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प्रीति प्रकाश की कहानी : राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए

प्रीति प्रकाश की कहानी 'राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए' को वर्ष 2019-20 का राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान मिला है, इसलिए जाहिर सी बात है कि इस कहानी को पाठक पढ़ना भी चाहते हैं | हमने उनकी लिखित अनुमति से इस कहानी को यहाँ रखा है | कहानी पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि यह कहानी एक संवेदन हीन होते समाज के चरित्र के दोहरेपन, ढोंग और उसके एकतरफा नजरिये को  किस तरह परत दर परत उघाड़ती चली जाती है | समाज की आस्था वायवीय है, वह सच के राम जिसके दर्शन किसी भी बच्चे में हो सकते हैं  , जो साक्षात उनकी आँखों के सामने  दीन हीन अवस्था में पल रहा होता है , उसके प्रति समाज की न कोई आस्था है न कोई जिम्मेदारी है | "समाज की आस्था एकतरफा है और निरा वायवीय भी " यह कहानी इस तथ्य को जबरदस्त तरीके से सामने रखती है | आस्था में एक समग्रता होनी चाहिए कि हम सच के मूर्त राम जो हर बच्चे में मौजूद हैं , और अमूर्त राम जो हमारे ह्रदय में हैं , दोनों के प्रति एक ही नजरिया रखें  | दोनों ही राम को इस धरती पर उनकी जन्म भूमि  मिलनी चाहिए, पर समाज वायवीयता के पीछे जिस तरह भाग रहा है, उस भागम भाग से उपजी संवेदनहीनता को यह कहानी जीवंत तरीके से सामने रखती है | प्रीति प्रकाश का अनुग्रह के इस मंच पर स्वागत है | 

राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए 

   

"अभी माथा गरम है".

आकि हमर हाथ ठंडा है?“

दोनों हाथों  को रगड़कर गरम किया बादामी ने. फिर से लड़की के

माथे पर हाथ रखा

"ना,बोखार है अभी.

स्वीकृति में सर हिलाया बादामी ने. थोड़ी देर वैसे ही बैठी रही फिर बेटी के सर

पर से तो हाथ हटा लिया पर चेहरे पर से नजरे नहीं हटाई. तभी तो सब उसे

भटकसुनकहते. भटकसुनमतलब जिसे अगल-बगल की कोई सुधि नहीं हो बादामी

भी जहां देखने लगती, बस देखती रहती. कुछ पूछो तो भी जवाब नहीं देती अपनी

धुन में खोई रहती. अभी भी जाने कितनी देर से बेटी का चेहरा देख रही थी

और जाने कितनी देर और देखती अगर गुदरी में सोया बच्चा नहीं कुनमुनाता. बच्चे

की आवाज सुन बादामी उसकी तरफ मुड़ गई. बच्चा इतने सारे कपड़ो में लिपटा था

कि कोई दूर से देखे तो समझे कि कपड़े का ही छोटा सा ढेर है. बादामी ने बच्चे के

शरीर पर हाथ रखा और उसे थपथपाना शुरू कर दिया,

,

सुत जा हो...

हमर सोनवा हो...

पर बच्चे पर इस लोरी का कोई असर न हुआ. धीरे-धीरे, रोते-रोते वह जोर-जोर

से रोने लगाआऊ

आऊ आऊ.

भुखु लाग गया का हो...?“

आई, आई हमर राजा जी हो...

बादामी ने बच्चे को गोद में उठा लिया और कलेजे से साट लिया. जब तक बादामी

ब्लाउज के बटन खोलती तब तक बच्चा ब्लाउज ही पीने लगा.जल्दी जल्दी बादामी ने

उसका मुंह अपने सूखे स्तन से लगा लिया. बच्चा सुडुप-सुडुप आवाज करके दूध पीने लगा

 

बच्चे के चुप होने से निश्चिन्त बादामी अब

बाहर देखने लगी. बादामी को बाहर देखना

उतना ही अजीब लगता जैसे बाहर वालों को

उसका घर देखना . बादामी

देखती, ”जाने कितनी लंबी

सड़क, कहां से आती...कहां जाती. चमकती

गाड़ियां, कार, जीप, ऑटो, मोटरसाइकिल

और म्युनिसिपैलिटी की कचरा उठाने वाली

भयंकर गाड़ी भी. सज-धज के जल्दी-जल्दी

आते-जाते लोग, सारे अजनबी चहरे, कोई

पहचान नहीं आता. कभी-कभी बादामी को

लगता कि वह किसी को पहचान रही है पर

जब वो मुस्कुराते हुए उसके पास जाती तो

सामने वाला अजीब नजर से देखता और

फिर बादामी की हिम्मत ही न होती कि

कुछ पूछे. दिन भर हल्ला-गुल्ला रहता और

फिर रात को धीरे-धीरे सन्नाटा हो जाताढि

बरी जला देती बादामी तब. फिर भी उसे

डर लगता. राधा को और जोर से कलेजे से

चिपका लेती.

सड़क पर आते-जाते लोग देखते,

म्युनिसिपैलिटी की नाली, उस पर टूटी

स्लैब, उस पर प्लास्टिक तान के रहती है

पगली. पगली के खोपचे में शहर भर का

कबाड़ इकट्ठा रहता है. मोटरी गठरी, लुगरी,

पोलोथीन, चट्टी बोरा और न जाने क्या-क्या , जाने

कहां से इतना गंदा कपड़ा ले आती है

पहनने के लिए. कभी-कभी पगली के साथ

एक लड़की रहती छह-सात साल की, और

अब एकदम छोटा बच्चा भी दिख रहा था

आजकल. कहीं बच्चा चोरी करने का काम

तो नहीं करती. दिन भर वही खोपचे में बैठे

रहती जब वो नहीं बैठे रहती तब लड़की बैठे

रहती, जैसे रखवाली कर रही हो अपने

ताजमहल की. कभी कभी सीलवड की तसली

में रोड के किनारे ही डभकता भात और फिर

पता नहीं क्यों लोग उसके बारे में सोचते

ही नहीं. एक अजीब-सी वितृष्णा होने

लगती.

दूध पीते-पीते बच्चा सो गया. बादामी

 

ने उसे फिर वहीं सुलाकर गुदरी ओढ़ा दी . मैली-

कुचैली गुदरी में बालक का शरीर ढक

गया बस चांद-सा मुखड़ा दिखता रहाबादामी

ने उंगली पर दिन गिने. आज

तेरहवां दिन था बालक को जन्म लिए. ना

ढोल बजा, ना बतासे बंटे, ना ही नए कपड़े

आए. किसी और घर में जन्म लिया होता

तो आज दूसरी ही रौनक होती. अपनी-

अपनी किस्मत. कितना सुन्दर चेहरा है , अगर

बड़की मेमसाहेब के हाथ में दे दो तो

सब कहेंगे कि उन्हीं का जाया है. पैर फैला

लिए बादामी ने. बाहर शीतलहरी चल रही

है. पैर पर ठंडी हवा लगने लगी तो बादामी

ने पैर अंदर कर लिए.

मां को सर्दी लग जाए तो बेटे को भी

लग जाएगी.

बड़की मेमसाहेब ने कहा था. पर कब

तक उकड़ू बैठे रहें. ठीक से बैठने की जगह

भी तो नहीं है घर में. बादामी को रोना आने

लगा. गांव में कितनी जगह थी न. जब वो

राधा की उम्र की थी तो ऐसी ठंडी में दिन

भर घूर के पास ही बैठी रहती, उसी घूर में

शकरकंद पकाते, आलू पकाते, टमाटर पकाते,

मटर पकाते और फिर सब मिलकर खाते.

यहां शहर में घूर कहां. खूब ठंडा होता तो

कोई दुकानदार एक पोलोथीन का बोरा और

दूसरा कचरा बटोरकर माचिस लगा देता,

ओतने से आड़ हो जाता है. प्लास्टिक बड़ी

जल्दी आग पकड़ता है और प्लास्टिक पर

पानी का भी असर नहीं होता है. शहर में

सबसे अच्छी चीज ये प्लास्टिक ही तो है लेकिन

देखो न बिना प्लास्टिक के किसी

का काम भी नहीं चलेगा और सब जुलूस

बना कर कहते हैं कि प्लास्टिक हटाओ .बादामी

को हंसी आ गई. उस दिन

स्कूली बच्चे हाथ में तख्ती लेकर बादामी के

घर के सामने से गुजरेबंद

करो,बंद करो.

प्लास्टिक का प्रयोग बंद करो

कोई एक माइक में बोलता और सब

 

उसकी बात दोहराते. पहले तो बादामी को

कुछ समझ में नहीं आया. और जब समझ

में आया तो उसे लगा कि सब उसका घर

तोड़ने आ रहे है. वही बैठे-बैठे हिंदी में बोली

बादामी उ लोग से

बताओ कोई, ई कौनो बात हुआ.

प्लास्टिक ना रहे तो बारीश में भीजे का,

घाम में पाके का सब कोई. आ सामान कहां

रखे. भागो अपना ढढ कमंडल लेके. बुझा

गया उ लोग को. सब भाग गए. लेकिन

लडिका जात, उसी तरह चिलाते चिलाते

गए.

जाने कितनी बार बादामी ने यह कहानी

राधा को सुनाई है और राधा को भी न जाने

कितना रस आता इस बेकार कहानी मेंदोनों

मां-बेटी पहले खूब हंसते और फिर

राधा उसी समय किसी प्लास्टिक की थैली

में हवा भरके बलून बना के उड़ाने लगती .बादामी

ने अब बच्चे को सुला दिया

और राधा की तरफ मुड़ गई. राधा अभी भी

बेहोश-सी सोई थी .राधा

को देखते-देखते बादामी ने फिर

से उसके माथे पर हाथ रखा. माथा उसी

तरह तप रहा था. बादामी ने बेटी के सर पर

प्यार से हाथ फेरा और फिर माथा चूम

लिया. राधा ने थोड़ी पलकें  खोलीं और फिर

मूंद ली. फिर मुंह चलाने लगी जैसे कुछ खा

रही हो. बादामी को याद आया कि राधा ने

तो सुबह से कुछ नहीं खाया है. घर में कुछ

खाने के लिए है भी नहीं. बादामी झट से

खड़ी हो गई. साड़ी ठीक की, उलझे बालों 

को मोड़ा और ऊनी चादर उठा के ओढ़ ली चलते-

चलते एक बार बेटे को देखा. गुदरी

में सोया बच्चा बहुत सुंदर लग रहा था. घर

से बाहर निकलकर फिर बादामी अचानक

से मुड़ी. वापस अंदर आई. बच्चे को चुम्मी

दी. गर्मी में सोया बच्चा मां के ठंडे होठों से

जरा-सा परेशान हुआ. थोड़ा कुनमुनाया बादामी

ने फिर से उस पर हाथ रखासूत,

बाबू, सूत

जा

तानी दीदी खातिर दवाई ले आव

तानी.

बड़की मेमसाहेब से पैसा मांग के ले

आव तानी.

उनका से कहेम...

और बादामी को समझ ही नहीं आया

कि वह क्या कहेगी. उसे तो ठीक से बात

करने ही नहीं आती. तभी तो सब उसे

बगड़ी, पगली और न जाने क्या-क्या कहते

हंै. पर बड़की मेमसाहेब और लोग की तरह

नहीं है. स्कूल में पढ़ाती है, बहुत समझदार

है. तभी तो बिना कहे उसकी सब बातंे

समझ जाती है. उस दिन जब झाड़ू लगाने

झुकी बादामी तो जैसे झुका ही न जाए.

ढोल जैसा पेट बीच में आ जाए. तब

बड़की मेमसाहेब ने कहा, ”कल से आने

की जरूरत नहीं है. घर रहो और अपना

ध्यान रखो.

फिर बिना मांगे उस महीना का हिसाब

कर दिया और पांच सौ और दिया. कहा कि

ठीक हो जाना तब ही आना. छोटा-छोटा

कपड़ा-लत्ता भी दिया और मोजा भीबबुआ

के मोजा पहिनईने बानी नू?“

बादामी ने याद करने की कोशिश की पर

उसे याद नहीं आयाअच्छा,

चादर के भीतरी बा, ठंडा ना

लागी.

यही सब सोचते-सोचते बादामी बड़ी

मेमसाहेब के घर पहुंच गई. बड़ी मेमसाहेब

के दरवाजे पर बहुत भीड़ थी. शायद मंझली

दीदी को देखने लड़के वाले आए थे. शायद

क्या, वही थे. मंझली दीदी साड़ी पहन के

बैठी थी. राधा भी तो कभी-कभी बादामी की

फटी साड़ी फ्राॅक के ऊपर लपेट लेतीकहती

अब हमहु मां बन गइनी. पागल

लड़की!

बड़की मेमसाहेब उसे देखकर बहुत

खुश हुई. सब काम पड़ा था. बादामी ने चाय

बनाई. कितनी अच्छी लगती है न इलायची

की महक. बड़की मेमसाहेब ने ही बताया

 

था, ‘यह इलायची है, यह दालचीनी है आज

कितने दिन बाद बादामी चाय पिएगी अभी

कहां फुर्सत है. सारे प्लेट तो जूठे पड़े

हैं. सब धोकर ठीक से पोंछ भी दिया. उसी

में मिठाई जा रही है. सारी मिठाइयों के नाम

भी तो बड़ी मेमसाहेब ने ही बताया था,

रसगुल्ला, चमचम. एक दिन एक बर्फी भी

दी थी. पर बादामी ने जीभ पर रखी भी नहीं ,ले

जाकर राधा को खिला दी. बेचारी उसको

भी तो कुछ अच्छा खाने को नहीं मिलता मझली दीदी की शादी तय हो जाएगी तो वो

बड़ी मेमसाहेब से मिठाई मांगेगी. अरे चाय

तो ठंडी हो गई. कोई बात नहीं मंझली दीदी

को देखने लड़के वाले रोज-रोज थोड़े ही आते

हैं?

दो घंटे बाद जब बादामी चलने लगी

तो बड़की मेमसाहेब ने बुलायाबादामी,

कैसी हो?“ बड़की मेमसाहेब

ने मुस्कुराते हुए पूछाठीक

बानी बड़की मेमसाहेब.और

बादामी को याद ही नहीं रहा की उसे भर पेट

खाना खाए बहुत दिन हुए, कि रघुआ के

जनम के समय हस्पताल में जो टाका पड़ा

था वो अभी भी बहुत दुखता है, कि आठ

महीने पहिले उसका पति उसे स्टेशन पर

छोड़कर जो भागा तो आज तक उसका पता

नहीं चल पाया है. पर बादामी ने फिर से

 

कहा

ठीक बानी हम.

और बताओ, बेटा हुआ कि बेटी?“

बेटा बा मेमसाहेब, साफ...गोर, दपदप

बबुआ.

नाम क्या रखा है?“

रघु नाम रखा...था...है... कईसन नाम

है...मेमसाहेब?“

ये दो वाक्य बादामी ने दो मिनट में

कहे. मेमसाहेब सबर से उसे सुन रही थीनाम

तो बहुत अच्छा है बादामी रानी.

मेमसाहेब ने ठिठोली की तो मानो

दुनिया भर की खुशी मिल गई बादामी को.

घर लौटते समय वह यही सोचने लगी कि

कितनी अच्छी है ना बड़की मेमसाहेब. आज

तक किसी ने बादामी से उसके बेटे के बारे

में नहीं पूछा था. बड़की मेमसाहेब ने पूछा चलते

समय सौ रुपया भी दिया कहा कि

बबुआ के नाम पर नेग है, महीना से अलग.

एक पोलोथीन में पुलाव दिया. सब्जी खतम

हो गई थी. क्या हो गया? बादामी को तो

पुलाव ऐसे ही बहुत अच्छा लगता है. राधा

को क्या कम अच्छा लगता है? घर चलते

चलते रस्ते में बादामी ने फिर सोचा कि

आज से दलिद्र भगा देना है. राधा के बाबू

को गए आठ महीने हो गए. तब से एक

बार भी वो ठीक से तैयार नहीं हुई. आज

मंझली दीदी कितनी सुंदर लग रही थी न?

वह भी तो पहले कितनी संुदर लगती थी,

राधा के बाबू देखते तो देखते रह जाते थेनहीं

आज से फिर अच्छा से रहेगी. टाइम पर

मेमसाहेब के घर भी जाएगी और अपने घर

भी खाना बनाएगी. कल से राधा को भी

स्कूल भेजेगी.

भेजेगी न बादामी रानी? और बादामी

को फिर से हंसी आ गई. चलते-चलते

दवाई दुकान पर रुक गई. सर्दी, खासी,

बुखार की दवाई ले ली. जाते ही राधा को

खिला देगी. खिलाएगी न बादामी रानी?

और बादामी फिर हंसने लगी

 

इस धुंध में कुछ उतना साफ नहीं दिख

रहा था. दिन भर उसी तरह धुंध थी. बादामी

ने दोनों हाथ रगड़कर नाक को गर्मी दी.

स्कार्फ के फीते कसकर बांधे. लो आ गया

बादामी रानी का घर. पर इस बार बादामी

को हंसी नहीं आई. घर से चार कदम दूर

बबुआ का गुदरा पड़ा था...बादामी ने फिर

से देखाμहा-हा, उसकी ही गुदरी है. थोड़ा

और दूर बबुआ का मोजा रोड पर पड़ा था .बादामी

जल्दी से खोपचे में घुसी और उतने

ही तेजी से बाहर भागी. मोजा के आगे पीछे

देखा. इधर-उधर दौड़ भाग करके देखा. खाली

गुदरी ही उठा के झार के देखा. फिर से

खोपचे में जाके राधा को खिसका के देखा.

एक-एक सामान, एक-एक कपड़ा उठा के

देखा. पर जिसको देखना चाह रही थी वो तो

कहीं दिखाई ही नहीं दिया. बादामी को लगा

कि उसका कान गरम हो गया, पूरा शरीर

अचानक से ठंडा पड़ने लगा, खून जमने

लगा. दिमाग सुन्न पड़ गया. पहले सिसकी

शुरू हुई लेकिन जैसे जैसे खोज आगे बढ़ती

गई आंसुओं की धार और रुदन का स्वर तेज

होता गया. फिर एक जोर का क्रंदन वातावरण

में फैल गयाअरे

हमर बबुआ.

तू कहां गईल हो.

तू कहां बाड हो...

हमर बबुआ के, के ले गईल हो...

हमर सोनवा के रोवाईयो नइखे सुनाई

देत हो...

सब दौड़े. पान वाला, चाय वाला, आते

जाते लोग और कुछ स्कूली बच्चे भी .देखा ...पगली पर भूत सवार है. सब सामान

उठा उठा के बाहर फेंक रही है. बटुली,

चूल्हा, गुदरा, गठरी मोटरी. पुलाव का पोलोथीन

भी वही पड़ा है, आधा फटा पोलोथीन. अब

तक के शोरगुल से राधा जग गई थी. फटी

फटी आंखों से मां को देख रही थी. बादामी

ने झकझोरकर राधा से पूछा

बबुआ कहां बा?

 

“”रे डइनिया बोल ना, कहवा बा

बबुआ.

राधा ने कुछ नहीं कहा. भटकसुन मां

की भटकसुन बेटी पुलाव की थैली देख रही

थी. एकटक, लगातार. जाने कहां से एक

कुत्ता आके अचानक से थैली की तरफ बढ़ा

और तीन दिन से बुखार में पड़ी लड़की में

जाने कहां से उतनी तेजी आ गई. भागकर

उसने थैली उठा ली. कुत्ता वहीं आसपास

मंडराने लगा फिर सड़क पर पड़ा बच्चे की

गुदरी को सूंघने लगा. जाने बादामी को क्या

सूझा वो तेजी से बाहर निकली. जहां गुदरा

पड़ा था वहां से एक कदम पर खुला नाला

था. बादामी ने नाले में झांका और धम्म से

बैठ गई.

"हे राम जी, ई का हो गैल हो.

निकाल लोगन हो...

बबुआ के बचाव लोगन हो...

सबने नाली में झांक के देखा. लाल रंग

की फूली शर्ट दिखी. स्कूल के लड़के डंडा ले

आए. नाली में डाल के, शर्ट में फंसा के

खींचा. थोड़ी देर पहले का मानव शिशु जिसे

गुदरी में लिटाया था अब डंडे पर टंगा थाबच्चे

को जमीन पर रखा गया. पूरा फूल

गया था. बादामी ने आंचल से जल्दी-जल्दी

मुंह पोंछा, हाथ पोंछे, पैर पोंछा . बच्चा नहीं

हिला. फिर आंचल से ही मुंह में से पाक

निकाला. फिर नाक में से. बच्चा नहीं

हिला. वो फूल गया था. शायद बहुत देर से

पानी में गिरा था. बादामी ने जल्दी से उसका

मुंह अपने स्तन से लगाया. अब भी बच्चे ने

कोई हरकत नहीं की. बादामी ने अब उसे

जोर से झकझोरा. पर पत्थर भी कहीं रोता हैबच्चा

उसी तरह निस्पंद रहा.

एक महिला ने बादामी के हाथ से

बच्चा ले लिया. जमीन पर लिटा दिया . बादामी

ने विरोध नहीं किया, अजीब से

आवाज से रोने लगी. गिलिर-बिलिर. जैसे

सारे शब्द उससे दूर भाग गए हों , जैसे अब

दुनिया में कुछ बचा ही न हो. ऐसा रुदन

कि पत्थर का भी कलेजा फट जाए. बबुआ

को जमीन पर पड़ा देख और मां को रोता

देख जाने राधा को कितना समझ आया,

खाना छोड़ वो भी वहीं आके बैठ गई और मां

के सुर में सुर मिलाकर रोने लगी .अब

तक भीड़ जमा हो गई थी. कानाफूसी

शुरू हो गई

कैसी पागल औरत है?“

भगवान ऐसे लोग को औलाद क्यों देता है?“

कितना सुंदर बच्चा था.

बेटा था.

कैसे बर्दाश्त हो रहा है, भटकसुन-सा बैठी है.

वहीं  कुत्ता पास आकर फिर कुछ सूंघने

लगा. शायद पुलाव. कुत्ते की आवाज सुनकर

राधा रोना छोड़कर भागकर फिर से खोपचे में

आ गई. पुलाव की थैली उठाकर खाने लगी अकेली.

बच्ची के हाथ में पुलाव देखकर

कुत्ता उसकी तरफ बढ़ा. कुत्ते ने जैसे थैली

को मुंह लगाया राधा चिल्लाने लगी. लोगों

ने कुत्ते को भगा दिया. पोलोथीन की थैली

अब तक कि खींचतान में बहुत फट गई

थी. राधा ने चादर के नीचे से अखबार का

टुकड़ा निकाला और उस पर पुलाव रख खाने

लगी. अब तक बाहर भीड़ बहुत कम हो

चुकी थी. पूरा पुलाव खाने के बाद राधा ने

फिर मां को देखा. वह अभी भी बच्चे को

देख रही थी. एक जम्हाई लेने के बाद राधा

ने अखबार के टुकड़े को ऊपर उठाया और

उसपर लिखे अक्षर मिला मिलाकर पढ़ने

लगी-

"आकार रा म राम, क ओकार को,

न म जनम, भ...भ म दिरघई मी भमी, राम

को जनम भमि...

म हरषाई मि ल न दिरघई नी, मिलनी,

च आकार चा, ह हरषई हि ए, मिलनी

चाहिए...

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प्रीति प्रकाश तेजपुर विश्वविद्यालय आसाम में हिन्दी बिषय की शोधार्थी हैं 

संपर्क:    preeti281192prakash@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर और सार्थक कहानी के लिए बधाई । अनुग्रह ने अच्छी रचनाओं का चयन किया है
    रामकुमार सिंह
    दमोह मध्यप्रदेश

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी कहानी। राधा के हिज्जे निरीहता को एकाएक व्यापक और गहरा संदर्भ दे देते हैं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपने कहानी पर अपनी प्रतिक्रया दी | शुक्रिया आपका |

      हटाएं
  3. एक सशक्त कहानी । बदामी के माध्यम से उस समूचे वर्ग के जीवन-संघर्ष की,उस यथार्थ की हृदयविदारक प्रस्तुति ।
    लेखिका को बहुत बधाई 💐

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपने कहानी पर अपनी प्रतिक्रया दी | शुक्रिया आपका |

      हटाएं
  4. प्रीति प्रकाश जी की कहानी में स्त्री सम्वेदना ,माँ का दर्द और गरीबी को जैसे तोला-तोला नाप कर रखा गया है ।न कहीं कम न कहीं ज़्यादा।एक भी शब्द कहानी में बढ़ा नहीं सकते और एक भी शब्द निकालने की गुंजाइश नहीं । हर्फ़-हर्फ़ में मानवता की प्रज्वलित सम्वेदना को पिरोया गया है ।लेखिका को बधाई शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कल्पना मनोरमा जी , आपने कहानी पर अपनी प्रतिक्रया दी | शुक्रिया आपका |

      हटाएं
  5. एक शानदार कहानी जो हंस कथा सम्मान से भी नवाजा गया था | प्रीति प्रकाश को हार्दिक बधाई |

    जवाब देंहटाएं
  6. आपने कहानी पर अपनी प्रतिक्रया दी | शुक्रिया आपका |

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर कहानी। प्रीति को बधाई ।

    जवाब देंहटाएं

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आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ओमा द अक ने

समर केम्प में चक्रधरनगर स्कूल के बच्चों ने संगीत और गायकी का लिया आनंद / प्रसिद्ध युवा बांसुरी वादक विकास तिवारी ने दी अपनी प्रस्तुति

रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप के तहत 27 मई को बांसुरी वादक विकास कुमार तिवारी ने अपनी प्रस्तुति दी।  संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार  शराफ ने छात्र-छात्राओं से आगन्तुक अतिथि विकास कुमार तिवारी का परिचय कराया साथ ही उन्हें संबोधन एवं अपनी सांगीतिक प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े प्रधान पाठक विकास कुमार तिवारी ने शिक्षा एवं संगीत के क्षेत्र में अपने अनुभवों को साझा किया । संगीत जैसी कला की बारीकियों का जीवन में क्या महत्व है इस पर उन्होनें कुछ बातें रखीं। उन्होंने बांसुरी वादन की कुछ बेहतरीन प्रस्तुतियां  दीं जिसका बच्चों ने आनंद उठाया। कुछ बच्चों ने समर केम्प पर फीडबैक भी दिया। इस अवसर पर प्राचार्य राजेश डेनियल ने बच्चों एवं स्टॉफ को संबोधित करते हुए कहा कि यह सत्र हमारे लिए उपलब्धियों भरा रहा। न केवल विद्यालय में अच्छे परीक्षा परिणाम आए बल्कि अन्य गतिविधियों में भी वर्षभर यहां के छात्र-छात्राओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। समर कैंप भी हमारे लिए एक उपलब्धियों भरा यादगार आयोजन है जिसमें अनेक प्रकार की गतिव

युवा मोटिवेशनल स्पीकर प्रतिची पटेल एवं हैंडराइटिंग स्पेशलिस्ट जीआर देवांगन सर ने बच्चों को किया संबोधित। समर केम्प के बच्चों को दोनों ने दिए जीवन में आगे बढ़ने के टिप्स

रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप में हैंडराइटिंग स्पेशलिस्ट जीआर देवांगन एवं युवा मोटिवेशनल स्पीकर प्रतिची पटेल का आगमन हुआ।  प्रतिची पटेल का सम्बोधन सर्वप्रथम विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ़ ने दोनों अतिथियों का परिचय विद्यालय के छात्र-छात्राओं से करवाया। इस अवसर पर जीआर देवांगन ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि छात्रों की हैंड राइटिंग अगर सुंदर हो तो उन्हें परीक्षाओं में इसका लाभ मिलता है। मूल्यांकन कर्ता इससे प्रभावित होते हैं । जी आर देवांगन हैंड राइटिंग स्पेशलिस्ट हैंडराइटिंग से बच्चों के व्यक्तित्व का पता चलता है । इस दिशा में थोड़ी सी मेहनत से बच्चे अपना हैंडराइटिंग सुधार सकते हैं। हां यह जरूर है कि इसके लिए उन्हें सतत अभ्यास और मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी। उन्हें कर्सिव राइटिंग को लेकर बच्चों को बहुत से उपयोगी टिप्स भी दिए और सवाल जवाब के माध्यम से बच्चों ने बहुत सी बातें उनसे सीखीं। आयोजन में पधारे दूसरे अतिथि वक्ता युवा मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में ख्यात, हाल ही में सीबीएसई 12वीं बोर्ड एग्जाम उत्तीर्ण प्रतिची

पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के बताए तरीके /शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर में समर कैंप के तहत किया गया प्रायोगिक प्रदर्शन

पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के बताए तरीके शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर में समर कैंप के तहत किया गया प्रायोगिक प्रदर्शन रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में पुलिस एवं अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने आग पर काबू पाने के विभिन्न तरीकों का  बच्चों के समक्ष प्रायोगिक प्रदर्शन किया। संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ ने सर्वप्रथम समस्त अधिकारियों का स्कूली बच्चों से परिचय करवाया।   अग्निशमन सेवा से जुड़े अधिकारी खलखो सर ने इस अवसर पर सिलिंडर में आग लग जाने की स्थिति में किस तरह अपना बचाव किया जाए और आग लगने से आस पड़ोस को कैसे बचाए रखें , इस संबंध में बहुत ही अच्छे तरीके से जानकारी दी और अग्निशमन से जुड़े विभिन्न यंत्रों का उपयोग करने की विधि भी  उन्होंने बताई। उनके साथी जावेद सिंह एवं अन्य अधिकारियों ने भी उनका सहयोग किया। बच्चों ने स्वयं डेमोंसट्रेशन करके भी आग पर काबू पाने की विधियों का उपयोग किया। दैनिक जीवन में काम आने वाली ये जानकारियां बहुत ही सारगर्भित रहीं। इस डेमोंसट्रेशन को स्टॉफ के सभी सदस्

समर केम्प का दूसरा दिन 'तारे जमीं पर' फिल्म के प्रदर्शन और व्यावसायिक कैंपस के भ्रमण पर केंद्रित रहा /स्वामी आत्मानंद शा. उच्चतर मा. विद्यालय चक्रधर नगर के छात्रों ने अपना अनुभव साझा किया

समर केम्प का दूसरा दिन 'तारे जमीं पर' फिल्म के प्रदर्शन और व्यावसायिक कैंपस के भ्रमण पर केंद्रित रहा स्वामी आत्मानंद शा. उच्चतर मा. विद्यालय चक्रधर नगर के छात्रों ने अपना अनुभव साझा किया रायगढ़ । स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप के द्वितीय दिवस का आयोजन हुआ। सर्वप्रथम संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार शराफ द्वारा बच्चों को संबोधित किया गया। उन्होंने शिक्षाप्रद फिल्मों को लेकर बच्चों को बहुत सारी जानकारियां प्रदान कीं। उसके बाद शिक्षक स्टाफ राजा राम सरल और के पी देवांगन के तकनीकी सहयोग से प्रोजेक्टर के माध्यम से बच्चों को बड़े पर्दे पर 'तारे जमीं पर' नामक फिल्म दिखाई गई। यह फिल्म मूलतः बच्चों के मनोविज्ञान पर केंद्रित है । इस फिल्म का बच्चों ने खूब आनंद लिया। इस फिल्म को लेकर शालेय परिवार की शिक्षिकाओं नायर मेडम, वसुंधरा पांडेय मेडम, भगत मेडम, कनक मेडम एवम शारदा प्रधान ने बच्चों से बातचीत की एवं उनके विचार भी जानने का प्रयास किया। इस अवसर पर बच्चों की ओर से कीर्ति यादव,कशिश डनसेना,बरखा तम्बोली,मुस्कान नामदेव ने फ़िल्म को ल

कथा कहानी के नाम रहा समर कैंप का आखिरी दिन /बच्चों ने केम्प के अनुभवों पर साझा किया अपना फीडबैक

रायगढ़।स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में 10 दिवसीय समर कैंप का आयोजन 30 मई को संपन्न हुआ।  पहला सत्र कहानी सुनने सुनाने और उस पर सवाल जवाब का सत्र था। पहले सत्र में व्याख्याता रमेश शर्मा द्वारा बच्चों के लिए लिखी गईं नौ में से चुनी हुईं अपनी तीन कहानियाँ मीठा जादूगर, गणित की दुनिया और नोटबुक, जिसे विशेष तौर पर स्कूल शिक्षा विभाग एससीईआरटी रायपुर द्वारा बच्चों के लिए ही  प्रकाशित किया गया है, पढ़कर सुनाई गईं। इन कहानियों को सुनाने के बाद उन्होंने बच्चों से कई सवाल जवाब किये जिनके उत्तर बच्चों की ओर से दिए गए। बच्चों के उत्तर सुनकर उपस्थित छात्र छात्राओं एवं शिक्षक शिक्षिकाओं को यह महसूस हुआ कि बच्चों ने इन कहानियों को कई डाइमेंशन से समझने की कोशिश की है और उसे अपने जीवन से जोड़कर भी देखने का प्रयास किया है। कहानी सुनाने और सुनने की इस प्रक्रिया में बच्चों ने यह स्वीकार किया कि कहानी कला संप्रेषण की एक सशक्त विधा है और  इसके माध्यम से बहुत सी बातें रोचक ढंग से सीखी जा सकती हैं। इस अवसर पर कहानी लिखने की कला पर भी बातचीत हुई। इसी क्रम में व्याख्याता रश्मि

डॉ मनीष बेरीवाल ने सीपीआर पर और पीएस खोडियार ने कला एवं जीवन कौशल के अन्तर्सम्बन्धों को लेकर बच्चों से अपनी बातें साझा करीं। चक्रधर नगर स्कूल के समर केम्प में उनके व्याख्यान हुए

चक्रधर नगर स्कूल के समर कैंप में बच्चों को डॉक्टर मनीष बेरीवाल एवं रिटायर्ड प्राचार्य पी.एस. खोडियार ने संबोधित किया    रायगढ़। स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चक्रधर नगर रायगढ़ में समर कैंप के तहत 24 मई को रिटायर्ड प्राचार्य पी.एस. खोडियार एवं डॉ मनीष बेरीवाल का अतिथि वक्ता के रूप में आगमन हुआ।कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के प्रभारी प्राचार्य अनिल कुमार  शराफ ने छात्र-छात्राओं से आगन्तुक अतिथियों का परिचय कराया एवम उन्हें संबोधन हेतु आमंत्रित किया।पहले क्रम पर  खोडियार सर ने  ललित कला एवं जीवन कौशल को लेकर बच्चों को संबोधित किया। अच्छी शिक्षा ग्रहण करने के साथ साथ जीवन को किस तरह आसान और सुंदर बनाया जाए , इस राह में ललित कलाओं का क्या योगदान है,  जीवन जीना भी किस तरह एक कला है , समाज में कैसे अपने लिए हम एक सम्मानित स्थान बना सकते हैं, इन प्रश्नों को लेकर उन्होंने बहुत विस्तार पूर्वक अपने अनुभवों के माध्यम से महत्वपूर्ण बातें विद्यार्थियों के बीच साझा किया। दूसरे क्रम पर समर कैंप के अतिथि डॉ मनीष बेरीवाल ने बच्चों को संबोधित किया।उन्होंने सीपीआर के संबंध में विस्तार पूर्

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सोचना

अख़्तर आज़ाद की कहानी लकड़बग्घा और तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन पर टिप्पणियाँ

जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। (हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी) -------------------------------------- हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं। दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है। मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है। शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो च