुंह कुप्पा किए बैठी मिलतीं l शापिंग कराने से ले कर सारे नाज नखरे उठाओ फिर भी किसी न किसी बहाने रोज का टंटा बना ही रहता। उस दिन तो हद ही हो गई थी, चिल-चिलाती धूप में शमीम बिफरता हुआ आया था। उसके भीतर तो जैसे आग दहक रही थी। अब्बु का एक्सिडेंट हो गया था। अम्मी फोन पर फफक-फफक कर रो रही थी , अगर जल्दी पैसा न मिला तो तुम्हारे अब्बू की जान चली जाएगी।’’ 

      ‘‘अम्मी का रोना सुन शमीम एकदम बावला हो गया था। सोचा ए.टी.एम से पैसा निकाल कर तत्काल नेफ्ट कर देगा। लेकिन कहां, पर्स से तो ए.टी.एम ही गायब था। देह में तो मानो आग लग गई थी। भाग कर आया तो फातिमा का बतकुच्चन अलग ! किस लिए, किसके लिए, कितने रुपए,जैसे सवालों ने तो मन के भीतर जल रही अग्नि को और हवा दे दी थी। अति तो तब हो गई थी जब फातिमा ने चीखते हुए कहा था, ‘‘कंगलो को तो हमेशा पैसा घटा रहता है, एक्सीडेंट-वेक्सिडेंट कुछ नहीं हुआ है। उनकी नजर तो बस हमारे पैसों पर गड़ी हुई है। अहमक मरें भी तो पीछा छूटे।’’ 

       रात और गहरी होती जा रही थी l गोपाल राम अपनी रव में था, वह लगातार बताए जा रहा था। लेकिन बापू की पीड़ा और बढ़ती जा रही थी l खांसी का सूखापन पूरे कमरे में भर गया था। पर एलिस उनकी ज़िद के आगे हारा था। जौ की लप्सी से आखिर कितनी ताकत मिलती। उपर से खुद बर्तन साफ करने की ज़िद अलग ‘‘एलिस चीखा था बापू यू.आर.टू. रिजि़ड।’’ 

       एलिस की चिड़चिड़ाहट पर मुस्कुराते हुए गांधी ने कहा था ‘‘एलिस मेरे भाई देह को इतना महत्व देना ठीक नहीं है। तुम मेरे सहचर हो कर भी मुझे नहीं समझ सके इसका मुझे दुःख है। तुम तो जानते ही हो मैंने जीवन में यदि किसी बात का सर्वाधिक प्रयोग किया है तो वह है अन्नाहार। अन्नाहर ही है जिसने मुझे आत्मबल दिया है। पानी चिकित्सा प्रणाली और अन्नाहार ने मेरी सुचिता को बल दिया है। तुम्हे जानना चाहिए मेरी वजह से बेचारी बा को भी कष्ट झेलना पड़ा है। उस दिन को याद करके सिहर जाता हूं l साउथ अफ्रिका में बा का ब्लिडिंग बंद ही नहीं हो रहा था। उसके उपर रोग के तीन घातक हमले हुए थे। उस समय सत्याग्रह युद्ध चल रहा था, उसे बार-बार रक्तश्राव हो रहा था। मेरे डाक्टर मित्र ने उसका शल्य क्रिया करने की मुझसे अनुमति ली और क्लोरोफाम का उपयोग किए बगैर उसका शल्य क्रिया कर दिया। बा की देह बहुत क्षीण हो गई थी। डाक्टर गोमांस का शोरबा पिलाने के लिए अड़ गया था। लेकिन मैं नहीं माना l उस परिस्थिति में डाक्टर ने मुझे अपने घर से निकाल दिया था। डरबन से फिनिक्स तक रेल से यात्रा के बाद फिनिक्स से लगभग ढाई मील तक हम पैदल ही चले। क्षमा करना गोपाल मैं भावनाओं में आकर थोड़ा भटक गया था।’’ 

   ‘‘बापू क्षमा मांग कर आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं। जीवन के संघर्ष का तात्विक चिंतन आपसे बेहतर कौन जानता है।’’ 

      ‘‘गोपाल! निष्काम संघर्ष जीवन का सत्य है। और मां-बाप के लिए किया गया कार्य तो व्यक्ति का आत्मदायित्व है। मुझे अफसोस है कि मैं दैहिक मोह में फंस कर पिता के अंतिम क्षण में उनके साथ नहीं रह सका। शमीम को अपने संघर्ष की पराकाष्ठा तक अपने माता-पिता का साथ देना चाहिए।’’

      ‘‘बापू शमीम वही तो कर रहा था। फातिमा की कर्कशता से अजीज आकर उस रात शमीम घर छोड़ कर भाग निकला। पहले-पहल अब्दुलहक को लगा अप्सरा जैसी नाजुक बीबी और अफसर की नौकरी छोड़ कर भागेगा कहां। और भागेगा भी तो कितने दिनों तक? इस लिए पिता-पुत्री मौन रहे। यहां तक अकबरुद्वीन को भी किसी बात की कोई भनक नहीं लगने दी। लेकिन पन्द्रह-बीस दिन के बाद भी जब शमीम का कहीं पता नहीं चला तो अब्दुलहक थोड़ा घबराए। ताबड़-तोड़ रिश्तेदारों को फोन लगाया, लेकिन कहीं से कुछ सूचना नहीं मिलनी थी सो नहीं मिली। हार कर शमीम के कार्यालय गए तो होश फाख़्ता हो गए। पता चला शमीम ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया है। त्याग पत्र देने का कारण भी कुछ स्पष्ट नहीं था। बात बेहद रहस्यात्मक और उलझी हुई थी। वैसे तो फातिमा का दिन शमीम से लड़ते-झगड़ते ही बीतता था, लेकिन उसके जाने के बाद से रो-रो कर उसकी आंख सूज गई थी। वैसे भी अब्दुलहक बड़े ब्युरोक्रेट्स थे। सरकार के बड़े-बड़े ओहदेदारों के साथ उनका उठना-बैठना था। इसलिए शमीम का अचानक गायब हो जाना उनके लिए डूब मरने वाली बात थी। उपर से घर में बेटी का करुण रुदन, उन्होने आकाश जमीन एक कर दिया, लेकिन कोई सुराख़ हाथ नहीं लगा। इधर वहां से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर अभनपुर के प्रतिष्ठित मंदिर खड़ी माई के पुजारी की बेटी अपर्णा का भी कहीं थाह पता नहीं चल रहा था। अपर्णा के पिता महाराज जनेऊधारी कट्टर हिन्दुत्ववादी ब्राहमण थे। हाल ही में उन्हे एक कट्टर दल ने अपनी पार्टी में प्रदेश स्तर का महामंत्री बनाया था। सत्ता चाहे किसी की हो जनेऊधारी का अपना अलग रसूख था। किसी का तबादला कराना हो या ठेका दिलाना, जनेऊधारी के लिए बांए हाथ का खेल था। समय पड़ने पर जातिवादी हिंसा कराने में भी उनको महारत हासिल था। लेकिन उस दिन वह बेहद उदास थे, उनका मन तपते रेगिस्तान में मीलों दौड़ रहा था। दौड़े भी क्यों न, रुई की फाहे सी थी अपर्णा तभी उसकी मां उसे छोड़ कर परलोक वासी हो गई थी, तब से आज तक जनेऊधारी बेटी को अपने हाथों से ही खिलाते हैं। क्या मजाल की पार्टी-फंक्शन में अपर्णा कोई कपड़ा दोबारा पहन कर चली जाए। उस दिन अपर्णा क्या भागी उनकी तो जान ही चली गई थी। सारे उपाय रच डाले लेकिन कहीं सफलता नहीं मिली। अभी खोजबीन चल ही रही थी तभी एक विडियो वायरल हुआ। अपर्णा और शमीम किसी मस्जिद में निकाह पढ़ते हुए रंगे हाथों पकड़े गए थे। बात खाली निकाह तक होती तो कुछ नहीं होता। आगे की घटना रुह कंपा देने वाली थी। शमीम और अपर्णा भविष्य के सपने बुनते हुए अभी मस्जिद से निकले ही थे कि, पीछे से निकली कुछ काली परछांईयों ने उनका पीछा किया और मौका पाते ही अपर्णा की आबरु को तार-तार करने के बाद पहचाने जाने के डर से अपर्णा की हत्या करके लाश को पेट्रोल डाल कर जला दिया था। इस आपा-धापी में शमीम भी जाने कहां गायब हो गया। बारुद की ढेर पर बैठे समाज के लिए इस चिंगारी को आग के शोले में बदलते देर न लगी। घटना का सबसे दुर्भाग्यजनक पक्ष यह है कि आनन-फानन में पुलिस ने रेस्क्यू आपरेशन चला कर उन चारों कातिलों को एनकाउंटर कर दिया। हालाकि सरकार ने इस बात को बैन करने का भरपूर प्रयास किया, पर मिडिया इस खबर को मिर्च-मसाला लगा कर उछाल रही थी। चैनलो ने शमीम को आरोपी सिद्ध करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ा है। वैसे तो शमीम का भी कुछ पता नहीं चला, वह जिन्दा भी है कि नहीं यह भी कोई नहीं जानता। लोगों में भारी आक्रोश है l सब का कहना है सारे फसाद के पीछे शमीम का ही हाथ है। चारो तरफ आग लगी हुई है, एक ही नारा गूंज रहा है, हिन्दू एकता जिन्दाबाद...जिन्दाबाद। हिन्दू धर्म खतरे में है, बहन बेटियों को बचाना है तो मुसल्लों को पाकिस्तान भगाना होगा। जगह-जगह भीड़ बेकाबू होती जा रही है। कहीं-कहीं तो मुसलमानों की दुकान तक लूटे जा रहे हैं। यही हाल मुस्लिम बस्तियों में हिन्दुओं का किया जा रहा है। हालात पर काबू न पाया गया तो भयानक गृहयुद्ध छिड़ने की आशंका है। मीडिया बता रहा था कि, कैसे मुसलमान परस्त आलाकमान अपनी दुकान चमकाने की गरज से हिन्दुओं को काफिर करार दे रहे हैं। उनके द्वारा बार-बार खुद को दबा कुचला माइनॉरिटी  वाला कौम बता कर हमदर्दी हासिल करने की कोशिश की जा रही है।’’

    रामगोपाल अभी अपनी बात कह ही रहा था तभी एलिस ने झटके से गिरे बल्ब को उठा कर टांगा तो बल्ब की मरियाई रौशनी में गांधी के निर्विकार चेहरे को साफ पढ़ा जा सकता था। एक ऐसा भाव शून्य चेहरा जिसकी झुर्रियों में एक विराट समस्या की उलझन को आंका जा सकता था। राम गोपाल के भय मिश्रित उकताहट को भी समझा जा सकता था। 

    भयाक्रांत गांधी की निर्मिमेष आंखो की कोर से अश्रु की बूंद लुढ़क कर गिरी थी......‘‘रामगोपाल यह तो बहुत ही भयावह है। बिटिया का शील हरण उफ् और उसके बाद उसको जिन्दा जला देना हम कहां जा रहे हैं। मैं तो बलात्कारियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा का हिमायती रहा हूं। लेकिन आरोपियों को इन्काउंटर करना। हम न्याय की किस परंपरा को जन्म दे रहे हैं। इससे तो अपराध के बहुत सारे राज  दफ्न कर दिये गये। उससे उपजे विवाद की परिणिति तो तुम प्रत्यक्ष देख रहे हो...। जाने शमीम किस हाल में होगा, जिन्दा भी है या नहीं l लेकिन पूरा देश जलने की कगार पर खड़ा कर दिया गया है। यहां तो जनेऊधारी और अकबरुद्वीन दोनों की दशा चिंतनीय है।’’

     ‘‘आप ठीक कह रहे हैं जनेऊधारी तो पागलों सा बिफर रहा है। उच्चराजनीतिक पकड़ रखने वाले जनेऊधारी ने घटना को नई दिशा में मोड़ते हुए प्रदेश मुखिया को खुली चुनौती दी है...लव जिहाद करने वाले कठमुल्ले को पकड़ कर यदि शीघ्र ही जिन्दा नहीं जलाया गया तो पूरे परिवार के साथ मंत्रालय के सामने आत्मदाह कर लेगा। जनेऊधारी के वक्तव्य को हवा देने में मीडिया ने भी कोई कसर नहीं छोड़ा है। मीडिया ने लवजिहाद को लेकर  कोहराम मचा रखा है। उससे देश भर में भयानक आक्रोश पनप रहा है। अकबर से लेकर तैमूरलंग तक को भारी भरकम गालियां दी जा रही हैं। कई शहरों के चौक चौराहों पर बड़ी-बड़ी रैलियां निकाली जा रही है। सरकारी मालो असबाब को अग्नि के हवाले किया जा रहा है।’’

    ‘‘यह तो भयानक और त्रासद भी है। भारत दुनिया का विशालतम देश है। यहां का उथल-पुथल एशिया ही नहीं पूरी दुनिया को अस्थिर कर सकता है। धार्मिक एकता तो हमारा सौंदर्य है,हमें अपने लालित्य को बचाए रखना होगा।’’ गांधी के भीतर से खांसी का बांध मानो फूट पड़ा था। एलिस दौड़ कर गर्म पानी लाया तो थोड़ी राहत हुई। 

    ‘‘बापू शमीम के मामले ने लवजिहाद को हवा तो दिया ही है, उसकी वजह से एन.आर.सी का विवाद भी गहराता जा रहा है। देश दो भागों में बंटता नजर आ रहा है। यहां पर चिंता की बात यह है कि, लोग सारे फसाद का दोषी आपको मानते हैं। एक बड़ा समुदाय मानता है कि आप ही ने मुसलमानों को प्रश्रय प्रदान किया है। लोग आपकी पहचान देश विभाजक के रुप में कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि पाकिस्तान बनने के बाद भी आप ने मुसलमानों को भारत में रहने के लिए उकसाया है। जबकि पाकिस्तान में हिन्दुओं को  भारी अत्याचार सहना पड़ा है। कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि आपने अपनी राजनीति चमकाने के लिए ऐसा काम किया है।’’

     रामगोपाल की बातों के आगे गांधी मौन रहे l बस ढुस-ढूसी वाली सूखी खांसी ही मौन वातावरण के सीने में सूराख कर रही थी। थोड़ी देर मौन रहने के बाद बापू ने कहा था। ‘‘बहुत सारी बातें समय सापेक्ष होती हैं। भारत पकिस्तान का विभाजन दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है। मैंने तो यहां तक कहा था कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा। मैंने पहले भी कहा है, माउंटबेटन भारत विभाजन के लिए प्लान तैयार किए खड़ा था। खैर.. अवाम अपने तरीके से सोचने के लिए स्वतंत्र है।’’ ‘‘एन.आर.सी को लेकर मैं तो यही कहूंगा कि यह कानून बहुत सारे लोगों के मन में असंतोष पैदा करेगा। निश्चय ही अल्पसंख्यक वर्ग यह सोचेगा कि एन.आर.सी. के बहाने उनकी नागरिकता न छिन ली जाए। यह निश्चय ही कड़ा कानून है l इस विषय में मैं स्वयं सरकार के नुमाइंदो से बात करुंगा। आवश्यकता पड़ी तो प्रधानमंत्री जी से यह अनुरोध करुंगा कि संसद में अध्यादेश ला कर इस कानून को रद्द करें , क्योंकि यह लोगों में असंतोष फैलाएगा। इससे राजनैतिक अस्थिरता तो होगी ही, बाजार भी औंधे मुंह गिरेगा। जिससे पूरे एशिया में बेरोजगारी बढ़ेगी। मेरी बात न मानी गई तो मैं इसके लिए भी जंतर-मंतर में आमरण अनशन करुंगा।’’

   एलिस चौंका था ‘‘लेकिन आपकी हालत तो एकाहारी की भी नहीं है। मैं आपको भूख हड़ताल करने की अनुमति कदापि नहीं दे सकता।’’‘‘यदि आपने अनशन करने की सोची तो मैं भी अपनी जान दे दूंगा।’’

  ‘‘तुम्हे क्या लगता है भूख हड़ताल करने से मेरी मृत्यु हो जाएगी, एलिस तुम्हे एकदम नहीं घबराना चाहिए, क्योंकि अनशन तो मेरे प्रयोग का एक महत्वपूर्ण औजार है। अनशन से तो मेरी कुंडलियाँ जाग्रित होती हैं। जो मुझे और अधिक उर्जा से कार्य करने हेतु प्रेरित करती हैं। रही बात नागरिकता पंजीकरण की तो तुम्हे याद होगा मैंने दक्षिण अफ्रिका प्रवास के दौरान वहां की सरकार के द्वारा भारतीय मजदूरों के दमन के लिए लाई गई राट्रीय पंजीकरण नीति का खुल कर विरोध किया था। जिसके आगे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा था। अब तुम ही सोचो जब विदेशी सरकार को हमारी मांगो के आगे झुकना पड़ा तो क्या अपने देश की सरकार हमारी बात नहीं मानेगी। मुझे तो लगता है मेरा अनुरोध पत्र ही इस कानून को समाप्त करने के लिए पर्याप्त होगा।’’

     ‘‘मुझे नहीं लगता सरकार आपकी बात मानेगी, आप तो देख ही रहे हैं यह मामला कितना संवेदनशील है। शाहीनबाग के मैदान में कड़-कड़ाती ठंड वाली रात में भी इस बिल को लेकर लगातार धरना प्रदर्शन किया जा रहा है। आपके पथ का अनुगमन करने वाले अग्रपंथी नेता आपके द्वारा दक्षिण अफ्रिका में किए गए आंदोलन को आधार मान कर ही अपने आंदोलन की रुप रेख तैयार कर रहे हैं। कुछ बड़े नेता तो बड़े-बडे मंचो से यह उद्धरण भी दे रहे हैं। परिणाम स्वरुप जनता को उद्वेलित करने के जुर्म में उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन कहीं जनता पर इसका गलत प्रभाव न पड़े इसलिए उन्हे छोड़ दिया गया। देश के सामने एन.आर.सी. के मुद्दे को लेकर घमासान मचा हुआ है।’’  

    ‘‘देश में अलगाववादियों के लिए तो यह उपयुक्त अवसर है। अलगाववादी तो एन.आर.सी. के मुद्दे को राष्ट्रवाद से जोड़ कर प्रचारित कर रहे हैं। एक बड़ा समुदाय भयाक्रांत है कि कंहीं नागरिकता रजिस्ट्रेशन के बहाने उन्हें उनकी नागरिकता से वंचित न कर दिया जाए l वहीं दूसरी जाति धर्म संप्रदाय के लोगों में अलग प्रकार का संचार देखने को मिल रहा है। दुनिया भारत को  हिन्दू राष्ट्र के रुप में उभरता देख रही है।’’ 

    ‘‘तुम्हारा कहना शायद सच भी हो। सनातन काल से चले आ रहे हिन्दू धर्म का विकास हो, हृदय के अन्तःतल से मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ। इसमें कोई अनुचित अवधारणा मुझे दिखती भी नहीं। लेकिन तुम्हें तो पता ही होगा भारत विविध संस्कृतियों वाला देश है। दुनिया के तमाम विद्वान सांस्कृतिक विविधता के बावजूद यहां की एकता को देख कर आश्चर्य  चकित हैं। लार्ड लेथोनियन ने नेहरु को लिखे अपने पत्र में इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा भी था l इतनी विविध संस्कृतियों और भाषाओं वाला देश होने बाद भी भारत इतना एक है, यह देख कर आश्चर्य होता है।

      ‘‘लेकिन हमारी विविधता ही कई बार हमारे लिए गले का फांस बन जाती है।’’ रामगोपाल के चेहरे पर चिन्ता की लकीर स्पष्ट दिख रही थी। 

      ‘‘रामगोपाल मैं सनातनी हिन्दू हूं। मास,मदिरा परस़्त्री गमन मेरे लिए हराम है। हिन्दू होने का मुझे गुमान भी है। लेकिन मेरा राम इस बात की अनुमति कदापि नहीं देता कि मैं दूसरे सम्प्रदाय को दबा कर अपना सर्वस्व विकास करुं। खुद को प्रतिष्ठित करने की बात का तो मैं घोर विरोधी हूं। मैंने तो राम के उदार रुप को स्वीकारा है। मेरे राम तो रावण से युद्ध लड़ने से पहले उससे अनुमति लेते हैं। फिर वो हन्ता कैसे हो सकते हैं। साम्प्रदायिक एकता ही मेरे जीवन का ध्येय वाक्य रहा है।’’  

      ‘‘साम्प्रदायिकता ही तो आपसी कलह के मूल में है। शमीम ने तो प्यार किया था। वह अपने प्यार का हत्यारा कैसे हो सकता है। चलिए इस बात को मान भी लिया जाए कि उसने ही अपर्णा को मारा है तो कम से कम उसे सुन तो लिया जाना चाहिए। उसकी सजा पूरे समाज को क्यों दी जा रही है। बलवाई कितने मासूमों को मार रहे हैं। कितने घर उजाड़ दिए जा रहे हैं। यह कितना न्यायोचित है। धर्म के लंबरदारों को अपनी रोटी सेंकने का अच्छा मौका मिल गया है।’’

     ‘‘रामगोपाल एक आदर्श समाज की स्थापना के लिए उदार समाज का होना बहुत अनिवार्य है। यदि शमीम ने हिन्दू लड़की से निकाह कर ही लिया था तो इसमें इतना कोहराम मचाने की क्या आवश्यकता थी। वैसे यहां परिस्थिति ने अलग रुप ले लिया है जो कि चिन्तनीय है। रही बात धार्मिक मतैक्य की तो तुम्हे याद होगा हरिराम ने मुझसे मतभेद होने पर मुस्लिम धर्म अपना लिया था। लोगों ने मुझ पर खूब दबाव बनाया लेकिन मुझे लगा यह हरिराम का अपना विवेक है इसलिए मैं मौन रहा।’’

     ‘‘लेकिन बापू यहां परिस्थिति पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी है। एन.आर.सी को लेकर लोगों की साम्प्रदायिकता उफान पर है। जनता अपने सोचने समझने की शक्ति खोती जा रही है।’’ 

     ‘‘रामगोपाल तुम्हे व्यर्थ की चिन्ता से बचना चाहिए। हमें व्यर्थ की बातों से उपर उठ कर वैज्ञानिक चेतना की ओर अपने कदम बढ़ाने चाहिए। यदि अपना सर्वांगीण विकास करना है तो शिक्षा प्रणाली के पुनरउत्थान की बात सोचनी होगी। लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली को बदलते हुए प्रशिक्षण आधारित शिक्षा व्यवस्था पर बल देना चाहिए। वैसे तो हमारी सरकार सहिष्णुता पर विश्वास करती है, लेकिन यदि वर्ग विभेद की बात होगी तो मैं पहले भी कह चूका हूं, जंतर-मंतर में अपने साथियों के साथ अनशन करुंगा l यदि मेंरे अनशन से दस प्रतिशत आबादी में भी चेतना आएगी तो मैं समझूंगा मेरी तपस्या का फल मुझे मिल गया।’’

     लेकिन बापू उपर से जनता अलग उग्र हो रही है और आप निहत्थे भी हैं । आप समझते क्यों नहीं आप मार दिए जाएंगे।’’ एलिस चिंतिंत हुआ था।

    ‘‘एलिस मैंने गीता का विधिवत अध्ययन किया है। जीवन और मृत्यु अटल सत्य है। इसको लेकर मेरे मन में तनिक भी संशय नहीं है। मेरी स्पष्ट मान्यता है, मनुष्य से बड़ा देश होता है। और देश को बचाने के लिए मैं अपनी आत्माहुति देने के लिए तैयार हूं। एलिस मैंने पहले भी कहा है, फिर कह रहा हूं , हमारी साम्प्रदायिक एकता ही हमारा सौन्दर्य है।  इसे सहेज कर रखने का दायित्व दोनों धर्मों का है। लेकिन दोनों दलों के अलगाववादियों को यह गवारा नहीं है।’’  

    ‘‘आप कह तो ठीक रहे हैं लेकिन कुछ अलगाववादी ताकतों को लगता है कि मुस्लिम सम्प्रदाय को साम्प्रदायिक एकता से कुछ लेना देना नहीं है l वह तो अपने मानवीय शक्ति के विकास को ध्यान में रखते हुए लगातार संतानोत्पत्ति करने में लगा हुआ है।’’ रामगोपाल की आवाज में नमी थी।

    ‘‘हां मैं मानता हूं, और मुझे यह मानने में जरा भी संकोच नहीं है कि मुस्लिमों में ज्यादा संतानोत्पत्ति की प्रवृत्ति होती है। मैंने इस विषय पर गहन चिन्तन भी किया है। तुम्हे जान कर आश्चर्य होगा , मुसलमानों में अधिक संतानोत्पत्ति का मूल कारण धर्म न होकर उनकी निरक्षरता है। मुसलमानो को इस दिशा में गहराई से सोचना होगा। हाजियों और उलेमाओं को धार्मिक शिक्षा के स्थान पर संवैधानिक शिक्षा पर जोर देना चाहिए। अनपढ़ परिवारों में शिक्षित परिवारों की तुलना में ज्यादा बच्चे जन्म लेते हैं। यह बात हिन्दू और मुसलमानों में समान रुप से देखा जा सकता है। अर्थात तुम कह सकते हो जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा पर सामूहिक बल देना चाहिए।’’ अभी बापू अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाए थे तभी दूर से आती कोलाहल की आवाज तेज होती जा रही थी। कुछ के हाथों में तब्बल,गंड़ासे और धारदार हथियार चमक रहे थे तो कुछ गहरे हरे रंग के परचम के साथ एक दूसरे पर टूट पड़ रहे थे। तभी कहीं से आवाज का एक गुच्छा हवा में उछला था। 

   ‘‘सारे फसाद की जड़ में गांधी है। इसी ने जिन्ना की पार्टी मुस्लिम लीग के साथ मिल कर भारत मां के दो टुकड़े कर दिए। इसे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं है।’’ 

   ‘‘हां तुम ठीक कह रहे हो जब भारत का विभाजन कर ही दिया था तो इन म्लेच्छों को भारत में रहने क्यों दिया गया। इन्हे पाकिस्तान क्यों नहीं भगाया गया। जबकि हिन्दुओं को पाकिस्तान में जबरिया कत्लेआम किया गया। हमारे मन्दिर तोड़े गए। एक कांपती हुई आवाज हवा में फैल गई थी।                                              ‘‘हिन्दुस्तान हिन्दू बाहुल्य देश था l अगर मुस्लिम पाकिस्तान में ही रह गए होते तो सारा टंटा ही खत्म हो गया होता। धीरे-धीरे गांधी मुर्दाबाद के नारे बुलंद होने लगे थे। 

   ‘‘एलिस गांधी की सुरक्षा में लगे अर्धसैनिक बल पर चिल्ला रहा था। चारों तरफ से गेट बंद कर दो l देखो कोई बलवाई कहीं से भी अन्दर न आने पाए।’’ वह गांधी पर भी चीख रहा था। आपने जेड प्लस सुरक्षा ठुकरा कर ठीक नहीं किया। आपको तो पता ही है, आपका जीवन देश के लिए कितना महत्वपूर्ण है।’’

  ‘‘एलिस तुम स्थिरचित्त होकर विचार करो। देखो जरा मेरा दलिया तैयार हो गया होगा। तुम्हे क्या लगता है, मुझे कोई मार डालेगा। नहीं मेरे भाई मुझे कोई नहीं मार सकेगा। नैनं छिदंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः। फिर आत्मा को अपना शरीर तो बदलना ही होगा। वैसे भी मेरी देह जर्जर हो चुकी है। इससे मोह कैसा, तुम्हीं कहो जर्जर वस्त्र को देह पर टांग कर कब तक फिरुं। देह मरती है, आत्मा नहीं। एलिस तुम्हे समझना होगा, गांधी हमेशा जीवित रहेगा। तुम्हे गांधी से प्यार करना चाहिए l उसके जर्जर देह से नहीं। आज मुझे बाहर निकलना ही होगा, क्योंकि हजारों लाखों भाई मुझे पुकार रहे हैं। तुम चिन्ता मत करो l मेरी देह नष्ट भी हो गई तो क्या? मेरे विचार हमेशा जिंदा रहेंगे। इससे पहले कि एलिस कुछ समझ पाता बापू ने दरवाजा खोल दिया था। 

     भीड़ बेकाबू हुई जा रही थी l भीड़ को चीरती हुई एक गोली आई थी। हे राम़़........... बापू छिटक कर भीड़ में जा गिरे थे। भीड़ अचानक मौन हो गई थी। चारों ओर हीरे की कनी सी बापू चमक रहे थे।

                                                 

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सक्रिय रचनात्मक लेखन से जुड़े युवा कहानीकार डा.नीरज वर्मा का पहला कथा संग्रह "पत्थर" अनुज्ञा बुक्स से हाल ही में  प्रकाशित हुआ है। उनकी कहानियां हंस, परिकथा, कथाक्रम जैसी अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। छत्तीसगढ़ शासन स्कूल शिक्षा विभाग में बतौर व्याख्याता वे अध्यापन के पेशे से जुड़े हुए हैं।

संपर्क: मायापुर, अम्बिकापुर

सरगुजा छ.ग. 497001

 मो.8109895593

टिप्पणियाँ

  1. कहानी अच्छी है।गांधी कोई स्थूल मनुष्य नहीं है , वह तो जीवन जगत से गुंथा हुआ एक जीवन मूल्य है, जिसके बिना सब कुछ अधूरा है।

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समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सोचना

अख़्तर आज़ाद की कहानी लकड़बग्घा और तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन पर टिप्पणियाँ

जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। (हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी) -------------------------------------- हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं। दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है। मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है। शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो च